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Main Vaapas Aaunga Review: इम्तियाज अली की बेस्ट लव स्टोरी में बंटवारा है ट्रेजेडी, एक्टिंग की मास्टरक्लास है फिल्म

नसीरुद्दीन शाह, दिलजीत दोसांझ, वेदांग रैना और शरवरी स्टारर 'मैं वापस आऊंगा' सिर्फ एक लव स्टोरी नहीं, बल्कि भारत-पाकिस्तान बंटवारे के उस दर्द की दास्तान है जो एक पूरी पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा ट्रॉमा था. मगर उस भयानक दौर की कहानी कहते हुए भी इस फिल्म में नफरत के रंग का एक भी छींटा नहीं मिलता. पढ़िए इस फिल्म का पूरा रिव्यू.

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'मैं वापस आऊंगा': फिल्म रिव्यू (Photo: ITGD)
'मैं वापस आऊंगा': फिल्म रिव्यू (Photo: ITGD)
फिल्म:मैं वापस आऊंगा
4.5/5
  • कलाकार : नसीरुद्दीन शाह, दिलजीत दोसांझ, वेदांग रैना, शरवरी, दानिश पंडोर, रजत कपूर
  • निर्देशक :इम्तियाज अली

जब कहानी के इमोशन दिल पर किसी प्रकोप की तरह टूटें, बच के निकल जाने की कोई गुंजाइश न रहे. जब इस बात का कोई मतलब न रह जाए कि आप अपनी भावनाओं की धुरी पर कितनी मजबूती से टिके रहने वाले व्यक्ति हैं. जब दिल के उन कोनों में भी बयां न कर पाने लायक इमोशन उमड़ने लगें, जो दिल में आजतक कहां मौजूद थे इसकी खबर भी आपको नहीं थी— तब मानिएगा कि आपका सामना एक उम्दा लव स्टोरी से हुआ है. और इम्तियाज की 'मैं वापस आऊंगा' वही लव स्टोरी है.

एक लकीर की बांटी हुई लव स्टोरी

नसीरुद्दीन शाह बंटवारे में पंजाब आए एक बुजुर्ग सरदार के रोल में हैं. उनके दिल में आज भी उनका वो घर-जमीन फांस बनकर धंसा हुआ है, जो सरगोधा में था. सरगोधा, जो 1947 में पाकिस्तान के हिस्से चला गया. तबीयत बिगड़ती है तो सरदार जी को अपना पहला प्यार याद आने लगता है. उनका निकनेम कीनू हुआ करता था. यंग कीनू (वेदांग रैना) को अपने कॉलेज में पढ़ने वाली जिया (शरवरी) से इश्क हुआ था. अपने प्यार को याद करते सरदार जी मौत के बहुत करीब खड़े हैं लेकिन सांस नहीं छोड़ पा रहे.

सरदार जी का पोता निर्वैर (दिलजीत दोसांझ) एक कन्फ्यूज लड़का है जो अपनी गर्लफ्रेंड (बनिता संधू) के साथ रिलेशनशिप में कमिटमेंट से घबराता है. उसके पास विदेश में बड़ी नौकरी तो है मगर पैशन की कमी को पूरा करने के लिए स्टैंड-अप कॉमेडी में हाथ आजमाते रहता है. दादा की खबर सुनकर वो वापस लौटा है और कहानी में हमारी नजर बनता है.

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सरदार जी अजीब-अजीब बातें करने लगे हैं- चांद पर मैच है. मार्स (मंगल ग्रह) के लोग चांद पर कब्जा करने लगे हैं. हिटलर भी मार्स से था, चीन की दीवार चांद से दिखती है. 

निर्वैर जब सरदार जी की बातों को समझना-खंगालना शुरू करता है तो उसे समझ आता है कि ये चांद, मार्स, आग सब कितने बड़े और सटीक प्रतीक हैं. उसे समझ आता है कि दादाजी की जान किसी अधूरे काम के लिए अटकी हुई है, जिसे पूरा करने वो सरगोधा जाना चाहते हैं. ये काम कीनू और जिया की लव स्टोरी से जुड़ा है. भारत-पाकिस्तान का बंटवारा इस लव स्टोरी में ट्रेजेडी बनकर आया था.

निर्वैर अपने दादाजी की बातों को सुलझाने चला है, बंटवारे में उसके घर-परिवार में क्या-क्या हुआ ये जान रहा है. उसे वो गांठ खोलनी है जिसमें सरदार जी की आखिरी सांस बंधी है, ताकि 'इतनी लंबी और खराब' जिंदगी जीने के बाद कम से कम वो सुकून से इस दुनिया से विदा ले सकें. क्या कमिटमेंट के नाम पर चोक कर जाने वाला निर्वैर वो गांठ खोल पाएगा? क्या कीनू और जिया की लव स्टोरी की वो फांस निकल पाएगी? यही 'मैं वापस आऊंगा' की कहानी है.

एक नहीं दो लव स्टोरीज

इम्तियाज अली की फिल्म में एक नहीं, दो प्रेम कहानियां हैं— कीनू और जिया के साथ-साथ, सरदार जी और सरगोधा की भी एक लव स्टोरी है. दोनों कहानियों में ट्रेजेडी एक ही है— बंटवारा.

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कीनू जब इश्क में दीवाना था, उसी वक्त लोग बंटवारे की नफरत में पागल थे. 'मैं वापस आऊंगा' आपको बंटवारे की वो साइड दिखाती है जिसे पंजाब की एक पूरी पीढ़ी ने पर्सनली भुगता. और पर्सनल से ज्यादा यूनिवर्सल कुछ नहीं होता. इम्तियाज की फिल्म बंटवारे को उसके राजनीतिक और धार्मिक रंगों में नहीं उतारती, जो हमने ऐसी कहानियों में खूब देखा है. इस कहानी का कोई दिखने वाला विलेन नहीं है. 'मैं वापस आऊंगा' का विलेन बंटवारा है और ये कहानी के हीरो या किरदारों की पहुंच से बहुत बाहर की चीज है.

निर्वैर अपने एक स्टैंड-अप एक्ट में भारत को दो हिस्सों में बांटने वाली रैडक्लिफ लाइन का किस्सा सुनाता है. कैसे दिल्ली के एक बंगले में बैठे एक आदमी ने 5 हफ्तों में एक देश के दो टुकड़े करने वाली लकीर खींच दी थी. कीनू और जिया की लव स्टोरी में आपको लकीर खींचे जाने से पहले, बंटवारे की आहट मिलने से हुए दंगे दिखते हैं. 

लेकिन इतनी बड़ी ट्रेजेडी दिखाते हुए इम्तियाज की नजर बंटवारे को समेटने पर नहीं जाती. उनका फोकस लव स्टोरी पर ही रहता है क्योंकि बंटवारे का असली असर तो वहीं है, दिलों पर. उनका फोकस उन लोगों पर रहता है जिन्होंने फर्स्ट हैंड ये बंटवारा जिया है. एक सीन में निर्वैर खीझ कर, अपने दादा जी के छोटे भाई से कह रहा है 'ऐसा क्या फंसा रह गया है वहां'. जवाब मिलता है 'कैसे समझेंगे आप? आप थे वहां?' लेकिन क्या उन लोगों ने जो जहर पिया, वो उनकी अगली पीढ़ियों पर कोई असर नहीं डालेगा? ये सीक्वेंस 'मैं वापस आऊंगा' का सार है.

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उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में बैठे मेरे दादा-दादी को इस बंटवारे की हवा भी छूकर नहीं गुजरी. उन्हें सिर्फ इसकी खबरें मिलती थीं. मेरे लिए, मेरे घरवालों के लिए आज किसी पर ये सवाल उठाना बहुत आसान है कि भारत के लिए नासूर बन चुके पाकिस्तान में आपका ऐसा क्या फंसा है जो याद से नहीं जाता?

लेकिन ये सवाल कीनू के परिवार से नहीं किया जा सकता जिनके मर्द अपने घर की औरतों को सरगोधा वाले पड़ोसी की हिफाजत में छोड़कर अमृतसर भागे थे. ये सोचकर कि यहां कुछ इंतजाम करने, आग ठंडी होने पर उन्हें ले आएंगे. मगर वो आग सब निगल गई. उन औरतों के साथ जो हुआ वो स्क्रीन पर देखकर आपका दिल दहल जाएगा. उस ट्रॉमा का असर ये है कि पाकिस्तान से आने वाली ट्रेन के टाइम पर एक चाचा 18 साल से रोज अमृतसर स्टेशन पहुंचकर खड़ा हो जाता है.

और इस आग के बीच कीनू और जिया की लव स्टोरी कैसी रही होगी? उस जवान सरदार ने अपनी प्रेमिका से वापस आने का वादा किया था. 95 की उम्र में वो सरदार जी अब मरने को हैं, लेकिन मर भी नहीं पा रहे क्योंकि वादा अधूरा है. इम्तियाज ने 'मैं वापस आऊंगा' में अधूरे इश्क की जो तड़प दिखाई है, वैसी किसी और ने नहीं दिखाई.

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राइटिंग की चॉइस ने फिल्म को बनाया ग्रेट

इम्तियाज अली और नयनिका मेहतानी की राइटिंग को सलाम रहेगा कि उन्होंने बंटवारे के दर्द को एक लव स्टोरी में ऐसा पिरोया है कि फिल्म में दोनों ही चीजें इमोशन्स का दरिया बहाती हैं. इस राइटिंग ने अपने प्लॉट और नैरेटिव पर कमाल का कंट्रोल रखा है. बंटवारे की कहानियों में नफरत का उतर आना और एक लव स्टोरी में किसी को विलेन बना देना, ये दोनों काम बहुत आसान हैं. लेकिन 'मैं वापस आऊंगा' मुश्किल रास्ता चुनती है.

आप हमारे देश की सबसे बड़ी ट्रेजेडी देख रहे हैं, लेकिन आपको कहीं नफरत वाले रंग का एक छींटा नहीं मिलेगा. दंगों के पागलपन में आपको इंसान की वहशत दिखेगी, धर्म की या राजनीति की नहीं. इस एक राइटिंग चॉइस ने 'मैं वापस आऊंगा' को एक ग्रेट लव स्टोरी बना दिया है. साथ ही ये बंटवारे पर बनी सबसे बेहतरीन फिल्मों में भी बहुत ऊपर गिनी जाएगी. कहानी में किरदारों की भरमार है, लेकिन सबकी कहानी का आर्क कंप्लीट होता है. सबकी कहानियों को क्लोजर मिलता है.

आप फिल्मों में यंग हीरोज की लव स्टोरी को क्लोजर मिलने पर कई बार मुस्कुराए होंगे, खुशी हुई होगी. लेकिन एक 95 साल के बूढ़े की अधूरी प्रेम कहानी के क्लोजर के लिए आप खुद को थियेटर में प्रार्थना करते पाएंगे. और पूरी फिल्म खत्म होने के बाद, अंत में दिलजीत का गाना 'क्या कमाल है' देखना न भूलिएगा. ये गाना जीनियस इम्तियाज का सबसे शानदार कमाल है.

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एक्टिंग की मास्टरक्लास है 'मैं वापस आऊंगा'

सरदारजी के रोल में नसीरुद्दीन शाह को देखना, एक्टिंग की मास्टरक्लास में बैठने जैसा है. 95 साल के बूढ़े के रोल में, उन्हें अपने शरीर से ज्यादा काम नहीं लेना था, क्योंकि ये किरदार बेड पर है. तो उन्होंने अपने चेहरे को इमोशन की हर बीट उतारने वाला कैनवास बना दिया है. 'मैं वापस आऊंगा' के लिए अगर उन्हें नेशनल अवॉर्ड नहीं मिलता तो यही लगेगा कि इस दुनिया में कुछ तो गड़बड़ है.

इसी किरदार की जवानी दिखा रहे वेदांग रैना मात्र दो फिल्म पुराने एक्टर हैं. मगर एक यंग-शर्मीले-शायर मिजाज सरदार के रोल को उन्होंने जैसे जिंदा किया है, वो सीधा आपके दिल में उतरता है. उसकी प्रेमिका, अदाबाज-चुलबुली-शैतान-बहादुर जिया के रोल में शरवरी बेहतरीन हैं. 'मैं वापस आऊंगा' शरवरी के लिए वो फिल्म होगी जिसकी तलाश हर यंग एक्ट्रेस को होती है. और कहानी में हमारी नजर बने दिलजीत तो पानी जैसे कलाकार हैं. कोई इमोशन, कोई एक्सप्रेशन, कोई सीन... दिलजीत कुछ गलत कर ही नहीं सकते.

दानिश पंडोर ने 'धुरंधर' से अलग रेंज एक्सप्लोर की है. मनीष चौधरी अरसे बाद एक पॉजिटिव किरदार में बेहतरीन लगे हैं. संजय सूरी को आप पहचान पाएं उससे पहले ही वो अपने काम से आप पर असर छोड़ जाते हैं. सरदारजी के छोटे भाई का रोल करने वाले सीनियर एक्टर, रजत कपूर और एक-एक सपोर्टिंग कलाकार की परफॉर्मेंस ने 'मैं वापस आऊंगा' को ईंधन दिया है.

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इम्तियाज ने पहले ही कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी थी. ए आर रहमान के म्यूजिक ने कहानी को और ऊपर उठा दिया. गानों में तो रहमान का जादू है ही. मगर बैकग्राउंड स्कोर में जिस तरह सबसे महत्वपूर्ण जगहों पर उन्होंने सिर्फ हारमोनियम का यूज किया है, वो कमाल है. 'मैं वापस आऊंगा' के एक-एक डिपार्टमेंट ने ऐसा जानदार काम किया है कि सबका जोर मिलकर एक अद्भुत सिनेमाई-जादू बुनता है.

इम्तियाज अली की सबसे बेहतरीन फिल्म

मीडिया स्क्रीनिंग में ज्यादातर, अपनी फिल्मी समझ का आरी-रंधा लेकर फिल्म को काटने-छीलने की तैयारी में हमारे जैसे लोग ही आते हैं. लेकिन 'मैं वापस आऊंगा' में थोड़ा आगे बढ़ते ही इन सब लोगों ने अपने औजार-हथियार इम्तियाज के हवाले कर दिए. फर्स्ट हाफ में जब इम्तियाज फिल्म अपना जादू बुनना शुरू कर रहे थे, तो कुछ लोग जरूर फोन-वोन छूते, कुछ खुड़क-खुराफात करते दिखे. लेकिन आधे घंटे के अंदर 'मैं वापस आऊंगा' सबके कंधे पर सवार थी.

फिल्म खत्म होने तक लोग कई-कई राउंड रोए हैं, सुबकने की आवाजें थियेटर में हर तरफ से आ रही थीं. मैं खुद किसी फिल्म में कब और इस कदर रोया था, याद भी नहीं आता. लोग सीटों से उठना नहीं चाहते थे. जबकि आजकल मीडिया स्क्रीनिंग में सबसे ज्यादा लोग कंटेंट क्रिएटर्स-यूट्यूबर्स की जमात से आते हैं, जो क्लाइमैक्स खत्म होने से पहले ही भागकर अपने कैमरे-माइक लेकर तैनात हो जाते हैं. और सिनेमा के लिए कितनी शानदार बात है कि एक तरफ हम 'धुरंधर' में पाकिस्तान को घर में घुसकर मारने की ललकार को सेलिब्रेट कर रहे हैं. दूसरी तरफ 'मैं वापस आऊंगा' से उन लोगों के दिल पर हाथ रख रहे हैं, जिनकी जड़ें अब उस पार चली गई हैं.

हो सकता है कि ये रिव्यू पढ़ते हुए आपको लगे कि मैं भावनाओं में ज्यादा बह गया. लेकिन इम्तियाज की लव स्टोरीज जब सही सुर पकड़ती हैं तो ऐसी लहर बन जाती हैं कि फिर आपके बहाव की दिशा वही तय करती हैं. और यहां तो इम्तियाज से अपना वादा हो चुका है कि थियेटर में एक और शो के लिए 'मैं वापस आऊंगा'.

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