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बंटवारा, अधूरा प्यार, बिखरा परिवार... 'मैं वापस आऊंगा' की असली ताकत नसीरुद्दीन शाह हैं

'मैं वापस आऊंगा' में नसीरुद्दीन शाह ने बंटवारे का वो दर्द पर्दे पर उतारा है जिसे देखकर हर दर्शक की आंखें नम हो रही हैं. ये फिल्म याद दिलाती है कि बेबाक बयानों के चलते भले ही बॉलीवुड के फिल्ममेकर्स उनसे थोड़ा बचकर चलते हों, लेकिन उनका स्क्रीन पर होना भारतीय सिनेमा के लिए कितना जरूरी है.

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'मैं वापस आऊंगा' में नसीरुद्दीन शाह (Photo: Screengrab)
'मैं वापस आऊंगा' में नसीरुद्दीन शाह (Photo: Screengrab)

इम्तियाज अली की मैं वापस आऊंगा उन इमोशन्स को भी बाहर निकाल देने वाली फिल्म बनकर आई है, जो दिल के किस कोने में छुपे बैठे थे यह आपको याद भी नहीं होगा. इम्तियाज स्टाइल की एक लव स्टोरी, भारत की पीठ पर बना सबसे बड़ा जख्म उघाड़कर उसकी गहराई दिखा देगी, यह किसी ने नहीं सोचा होगा. थिएटर से बाहर निकलते हुए ऐसा लगता है कि उस जख्म का दर्द आपका अपना है, एकदम पर्सनल. यह कमाल जितना इम्तियाज का है, उतना ही इंडियन सिनेमा के उस जीनियस का जिसका नाम अचानक से बीच-बीच में जैसे कहीं गायब सा होने लगता है— नसीरुद्दीन शाह.

50 साल से ज्यादा लंबे करियर में नसीर साहब ने सिनेमा को अपनी सधी हुई अदाकारी की इतनी मिसालें तो दे ही दी हैं कि अब हमें उनके हुनर पर बात करने की जरूरत भी नहीं रही. शायद हमारा वो लेवल भी नहीं है कि नसीर साहब के ब्रिलियंट काम को शब्दों में बांध सकें. लेकिन मैं वापस आऊंगा का रिमाइंडर है कि नसीर के जीनियस काम को मैच करने वाले किरदार न लिखना कितना बड़ा सिनेमाई अपराध है!

मैं वापस आऊंगा में दो अलग-अलग वक्त में एक ही किरदार की कहानी है. 2026 में सरदार ईश्वर सिंह अपनी आखिरी सांसें ले रहे हैं. लेकिन उनकी जान सरगोधा में उलझी हुई है जहां उन्होंने लड़कपन तक की जिंदगी बिताई थी. तब लोग उन्हें कीनू के नाम से जानते थे. जिया के साथ उनका इश्क परवान चढ़ ही रहा था कि अंग्रेजों ने भारत बांट दिया. ईश्वर सिंह भारत चले आए, कीनू सरगोधा में ही रह गया.

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95 साल की उम्र में अस्पताल के बेड पर ईश्वर सिंह को कीनू याद आ रहा है, जिया से किया वादा याद आ रहा है. ईश्वर सिंह की जवानी का रंग वेदांग रैना ने भी बेहतरीन तरीके से उतारा है. लेकिन मौत के मुहाने पर खड़े उस बूढ़े आदमी पर क्या बीत रही है, यह आपको नसीर साहब दिखा रहे हैं.

सिर्फ आंखों से नसीर ने दिखाया बंटवारे का दर्द

मैं वापस आऊंगा में नसीर बंटवारे का एक परिवार पर असर, दो प्रेमियों पर कहर और भारत का इतिहास बदलने वाली उस घटना को देखने वाली नजर हैं. 30 साल का एक्टर अगर 50 साल की उम्र का किरदार अच्छे से निभा ले जाए तो दर्शक बहुत सरप्राइज होकर 'वाओ' वाले अंदाज में रिएक्ट करते हैं. लेकिन मैं वापस आऊंगा में नसीर को देखते हुए आप यह भूल जाएंगे कि उन्होंने भी अपनी उम्र से 20 साल बड़ा किरदार निभाया है. वह खुद 75 के हैं और उनका किरदार 95 साल का.

बालों का रंग बदलकर, चेहरे पर प्रोस्थेटिक्स लगाकर बढ़ी उम्र का दिखना फिर भी आसान है. लेकिन 75 के नसीर को 20 साल बड़ा दिखने के लिए सिर्फ अपनी स्किल्स का ही सहारा था. ऊपर से वह पूरी फिल्म में बेड पर हैं, मतलब बॉडी लैंग्वेज से कोई खास मदद नहीं ले सकते. बचा सिर्फ चेहरा और आंखें और मैं वापस आऊंगा में ईश्वर सिंह के एक-एक इमोशन का सुर नसीर ने सिर्फ आंखों से ही दिखाया है.

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इतिहास की किताबें न जाने कितना वक्त, कितनी महत्वपूर्ण घटनाएं निगल चुकी हैं. बंटवारे में बंटे लोग पाकिस्तान से भारत नहीं आए थे, एक भारत से दूसरे भारत आए थे― यह बात समझने के लिए इतिहास का नहीं, भावनाओं का शब्दकोश उठाना होगा. तभी समझ आएगा कि उन लोगों से उनके हिस्से का भारत ही छूट गया था. मैं वापस आऊंगा में नसीर वही शब्दकोश हैं. ईश्वर सिंह जब अपने ख्यालों में खोने लगते हैं तो फिल्म फ्लैशबैक में चलती है. वहां आप कीनू की कहानी में जो कुछ देखते हैं, वह एक घटना है.

कहानी फ्लैशबैक से लौटने पर बूढ़े सरदार जी की आंखों में जो तड़प आपको दिखती है, वह उस घटना का असली असर है, जो 70 साल बाद भी एक रूह पर इतना वजन रखे हुए है कि वह शरीर से निकल नहीं पा रही. एक पुराने वादे की ऐसी उलझन है जिसमें फांसी ईश्वर सिंह की आखिरी सांस निकल नहीं पा रही और उस तड़प को देखकर आप भी फिल्म देखते हुए दुआ करने लगते हैं कि हे ईश्वर इस आदमी को मृत्यु का आशीर्वाद दो, इसे मुक्त करो.

जब रात को सोया भारत में, सुबह जागा पाकिस्तान में

एक आदमी रात को जिस घर में सोए, सुबह वह दूसरे देश की जमीन पर हो― यह साइंस-फिक्शन फिल्म की कहानी हो सकती है या फिर एक मजबूत हॉरर फिल्म भी. लेकिन भारत का एक टुकड़ा था, जिसके बाशिंदों ने यह हॉरर/फिक्शन रियलिटी में भोगा था. मैं वापस आऊंगा में नसीर उस साइंस फिक्शन के एलियन हैं और उस हॉरर से खौफजदा बच्चा.

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वे एलियन, वे बच्चे रात को जब सोए तो उनका घर भारत की जमीन पर था. वही भारत जिसके लिए वह आंदोलनों-प्रदर्शनों में अंग्रेजी सरकार के लाठी-डंडे झेल रहे थे. अगली सुबह अखबार आया तो नक्शे में वह जमीन पाकिस्तान के हिस्से थी. आपकी जमीन जिस देश में है, उसके लिए देशभक्ति होना बहुत नेचुरल इमोशन है― यह इमोशन का एक फिजिकल कनेक्शन है.

बंटवारे में आए यह लोग कैसे बंटे सोचिए… इमोशन भारत में चला गया और जमीनें पाकिस्तान को. पुश्तैनी जमीनें― जिन्हें बड़ी-बड़ी मजबूरी में बेचने से लोग बचते हैं, ऐसे ही चली गईं. इस बदहवासी का चेहरा मैं वापस आऊंगा में नसीर हैं. उनकी आंखों में आप एक पल में किसी मासूम बच्चे जैसी चमक देखेंगे, और दूसरे ही पल अपना सबकुछ लुटा चुके बूढ़े का सूनापन. ये आंखें नसीर साहब की हैं, उन्होंने कैसे इन्हें काबू किया होगा कि बस उन्हीं के सहारे इम्तियाज ने हमपर भावनाओं का एक पूरा सागर उड़ेल दिया!

नसीर का वो बेबाक तेवर और ईमानदारी

इसका जवाब नसीर साहब के एक्टिंग स्किल्स से ज्यादा शायद आपको उनकी रूह में मिलेगा जिसकी झलक उनके उन बयानों में मिलती है, जिनपर बेमतलब बवाल छिड़ जाता है. जब वह कौमी हिंसा की बात करते हैं, देश के समाज को अलग-अलग लाइनों में बांटती राजनीति की आलोचना करते हैं. नसीर साहब अक्सर एक समुदाय, जाति, धर्म, रंग या राजनीति के चक्कर में दूसरों के लिए घटती सहनशक्ति को हाईलाइट करते हैं. वह समाज की इन कमियों पर भरपूर खीझते भी हैं.

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लेकिन जब पूछा जाता है कि 'इन सब वजहों से विदेश में रहने का ख्याल तो आता होगा?' तो गुस्से को बमुश्किल थमते हुए कहते हैं, 'क्यों आएगा ऐसा ख्याल साहब? यह देश हमारा है, हमारे पिता थे यहां, दादा थे यहां. हम तो यहीं रहेंगे. यहीं रहकर हर गलत चीज की आलोचना करेंगे क्योंकि यह हमारा मुल्क है और हम इसे और बेहतर होते देखना चाहते हैं. न कि वापस उस जगह लौटते हुए, जहां से हमें लगा था कि हम इसे बहुत आगे ले आए हैं!'

यह बेबाक अंदाज-ए-बयां, राजनीति की आलोचना से बचने की झूठी कोशिश भी न करना शायद एक बड़ी वजह है कि अब नसीरुद्दीन शाह बड़े पर्दे पर बहुत कम नजर आते हैं. सोशल मीडिया के दौर में एक बयान भर से फिल्म के हिस्से कितनी नेगेटिविटी आती है, इसके हमने कई उदाहरण देखे हैं. हो सकता है कि इसी से बचने के लिए फिल्ममेकर्स, प्रोडक्शन हाउस उनसे सुरक्षित दूरी बनाकर रखते हों.

मगर नसीर का यही तेवर है जिसने मैं वापस आऊंगा के ईश्वर सिंह को वो ईमानदारी दी है कि हमें एक फिल्मी किरदार का दर्द अपना लग रहा है. कलाकारों में यह तेवर अब दुर्लभ है, शायद इसीलिए किरदारों में यह ईमानदारी भी अब दुर्लभ है. उतनी ही दुर्लभ, जितना पिछले कुछ सालों में नसीरुद्दीन शाह को लंबे स्क्रीनटाइम वाले मजबूत किरदारों में देखना हो चुका है. इम्तियाज अली की मैं वापस आऊंगा आपको याद दिलाती है कि नसीर साहब का बड़े पर्दे पर और ज्यादा दिखना सिनेमा के लिए कितना जरूरी है.

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