हनुमान अंश इन दिनों बॉक्स ऑफिस पर जमकर कमाई कर रही है. मात्र दो करोड़ रुपये में बनी यह फिल्म अब तक 40 करोड़ की कमाई कर चुकी है. लेकिन यह फिल्म एक सवाल खड़ा करती है कि क्या हनुमान अंश भगवान हनुमान की कहानी है या नीम करोली बाबा की? हैरानी की बात यह है कि फिल्म दोनों की कहानी है और यहीं छिपा है फिल्म का सबसे बड़ा ट्विस्ट.
विशाल चतुर्वेदी के निर्देशन में बनी यह फिल्म नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़े किस्सों और हनुमान के प्रति उनकी अगाध भक्ति से प्रेरित है. फिल्म के नाम में भले ही हिंदू देवता हनुमान का उल्लेख हो, लेकिन इसकी आध्यात्मिक दुनिया का बड़ा हिस्सा उस इंसान के जीवन से निकलता है, जिसे उनके भक्त आगे चलकर नीम करोली बाबा के नाम से जानने लगे.
कहानी की शुरुआत एक ऐसे बच्चे से होती है, जो अपनी मां को तलाश रहा है लेकिन धीरे-धीरे यह तलाश भगवान को खोजने में बदल जाती है और आखिरकार उसे यह समझ आने लगता है कि शायद ईश्वर को पाने का रास्ता दूसरों की सेवा से होकर गुजरता है.
फिल्म इन दोनों संसारों को जोड़ने का बेहद खूबसूरत तरीका तलाशती है. जब बालक लक्ष्मण अपनी मां को खो देता है, तो उससे कहा जाता है कि उसकी मां भगवान राम के पास चली गई हैं. एक बच्चे के लिए यह कोई अमूर्त आध्यात्मिक विचार नहीं है. उसके लिए मां कहीं मौजूद है और वह उसे ढूंढना चाहता है लेकिन सवाल है कि भगवान राम तक पहुंचा कैसे जाए?
लक्ष्मी, जिसे उसके पिता इसी नाम से बुलाना पसंद करते हैं और जो आगे चलकर लक्ष्मण दास और फिर नीम करोली बाबा के रूप में पहचाने जाते हैं, इसका अपना जवाब खोजता है, हनुमान के रास्ते. राम के सबसे बड़े भक्त अगर किसी को राम तक पहुंचा सकते हैं, तो वह हनुमान ही हैं.

यहीं से नीम करोली बाबा और हनुमान की दो अलग दिखने वाली कहानियां एक हो जाती हैं. लक्ष्मण की मां की तलाश राम की तलाश बनती है. राम की तलाश उसे हनुमान तक ले जाती है और यही भक्ति आगे चलकर उस इंसान को गढ़ती है, जो नीम करोली बाबा कहलाता है.
यही वजह है कि फिल्म का नाम ‘हनुमान अंश’ सिर्फ हनुमान की ओर इशारा नहीं करता, बल्कि उस इंसान की पहचान भी बन जाता है, जो खुद को हनुमान का एक अंश, उनका सेवक और भक्त मानता है. शायद यही समझना इस फिल्म को समझने की सबसे जरूरी कुंजी है फिल्म आध्यात्मिकता को कठिन दर्शन या बड़े-बड़े धार्मिक उपदेशों के जरिए नहीं समझाती. वह उसे जमीन पर उतार लाती है. बिल्कुल आम जिंदगी के बीच.
यह मां की बात करती है, भूखे बच्चों की बात करती है, टूटते परिवारों की, गरीब ग्रामीणों की, प्रताड़ित महिलाओं की, माफी की और सबसे बढ़कर एक इंसान के दूसरे इंसान के काम आने की.
फिल्म के मुताबिक, भगवान राम और हनुमान की भक्ति सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है. असली सवाल तो प्रार्थना के बाद शुरू होता है. जब आप मंदिर से निकलकर दोबारा उसी दुनिया में लौटते हैं और आपके सामने कोई ऐसा इंसान आता है, जिसे आपकी मदद की जरूरत है, तब आपकी भक्ति क्या करती है?
यही वह सवाल है, जिसे ‘हनुमान अंश’ बहुत सहज तरीके से सामने रखती है. शायद यही वजह है कि सीमित बजट और किसी पारंपरिक सुपरस्टार केंद्रित भव्यता के बावजूद फिल्म आज के दर्शकों, खासकर युवा दर्शकों से भी जुड़ रही है. फिल्म आपको यह चुनने के लिए मजबूर नहीं करती कि यह हनुमान की कहानी है या नीम करोली बाबा की.
यह कहती है कि क्या यह हनुमान की कहानी है? हां. क्या यह नीम करोली बाबा की कहानी है? बिल्कुल. बल्कि एक कहानी तक पहुंचने का रास्ता दूसरी कहानी से होकर गुजरता है. साल है 1943. भारत अंग्रेजी हुकूमत के अधीन है. एक क्रांतिकारी अंग्रेजों से छिपकर रह रहा है. उसे हर वक्त डर है कि कहीं उसकी पहचान उजागर न हो जाए. ऊपर से वह लगातार 15 दिनों से भूखा है. तभी पास में रहने वाला एक संत उसके दरवाजे पर आता है और उसे खाना देता है, जैसे उसे पहले से मालूम हो कि इस डरे और भूखे आदमी को इस वक्त किस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है.
यह किसी चमत्कार की शुरुआत जैसा लगता है. यहां फिल्म चाहती तो इसे बहुत भव्य बना सकती थी. दिव्य हस्तक्षेप, तेज संगीत, किसी सुपरहीरो की तरह संत का प्रकट होना. सब कुछ दिखाया जा सकता था लेकिन ‘हनुमान अंश’ चमत्कार से ज्यादा उस इंसान को देखने में दिलचस्पी रखती है, जिसके भीतर से वह चमत्कार निकलता है. फिल्म 12 साल के लक्ष्मी के शुरुआती जीवन को सामने लाती है, जो आगे चलकर लक्ष्मण दास और फिर नीम करोली बाबा के नाम से पहचाने जाते हैं. इस किरदार को अभिनेता शोभिनव सत्य ने निभाया है.

उनकी कहानी के केंद्र में एक बेहद मानवीय भावना है, एक ऐसा बच्चा जो यह स्वीकार ही नहीं कर पा रहा कि उसकी मां हमेशा के लिए उससे दूर चली गई हैं. अपनी मां से गहरा प्रेम ही उसे आध्यात्मिक रास्ते पर ले जाता है. भगवान राम और हनुमान के आशीर्वाद की तलाश धीरे-धीरे ऐसी यात्रा में बदल जाती है, जहां भक्ति और इंसानियत एक-दूसरे में घुलने लगती हैं.
यहीं आकर फिल्म एक सामान्य धार्मिक कहानी से आगे निकल जाती है. मां को ढूंढने निकला बच्चा कुछ बहुत बड़ा खोजने लगता है. शायद ईश्वर तक पहुंचने के लिए हमेशा ऊपर देखने की जरूरत नहीं होती. कभी-कभी अपने आसपास देखने की जरूरत होती है.
फिल्म की यह यात्रा बड़े-बड़े उपदेशों के बजाय छोटे-छोटे सेवा भाव के जरिए आगे बढ़ती है. एक साहूकार के शोषण का शिकार हो रही विधवा की मदद से लेकर एक हिंसक पति को उसके भीतर की इंसानियत का एहसास कराने तक आम लोगों से नीम करोली बाबा की मुलाकातें ही फिल्म का भावनात्मक और आध्यात्मिक केंद्र बनती हैं.
फिल्म बार-बार एक सवाल की तरह लौटती है कि अगर आपकी भक्ति आपके व्यवहार को नहीं बदलती, तो उस भक्ति का मतलब ही क्या है? यही फिल्म का सबसे दिलचस्प पक्ष है. भगवान हनुमान को यहां सिर्फ रामायण के उस विराट और पौराणिक चरित्र के रूप में नहीं देखा गया, जिसकी छवि हम सदियों से जानते आए हैं. फिल्म नीम करोली बाबा की जीवन यात्रा और उनकी भक्ति के जरिए यह समझने की कोशिश करती है कि राम और हनुमान को मानने का मतलब रोजमर्रा की जिंदगी में क्या हो सकता है.
जब वह एक गुजराती व्यापारी से मिले अपने भिक्षा के सामान को सामाजिक भेदभाव के कारण हाशिए पर धकेले गए बच्चों के साथ बांटते हैं तब भक्ति केवल पूजा करने की चीज नहीं रह जाती. वह जीवन जीने का तरीका बन जाती है. यही विचार फिल्म के पारिवारिक रिश्तों में भी दिखाई देता है. पिता-बेटे के रिश्ते को गुस्से के बजाय संवेदना से देखा गया है. वहीं एक पति जब अपनी जिम्मेदारियों में विफल होता है, तो उसे अपने ही व्यवहार का सामना करना पड़ता है.
फिल्म का संदेश बहुत जटिल नहीं है कि आप भगवान से प्रेम करने का दावा नहीं कर सकते और फिर अपने बगल में खड़े इंसानों के साथ क्रूरता कर सकते हैं. आस्था तभी मायने रखती है, जब वह आपके फैसलों, आपके रिश्तों और उन लोगों के साथ आपके व्यवहार में दिखाई दे, जो बदले में आपको कुछ भी नहीं दे सकते.
सिर्फ हिंदू दर्शकों के लिए नहीं
यहीं फिल्म की पहुंच का सबसे बड़ा कारण छिपा है. ‘हनुमान अंश’ देखने के लिए आपको नीम करोली बाबा की पूरी जीवन-कथा पहले से जानने की जरूरत नहीं है. आपको हिंदू दर्शन का कोई क्रैश कोर्स करने की भी जरूरत नहीं है. फिल्म आपको ऐसी चीजों से जोड़ती है, जिन्हें हर इंसान समझ सकता है. मां को खोने का दुख, भूख, शोषण, टूटता परिवार, माफी और किसी जरूरतमंद के काम आने की इच्छा. फिर धीरे-धीरे इन सभी मानवीय भावनाओं को आस्था से जोड़ देती है.
फिल्म में नीम करोली बाबा उस ब्रिटिश अधिकारी को भी माफ करते हैं, जिसने उन्हें जबरन ट्रेन से उतार दिया था. यह प्रसंग भी उसी विचार को आगे बढ़ाता है कि करुणा सिर्फ अपने लोगों या अपने समर्थकों तक सीमित नहीं होनी चाहिए. यहां भी फिल्म आध्यात्मिकता को अच्छे और बुरे लोगों के बीच आसान विभाजन में नहीं बांटती. उसका सवाल कहीं ज्यादा कठिन है कि क्या जिसने आपके साथ बुरा किया है, उसके प्रति भी आप करुणा बनाए रख सकते हैं?
धार्मिक सिनेमा से कुछ अलग है ‘हनुमान अंश’
यही बात इस फिल्म को मौजूदा दौर की आध्यात्मिक और धार्मिक फिल्मों के बीच थोड़ा अलग खड़ा करती है. आज जब भारतीय देवी-देवताओं और महाकाव्यों पर बनने वाली फिल्मों को अक्सर बड़े वीएफएक्स, विशाल संसार और बड़े पर्दे के एक्शन से जोड़कर देखा जाता है, ‘हनुमान अंश’ उससे बिल्कुल अलग और ज्यादा निजी रास्ता चुनती है.
जब फिल्म के केंद्र में अपनी मां को खोजता हुआ एक बच्चा हो, तो हर भावना को विशाल दृश्य बनाने की जरूरत नहीं पड़ती. जब असली बदलाव किसी इंसान के भीतर हो रहा हो, तो उसके लिए किसी बड़े दृश्य या चमत्कार की जरूरत नहीं होती. फिल्म का पैमाना भले सीमित हो, लेकिन उसका भाव बेहद सीधा है कि अगर आप भगवान से प्रेम करने का दावा करते हैं, तो वह प्रेम आपके दूसरे इंसानों के साथ व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए और शायद यही उस सवाल का जवाब भी है, जो फिल्म का नाम अपने आप में खड़ा करता है कि ‘हनुमान अंश’ आखिर भगवान हनुमान की कहानी है या नीम करोली बाबा की? इसका जवाब शायद फिल्म के नाम में ही छिपा है.
यह नीम करोली बाबा की कहानी है, क्योंकि उनका जीवन दर्शकों को भगवान हनुमान को समझने का एक मानवीय रास्ता देता है. यह भगवान हनुमान की कहानी भी है, क्योंकि वही भक्ति, जो एक छोटे बच्चे की अपनी मां को भगवान राम के जरिए खोजने की कोशिश से शुरू होती है और राम के सबसे बड़े भक्त हनुमान तक पहुंचती है कि आगे चलकर उस इंसान को आकार देती है, जिसे दुनिया नीम करोली बाबा के नाम से जानती है. ये दो अलग-अलग कहानियां नहीं हैं. ये एक ही कहानी के दो हिस्से हैं.