
कान में तालियां, ऑस्कर तक पहुंची फिल्म और अपने ही देश में जेल की सजा. ईरान के मशहूर फिल्ममेकर जफर पनाही की जिंदगी किसी राजनीतिक थ्रिलर की पटकथा जैसी लगती है. एक तरफ उनकी फिल्म It Was Just an Accident को दुनियाभर में तारीफ मिली, तो दूसरी तरफ ईरान की अदालत ने उन्हें उनकी गैरमौजूदगी में पांच साल और एक महीने जेल की सजा सुना दी. संपत्ति जब्त करने, दो साल तक देश छोड़ने और सोशल मीडिया इस्तेमाल करने पर रोक लगाने के आदेश भी सामने आए हैं.
पनाही की कहानी सिर्फ एक फिल्म निर्देशक की मुश्किलों की कहानी नहीं है. यह सत्ता से टकराव, अभिव्यक्ति की आजादी और अपने देश में रहकर अपनी बात कहने की जिद की कहानी भी है.
‘डेथ टू डिक्टेटर’ के नारे से सत्ता को चुनौती
जफर पनाही लंबे समय से ईरानी सरकार की नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं. 2009 के चुनावों के बाद ईरान में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान उन्होंने सरकार के खिलाफ उठती आवाजों का समर्थन किया. इसी दौर से उनका सत्ता के साथ टकराव और गहरा होता गया. ‘डेथ टू डिक्टेटर’ यानी तानाशाह मुर्दाबाद जैसे नारों के जरिए ईरान में सत्ता के खिलाफ उठने वाली आवाजों ने दुनिया का ध्यान खींचा. पनाही का नाम भी इसी विरोध और अभिव्यक्ति की आजादी की बहस से जुड़ता रहा है.
2010 में उन्हें गिरफ्तार किया गया. उसी साल अदालत ने उन्हें छह साल जेल की सजा सुनाई और 20 साल तक फिल्म बनाने, पटकथा लिखने, इंटरव्यू देने और देश छोड़ने पर पाबंदी लगा दी. लेकिन पनाही ने कैमरे से अपना रिश्ता नहीं तोड़ा. पाबंदियों के बावजूद वह फिल्में बनाते रहे और उनकी रचनाएं अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों तक पहुंचती रहीं.
कान में मिला सबसे बड़ा सम्मान, फिर भी मुश्किलें बरकरार
साल 2025 में पनाही की फिल्म इट वाज जस्ट एन एक्सीडेंट ने कान फिल्म फेस्टिवल का प्रतिष्ठित पाल्मे डी'ओर अवॉर्ड जीता. बाद में इसे फ्रांस की ओर से 98वें ऑस्कर समारोह में बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी के लिए भेजा गया और फिल्म ऑस्कर नॉमिनेशन तक पहुंची.
दुनियाभर में तारीफ और पुरस्कारों के बीच पनाही कई महीनों तक विदेश में रहे. फिर 30 मार्च 2026 को ईरान लौट आए. उनका कहना था कि वह अपने देश में रहना चाहते हैं. विदेश में रहकर सुरक्षित जिंदगी चुनने के बजाय उन्होंने अपनी जमीन पर लौटना बेहतर समझा, जबकि उन्हें अंदाजा था कि आगे मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं.
बिना साफ जानकारी के सुनाई गई पांच साल से ज्यादा की सजा?
तेहरान की रिवोल्यूशनरी कोर्ट की ब्रांच 26 ने पनाही को पांच साल और एक महीने जेल की सजा सुनाई. उनके वकील मुस्तफा नीली के मुताबिक, पनाही को कथित तौर पर सुनवाई की जानकारी नहीं दी गई थी. वकील को नए फैसले का पता तब चला, जब उनके बैंक खाते फ्रीज होने लगे.

रिपोर्टों में इस नए मुकदमे के विशिष्ट आरोप भी साफ तौर पर सामने नहीं आए हैं. अदालत ने संपत्ति जब्त करने के साथ दो साल तक विदेश यात्रा और सोशल मीडिया इस्तेमाल करने पर रोक लगाने का आदेश भी दिया है. हालांकि, इन आदेशों पर कब और किस तरह अमल होगा, यह स्पष्ट नहीं है. फिलहाल पनाही जेल में नहीं हैं.
जेल की सलाखें भी नहीं रोक पाईं उनका कैमरा
पनाही के लिए जेल जाना कोई नई बात नहीं है. 2022 में उन्हें गिरफ्तार किया गया और वह तेहरान की एविन जेल में करीब सात महीने रहे. फरवरी 2023 में रिहाई से पहले उन्होंने भूख हड़ताल भी की थी. उनकी फिल्मों में सत्ता, आजादी, अन्याय और इंसानी गरिमा जैसे विषय बार-बार सामने आते हैं.
उनकी फिल्म इट वाज जस्ट एन एक्सीडेंट को ईरान में आधिकारिक अनुमति के बिना गुप्त रूप से शूट किया गया था. फिल्म की कहानी में कैद और जेल से जुड़े अनुभवों की झलक मिलती है. पनाही के अपने जीवन का संघर्ष भी उनके काम को एक अलग संदर्भ देता है.
दिसंबर 2025 में उन्हें सरकार के खिलाफ प्रचार करने के आरोप में एक साल जेल की सजा सुनाई गई थी. उस फैसले को जून 2026 में बरकरार रखा गया. अब नए मामले में मिली सजा ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. उनके खिलाफ तीन अन्य मामले लंबित होने की बात भी उनके वकील ने कही है.
जाफर पनाही की लड़ाई अब किस मोड़ पर पहुंचेगी?
जफर पनाही की कहानी में एक तरफ अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों की चमक है, तो दूसरी तरफ कानूनी पाबंदियों का अंधेरा. वह उन फिल्मकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने मुश्किल हालात के बावजूद अपना काम जारी रखा और अपनी फिल्मों के जरिए असहज सवाल उठाए.
उनके मामले में सुनवाई की प्रक्रिया, आरोपों की स्पष्टता और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर सवाल उठ रहे हैं. आगे क्या होगा, यह अदालतों और संबंधित अधिकारियों के फैसलों पर निर्भर करेगा. लेकिन इतना साफ है कि पनाही की जिंदगी में कैमरे के पीछे की कहानी भी उनकी फिल्मों जितनी ही नाटकीय हो चुकी है.
कान में खड़े होकर तालियां बटोरने वाला यह निर्देशक आज अपने ही देश में कानूनी लड़ाई लड़ रहा है. और यही उनकी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है- जब एक फिल्मकार अपनी बात कहने से पीछे हटने को तैयार न हो, तो क्या सत्ता उसे चुप करा पाएगी?