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Tu Hai Meri Kiran Movie Review: अच्छे आइडिया को खराब राइटिंग ने किया बर्बाद, सोनाक्षी-जहीर की फिल्म तू है मेरी किरण ने किया निराश

सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल की नई फिल्म तू है मेरी किरण सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है. ये एक सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म है, जिसमें जहीर का किरदार एक साइको इंसान वाला है. कैसी है ये फिल्म? पढ़िए पूरा रिव्यू...

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नई सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म तू है मेरी किरण (Photo: ITGD)
नई सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म तू है मेरी किरण (Photo: ITGD)

अगर शाहरुख खान की फिल्म डर ने हमें कुछ सिखाया है, तो वो ये कि जो इंसान आपके मना करने के बाद भी आपका पीछा नहीं छोड़ता, वो प्यार नहीं बल्कि एक बड़ा 'रेड फ्लैग' है. हाल ही में आई फिल्म तू है मेरी किरण इसी जुनून की कहानी को आगे बढ़ाती है. इसमें एक टाइम ट्रैवल करने वाला फोन भी है, जो दो लोगों को एक दशक के फासले के बावजूद जोड़ देता है. सुनने में कहानी दिलचस्प लगती है, है ना? फिल्म की शुरुआत भी अच्छी लगती है. लेकिन आगे चलकर ये टाइम ट्रैवल, प्यार और जुनून के चक्कर में ऐसी उलझती है कि खुद कहानी का मतलब ही समझ नहीं आता. 

क्या है तू है मेरी किरण की कहानी?

सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल की इस फिल्म में 2016 और 2026 में रहने वाले दो अजनबी एक पुराने फ्लिप फोन के जरिए एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं. समर (जहीर इकबाल) और किरण (सोनाक्षी सिन्हा) के बीच एक अलग तरह का रिश्ता बनता है. शुरुआत में लगता है कि दोनों मिलकर कोई रहस्य सुलझाएंगे, अपनी किस्मत बदलेंगे या किसी बड़ी मुसीबत को आने से रोकेंगे. लेकिन कहानी उस वक्त दूसरी दिशा में मुड़ जाती है, जब समर को सिर्फ किरण से बात करना काफी नहीं लगता. उसे किरण चाहिए और वो भी किसी भी कीमत पर.

फिल्म की शुरुआत 28 सितंबर, 2026 से होती है. किरण को एक अजीब-सा फोन मिलता है, जिस पर एक ऐसे आदमी का कॉल आता है, जो उससे 10 साल पहले की दुनिया में रह रहा है. रेडियो पर पाकिस्तान में हुई सर्जिकल स्ट्राइक की खबर सुनकर किरण को शक होता है कि कुछ तो गड़बड़ है. जब वो समर को थिएटर में मिलने के लिए कहती है, तो उसे अपनी तरफ धुरंधर 2 दिखाई देती है, जबकि समर के टाइमलाइन में एमएस धोनी फिल्म चल रही होती है. यहीं दोनों को पता चलता है कि उनके बीच पूरे 10 साल का अंतर है.

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जबरदस्त है सोनाक्षी की फिल्म का आइडिया

फिल्म का ये आइडिया काफी दिलचस्प है और शुरुआत में कई सवाल मन में आते हैं. आखिर इन दोनों के बीच ही ये कनेक्शन क्यों बना? इन्हें ये फोन कैसे मिला? और अगर हमें अतीत में रहने वाले किसी इंसान से बात करने का मौका मिले, तो क्या हम अपनी जिंदगी की कुछ चीजें बदलने की कोशिश नहीं करेंगे? इस कहानी में काफी कुछ दिखाने की गुंजाइश थी, लेकिन अफसोस कि फिल्म इन सवालों के जवाब ठीक से नहीं दे पाती.

अब बात करते हैं समर की, जो खुद को भले ही एक प्यार करने वाला इंसान समझता हो, लेकिन असल में ऐसा बिल्कुल नहीं है. वो अपनी जिंदगी के बारे में झूठ बोलता है, अपने पड़ोसी की जासूसी करता है और उसके आपत्तिजनक वीडियो तक रिकॉर्ड करता है. इतना ही नहीं, उसे जल्द ही समझ आ जाता है कि किरण को भविष्य के बारे में पता है और इस जानकारी का इस्तेमाल करके वो सट्टा लगाकर पैसे भी कमा सकता है. यानी यहां प्यार और किस्मत से ज्यादा पैसे कमाने का खेल चल रहा है.

लेकिन फिर अचानक समर को किरण से प्यार हो जाता है. जब उसका प्यार जुनून में बदलने लगता है, तो असली परेशानी शुरू होती है. किरण के मना करने पर समर ये बात स्वीकार नहीं कर पाता. वो फोन का इस्तेमाल करके किरण की जिंदगी से खिलवाड़ करता है और उसके कम उम्र वाले रूप को अपने प्यार में फंसाने की कोशिश करता है. अगर फिल्म डर में राहुल था, तो इसमें समर है. दोनों किरदारों को देखकर यही लगता है कि इन्हें समझने की जरूरत है कि किसी का पीछा करना और उसे जबरदस्ती अपने साथ रखने की कोशिश करना प्यार नहीं होता.

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कहां चूक गई फिल्म?

फिल्म में प्यार और जुनून के बीच के अंतर को दिखाने की कोशिश की गई है. साथ ही ये सवाल भी उठाया गया है कि क्या अतीत को बदलकर दिल से जुड़े फैसले बदले जा सकते हैं? फिल्म इशारा करती है कि कुछ चीजें शायद किस्मत में लिखी होती हैं और उन्हें बदलने की कितनी भी कोशिश कर लो, सब कुछ हमारे हिसाब से नहीं होता. इस आइडिया पर एक अच्छी इमोशनल थ्रिलर बन सकती थी, लेकिन फिल्म की कहानी इन बातों को गहराई से दिखा ही नहीं पाती.

इसके बाद फिल्म में ऐसी गड़बड़ियां सामने आती हैं कि आप सोचने लगते हैं कि आखिर हो क्या रहा है. पूरी कहानी टाइम ट्रैवल पर आधारित है, लेकिन इसमें टाइम ट्रैवल के नियम ही साफ नहीं हैं. समर और किरण के बीच ये कनेक्शन क्यों बना? अगर वो अतीत में कुछ बदलने की कोशिश करते हैं, तो उसका क्या असर होता है? और समय के साथ इस तरह की छेड़छाड़ का खामियाजा किरण को क्यों भुगतना पड़ता है? फिल्म ये सवाल तो उठाती है, लेकिन इनके जवाब नहीं देती. एक समय के बाद आप रहस्य सुलझाने की कोशिश छोड़ देते हैं और सोचने लगते हैं कि क्या फिल्म के लेखकों को खुद भी इसकी कहानी समझ आई थी या नहीं.

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फिल्म में तारीखों और टाइमलाइन से जुड़ी गलतियां भी हैं. धुरंधर 2 मार्च में रिलीज हुई, जबकि एमएस धोनी 30 सितंबर को रिलीज हुई थी. ऐसे में 28 सितंबर को दोनों फिल्मों का थिएटर में चलना कैसे संभव है? जब आपकी कहानी तारीखों, ऐतिहासिक घटनाओं और फिल्मों से जुड़ी जानकारियों पर टिकी हो, तो इन बातों का सही होना जरूरी है. लेकिन यहां ऐसी गलतियां कहानी का मजा खराब करती हैं और ऑडियंस का ध्यान फिल्म से हटा देती हैं. 

दमदार रहा पहला हाफ, दूसरा फीका

फिल्म का पहला हाफ यानी शुरुआती हिस्सा अच्छा लगता है, क्योंकि कहानी का आइडिया नया है और आगे क्या होगा, इसे जानने की उत्सुकता बनी रहती है. लेकिन दूसरे हाफ में कहानी पूरी तरह बिखर जाती है. इसमें इतने सारे ट्विस्ट और मोड़ आ जाते हैं कि चीजें समझना मुश्किल हो जाता है. कई सवाल अधूरे रह जाते हैं और उनके जवाब भी नहीं मिलते. फिल्म चाहती है कि दर्शक हर छोटी-बड़ी बात पर ध्यान दें, लेकिन आखिर में ऐसा लगता है कि इतनी मेहनत करने के बाद भी कुछ खास हासिल नहीं हुआ.

कैसा है सोनाक्षी और जहीर का काम?

अब बात करते हैं एक्टिंग की, सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल की केमिस्ट्री सोशल मीडिया रील्स में जितनी अच्छी लगती है, फिल्म में उतनी असरदार नहीं लगती. दोनों के बीच दोस्ताना अंदाज और सहजता जरूर दिखाई देती है. साथ में उनके कुछ सीन अच्छे भी लगते हैं, लेकिन सिर्फ इतनी-सी बात पूरी फिल्म को संभाल नहीं सकती. इसके लिए कहानी का मजबूत होना भी जरूरी है.

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जहीर इकबाल समर के किरदार में ठीक लगते हैं, खासकर तब जब उनका प्यार धीरे-धीरे खतरनाक जुनून में बदलने लगता है. लेकिन उनके किरदार को और गहराई से लिखे जाने की जरूरत थी. समर कभी चालाकी से झूठ बोलता है, तो कभी जुनूनी आशिक बन जाता है. इन दोनों रूपों के अलावा उसके किरदार में कुछ और देखने को नहीं मिलता.

वहीं, सोनाक्षी सिन्हा किरण के किरदार में सहज लगती हैं. लेकिन उनके किरदार को भी बेहतर तरीके से लिखा जा सकता था. खासकर किरण के एक लेखिका होने की बात को कहानी में ज्यादा अच्छे से दिखाया जाना चाहिए था. जैसे-जैसे उसकी जिंदगी में परेशानियां बढ़ती हैं, वैसे-वैसे उसके किरदार में भी बदलाव और भावनाएं दिखनी चाहिए थीं. लेकिन फिल्म इस पहलू पर ज्यादा ध्यान नहीं देती.

किरण के पति के किरदार से बड़े पर्दे पर डेब्यू कर रहे अंकित गुप्ता की एक्टिंग ठीक है, लेकिन वो कोई खास छाप नहीं छोड़ पाते. बाकी कलाकारों को भी कहानी में ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं मिलता. फिल्म में एक साथ इतनी सारी चीजें दिखाने की कोशिश की गई है कि किसी भी किरदार को ठीक से उभरने का मौका नहीं मिल पाता.

कुल मिलाकर फिल्म तू है मेरी किरण का आइडिया अच्छा है. फिल्म का पहला हाफ भी आपको बांधे रखता है और प्यार, जुनून और किस्मत को लेकर कुछ दिलचस्प सवाल उठाता है. लेकिन ऑडियंस को उत्सुक रखना और उन्हें उलझाकर छोड़ देना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. ये फिल्म कई बार दर्शकों को उत्सुक करने के बजाय कन्फ्यूज कर देती है. समर की तरह फिल्म भी चाहती है कि हर चीज उसके हिसाब से हो और कहानी को अपने तरीके से आगे बढ़ाया जाए. लेकिन अफसोस कि यहां कहानी और स्क्रीनप्ले, दोनों ही उसका साथ नहीं देते.

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