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'मां बहन' रिव्यू: समाज के बाप-भाई का गेम पलट देता है माधुरी-तृप्ति का मजेदार सटायर

माधुरी दीक्षित, तृप्ति डिमरी और धारणा दुर्गा स्टारर फिल्म 'मां बहन' नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो चुकी है. महिलाओं को लेकर गढ़े गए नजरिए पर एक चालाकी भरा करारा व्यंग्य (सटायर) करती ये फिल्म मजेदार सिचुएशंस, चटपटे डायलॉग्स और दमदार पंच लाइन्स के साथ आई है. माधुरी और तृप्ति का काम भी बहुत दमदार है.

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'मां बहन' रिव्यू (Photo: IMDB)
'मां बहन' रिव्यू (Photo: IMDB)
फिल्म:मां बहन
3/5
  • कलाकार : माधुरी दीक्षित, तृप्ति डिमरी, धारणा दुर्गा, गीतांजलि कुलकर्णी, रवि किशन
  • निर्देशक :सुरेश त्रिवेणी

अपनी जवानी के दिनों से ही मोहल्ले की तिरछी नजरों का शिकार रही एक 'स्टाइलिश' विधवा महिला के घर में उसके पड़ोसी की मौत हो गई है. मोहल्ले में स्कैन्डल और गॉसिप का हॉट-टॉपिक रहने वाली औरत के यहां ऐसा कुछ होने की खबर क्या कांड करवा सकती है, ये सोच पाना मुश्किल नहीं है. ऐसे में इस कांड पर मिट्टी डालना ही एकमात्र हल है. नेटफ्लिक्स की फिल्म मां बहन इस प्लॉट को, समाज पर एक चालाकी भरे व्यंग्य में ऐसे बदलती है कि देखकर मजा आता है.

नाटकीयता का डोज दो पॉइंट बढ़ाकर दमदार सटायर करने वाला क्लासिक फिल्मी स्टाइल पिछले कुछ समय से थोड़ा गायब सा होने लगा है. मां बहन इस स्टाइल को वापस लाकर एक मजेदार फिल्म में बदल देती है, जिसमें कमाल के वन-लाइनर हैं. व्यंग्य दमदार तब होता है जब सॉलिड सेटअप के साथ करारी पंचलाइन आती है, और मां बहन में ऐसी पंच लाइन्स की भरमार है.

'चरित्र' की मौत और कैरेक्टर सर्टिफिकेट का खेल 
कहानी में कांड की लोकेशन रेखा (माधुरी दीक्षित) का घर है, जो शादी के कुछ ही सालों बाद दुनिया छोड़ गए उसके पति की एकमात्र अमानत है. पड़ोसी गुप्ता जी (रवि किशन) की मौत रेखा के घर पर कैसे हुई, ये तो आप फिल्म में ही देखिए मगर इतना जान लीजिए कि उनका पूरा नाम चरित्र कुमार गुप्ता है.

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रेखा ने चरित्र की मौत का मामला हैन्डल करने के लिए अपनी दोनों बेटियों को इमरजेंसी कॉल किया है. बड़ी बेटी जया (तृप्ति डिमरी), सास बिना ससुराल में पति के अंडरवियर धोने से लेकर, तिड़वा देवरों के लिए दर्जन भर रोटियां बनाने वाली 'आदर्श बहू' है. छोटी बेटी सुषमा (धारणा दुर्गा), वायरल होने के ख्वाब पाले बैठी कंटेंट क्रिएटर है.

अब रेखा, जया और सुषमा मोहल्ले के 'चरित्र' का मैटर सुलझाने में जुटी हैं. इन मां बहन के नामों से आपको सारी महिलाओं की पसंद कहलाने वाले एक डिटर्जेंट पाउडर की ऐड याद आ सकती है. दिमाग में ये भी सवाल आएगा कि 'हेमा' कहां है? चिंता न करें, इस कहानी में वो भी मिलेगी.

मोहल्ले की सेटिंग में घटने वाली ये कहानी मोस्टली दो घरों के बीच ही पूरी हो जाती है. मां बहन में किरदार अपने घर and गली के बाहर बहुत रेयर ही नजर आते हैं. मगर मां बहन का मूवमेंट इसके सीन्स में नहीं, कहानी के चटपटे डायलॉग, सिचुएशन और दमदार पंच लाइन्स में है. मां बहन पहले रेखा, जया और सुषमा को आपसे उस इमेज के साथ मिलवाती है जो उनके मोहल्ले ने उनके लिए गढ़ी हैं.

बिन मर्द के घर में आजाद रहतीं ये तीनों महिलाएं मोहल्ले में काफी 'चरित्रहीन' मानी जाती हैं. इस बात से सबसे ज्यादा सतर्क और खतरे में रहती हैं मिसेज गुप्ता (गीतांजलि कुलकर्णी), जिन्हें आपने वेब सीरीज गुल्लक में 'मम्मी मिश्रा' के रोल में देखा होगा. उन्हें लगता है कि रेखा एंड डॉटर्स की बुरी नजर उनके घर में कोई शुभ काम नहीं होने देगी. बात यहां तक पहुंच जाती है कि रेखा की दोनों बेटियां भी उसे वैसे ही जज करती हैं, जैसे मोहल्ला करता है.

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एक तिनका भी न हिलाने वाले मगर ऑर्डर झाड़ने वाले ससुर-पति-देवर, मोहल्ले की मर्दों की गढ़ी इमेज से औरतों को जज करने वाली पड़ोसनें, अपनी कुंठा न मिटा पाने की वजह से औरतों को चरित्र-प्रमाण-पत्र देने वाले मर्द, 'आधी घरवाली' कहकर साली के रिश्ते में हल्के से अपनी ठरक सरका देने वाले जीजा— मां बहन, समाज के इन सारे छुपे हुए कोनों पर हेलोजेन मारकर, मजेदार डायलॉग्स के साथ उतारती है.

एक्टर्स का दमदार काम, छोटी-मोटी दिक्कतें
मां बहन की सबसे बड़ी खासियत इसका चटपटा ट्रीटमेंट है जो लगातार आपको एक के बाद एक मजेदार और फनी लाइनें देता रहता है, जो मोस्टली मजेदार हैं भी. मेनस्ट्रीम सिनेमा में लंबे समय तक ग्लैमर के लिए ही जानी गईं माधुरी दीक्षित को, एक कस्बाई महिला के रोल में देखना बहुत इंटेरेस्टिंग है.

तृप्ति डिमरी के हिस्से दमदार रोल आया है, जो उनकी पॉपुलर ग्लैमरस इमेज से हटकर उन्हें अपनी दमदार एक्टिंग दिखाने का मौका देता है. धारणा दुर्गा ने इतना बेहतरीन काम किया है कि उनकी सुषमा को स्क्रीन पर और देखने का मन करता है. रवि किशन नेगेटिव रोल में हैं और वो ऐसे दमदार कलाकार हैं कि वहां गलती की कोई गुंजाइश ही नहीं होती. और मिसेज गुप्ता के रोल में गीतांजलि हमेशा की तरह आपको फिर इंप्रेस करती हैं. रेखा के ऑर्डर झाड़ने वाले पति के रोल में शार्दुल भारद्वाज को देखकर मजा आता है.

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मगर मां बहन में अपने हिस्से की छोटी-छोटी दिक्कतें भी हैं. सिर्फ दो घंटे लंबी होने के बावजूद ये फिल्म बीच-बीच में स्लो फील होती है. इसकी बड़ी वजह बैकग्राउंड स्कोर है, जो फिल्म के मूड और किरदारों की एनर्जी को मैच करता तो मजा और बढ़ जाता. शादी से पहले वाली रेखा को थोड़ा सा दिखाना कैरेक्टर डेवलपमेंट को दमदार बना देता. डायरेक्टर सुरेश त्रिवेणी ने इससे पहले तुम्हारी सुलू (2017) और जलसा (2022) बनाई हैं, जो बहुत सॉलिड फिल्में थीं. मां बहन का नैरेटिव हैन्डल करने में वो थोड़े से चूके हैं, मगर सटायर और ह्यूमर बचा हुआ है.  

पुलिस ऑफिसर बने अरुणोदय सिंह के किरदार को फिल्म वेस्ट कर देती है. माधुरी के प्रेमी, सुषमा के पिता बने परेश रावल की स्टोरी अच्छे से ट्रीट होती तो फिल्म के सटायर को और वजन मिलता. लेकिन ये छोटी-छोटी दिक्कतें फिल्म के मजे में बहुत रुकावट नहीं बनतीं. समाज में गाली का पर्यायवाची बन चुके 'मां-बहन' को ये फिल्म जिस तरह उलटती है, वो जरूर देखा जाना चाहिए.

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