सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ का 2 मिनट 44 सेकंड लंबा ट्रेलर रिलीज हो गया है. फिल्म को लोककथा, फैंटेसी, हॉरर और आस्था के मिक्सचर के तौर पर पेश किया गया है. कहानी एक रहस्यमयी जंगल, वन देवी और ‘भुट्टका’ नाम की अंधेरी शक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती है. फिल्म 25 सितंबर को सिनेमाघरों में आएगी.
लेकिन ट्रेलर देखने के बाद पहला सवाल यही आता है- क्या ये बड़ी स्क्रीन की फिल्म है या किसी टीवी सीरियल का एक्सटेंडेड एपिसोड?
और ये बात इसलिए नहीं क्योंकि फिल्म बालाजी के बैनर तले बनी है. असली दिक्कत इसके विजुअल्स और VFX में नजर आती है. कुछ सीन्स में एक्शन तो है, लेकिन उसका रिएक्शन गायब है. VFX को थोड़ा ठहरकर देखें तो एनिमेशन की कमियां साफ नजर आती हैं. जिस रहस्यमयी और डरावनी दुनिया में हमें खींचना चाहिए, वही कई जगह मूड ऑफ कर देती है.
ट्रेलर का पूरा फोकस सिद्धार्थ मल्होत्रा पर है. उनका किरदार नास्तिक है, जो छठ पूजा की छुट्टी के बहाने गोवा घूमने जाना चाहता है, लेकिन अपने काम की वजह से गांव पहुंचता है और फिर प्रतिबंधित जंगल, वन देवी और अजीबोगरीब शक्तियों के जाल में फंस जाता है. कहानी में पुनर्जन्म या पिछले जन्म से जुड़े कनेक्शन की भी झलक मिलती है. सिद्धार्थ को आने वाले फ्लैशबैक देखकर लगता है कि उनके किरदार के अतीत में इस जंगल का कोई बड़ा राज छिपा है.
मगर समस्या ये है कि सिद्धार्थ का लुक बदलने के बावजूद किरदार में बहुत ज्यादा बदलाव महसूस नहीं होता. वो रहस्यमयी किरदार से ज्यादा अपने वही चॉकलेटी हीरो वाले अंदाज में नजर आते हैं. उल्टा सुनील ग्रोवर का बदला हुआ लुक ज्यादा ध्यान खींचता है.
तमन्ना की मौजूदगी जरूर है, लेकिन ट्रेलर में उन्हें बोलने का ज्यादा मौका नहीं मिला. कहानी में उनकी भूमिका अहम लगती है, फिर भी स्क्रीन पर सिद्धार्थ का दबदबा इतना ज्यादा है कि तमन्ना पीछे छूट जाती हैं.
सबसे ज्यादा खटकता है छठ पूजा वाला हिस्सा. छठ बिहार-पूर्वांचल की बेहद खास लोक-परंपरा वाला पर्व है और इसमें महिलाओं के साथ पुरुष भी व्रत और पूजा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. मेकर्स ने इसे भव्य बनाने की कोशिश की है, मगर कई जगह ये जरूरत से ज्यादा फिल्मी लगता है.
लाल साड़ी पहनना अपने आप में गलत नहीं है- लेकिन छठ महापर्व में पीले रंग का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है, क्योंकि यह रंग सूर्य देव की ऊर्जा, तेज और जीवनदायिनी किरणों का प्रतीक माना जाता है. लेकिन अगर पूरी भीड़ को एक ही ग्लैमरस पैटर्न में दिखाया जाए तो त्योहार की असली विविधता गायब हो जाती है.
और यहां एक बड़ी बात मिस होती दिखती है- छठ सिर्फ महिलाओं का त्योहार नहीं है. पुरुष भी व्रत रखते हैं और पूरी कम्युनिटी मिलकर इस पर्व को निभाती है. यही छठ की खासियत है. बिहार सरकार और पर्यटन स्रोत भी इसे चार दिन चलने वाला सामुदायिक पर्व बताते हैं, जिसमें अस्त और उगते दोनों सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है.
‘तुंबाड’, ‘कांतारा’ और ‘ब्रम्हायुगम’ के बाद लोककथा वाले सिनेमा से उम्मीदें बढ़ी हैं. ‘पंचायत’ के डायरेक्टर दीपक कुमार मिश्रा का इस बार फोक हॉरर की तरफ जाना भी दिलचस्प है. लेकिन फिलहाल ‘The Vvaan’ का ट्रेलर कहानी से ज्यादा अपने कमजोर VFX और टीवी-सीरियल जैसी फील के कारण याद रह जाता है. जंगल का रहस्य आकर्षित करता है, मगर ट्रेलर ये भरोसा नहीं जगा पाता कि बड़े पर्दे पर ये रहस्य उतना ही दमदार लगेगा.
हालांकि महज ट्रेलर से फिल्म अच्छी होगी या बुरी- ये आंकना गलत होगा. लेकिन देखना दिलचस्प होगा कि ट्रेलर से हटकर कहानी में क्या ट्विस्ट एंड टर्न देखने को मिलते हैं. फिल्म 25 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी.