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चुनाव से पहले दलित प्रेरणा स्थल की सुध, क्यों जोर मार रहा बीजेपी का आंबेडकरवाद

उत्तर प्रदेश में 22 फीसदी दलित वोटर सत्ता का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखता है, जिसे साधने के लिए सपा से लेकर बीजेपी तक हर दांव आजमा रही है. अखिलेश यादव पीडीए समीकरण के जरिए सत्ता में आने के लिए बेताब हैं तो बीजेपी ने दलित प्रेरणा स्थल और दलित मसीहा आंबेडकर के जरिए काउंटर करने की रणनीति बनाई है.

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दलित वोटों के लिए अखिलेश यादव बनाम योगी आदित्यनाथ (Photo-ITG)
दलित वोटों के लिए अखिलेश यादव बनाम योगी आदित्यनाथ (Photo-ITG)

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी अपनी सोशल इंजीनियरिंग को दुरुस्त करने में जुट गई है. बीजेपी ने दलित समुदाय तक अपनी पहुंच बढ़ाने में जुट गई है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सोमवार को यूपी में डा. भीमराव आंबेडकर की मूर्तियों के ऊपर छतरियां लगाने का ऐलान तो दूसरे दिन नोएडा अथॉरिटी ने नोएडा में बने दलित प्रेरणा स्थल की मरम्मत के लिए 107 करोड़ रुपये खर्च करने की मंजूरी दी है. 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी स्थापना दिवस के मौके पर ऐलान किया कि सरकार ने तय किया है कि प्रदेश में जहां पर भी संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा लगी हैं, उन सभी मूर्तियों के ऊपर छतरियां लगवाने का काम सरकार करेगी.  इसके अलावा सरकार उन पार्कों की चारदीवारी बनवाने और सौंदर्यीकरण का काम करेगी, जहां आंबेडकर की मूर्तियां स्थापित हैं. 

सीएम योगी के ऐलान के दूसरे ही दिन नोएडा सेक्टर-95 में बने 'दलित प्रेरण स्थल' की मरम्मत के लिए 107 करोड़ 77 लाख 
रुपये खर्च करने के प्राधिकरण ने बजट को मंजूरी दी है. अब दलित प्रेरण स्थल की मरम्मत के लिए पैसा नोएडा अथॉरिटी खर्च करेगी जबकि पहले शासन स्तर बनी समिति करती थी. 2027 के चुनाव से ठीक पहले दलित मसीहा कहे जाने वाले आंबेडकर और दलित प्रेरण की सुध योगी सरकार क्यों लेने लगी है? 

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दलित समुदाय का दिल जीतने का प्लान
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह से तरह आंबेडकर की मूर्ती की सुरक्षा की याद आई है और नोएडा प्राधिकरण दलित प्रेरण स्थल की सुध लेने लगा है, उसे बीजेपी की एक व्यापक राजनीतिक मुहिम का हिस्सा माना जा रहा है. बीजेपी की रणनीति दलित अस्मिता और सामाजिक न्याय से जुड़े महापुरुषों के जरिए अपने सियासी समीकरण को मजबूत करने की है. 

बीजेपी ने यूपी में 6 अप्रैल से लेकर 14 अप्रैल तक अंबेडकर जयंती तक कई कार्यक्रमों की शुरुआत कर रही है. पार्टी नेताओं ने कहा कि इन कोशिशों का मकसद सभी समुदायों के 'महापुरुषों' का सम्मान करने की है. इस तरह से बीजेपी अपने दलित नैरेटिव को और मजबूत करने की है ताकि 2027 में दलित समुदाय के दिल में अपनी जगह बना सके. इसीलिए सीएम योगी का आंबेडकर की मूर्तियों पर छतरी निर्माण का ऐलान और दलित प्रेरणा स्थल के रखरखाव के लिए सरकारी खजाना खोल देने एक बड़ा दांव है. 

दलित वोटों को दुरुस्त करने का दांव? 
उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों की निगाहें उस 22फीसदी दलित वोटबैंक पर है, जिसके सहारे मायावती चार बार मुख्यमंत्री रहीं. दलित समाज में सियासी चेतना जगाने वाले बसपा संस्थापक कांशीराम को सहारे सपा से लेकर कांग्रेस और बीजेपी तक अपने राजनीतिक समीकरण को दुरुस्त करने में जुटी हैं, क्योंकि मायावती का सियासी आधार यानि दलित वोटबैंक लगातार खिसकता जा रहा है. ऐसे में सभी पार्टियां दलित मतदाताओं को लुभाने की कवायद में जुटी है. 

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चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाली आजाद समाज पार्टी ने पहले ही मायावती के राजनीतिक गुरु कांशीराम की विरासत पर अपना दावा ठोक दिया है तो कई दलित पार्टियां भी सियासी किस्मत आजमाने के लिए बेताब हैं. कांग्रेस और सपा की नजर भी दलित वोटों पर ही टिकी हुई हैं, जिसके दम पर 2024 के चुनावी फिजा का रुख बदल दिया था. अब दलित-मुस्लिम और अतिपिछड़े वर्ग के वोटबैंक के जरिए 2027 में सपा सत्ता में वापसी करना चाहती है. 

सपा प्रमुख अखिलेश यादव कहते हैं कि सपा लोहिया के साथ  अंबेडकर और कांशीराम के विचारों को लेकर चलेगी.सपा की नजर पूरी तरह से दलित वोटों पर है, जिसके लिए कांशीराम की प्रयोगशाला से निकले हुए तमाम बसपा नेताओं को अपने साथ मिलाया है और उनके जरिए दलितों के विश्वास जीतने की कोशिश कर रहे हैं. यही वजह है कि बीजेपी भी दलितों को साधने की कवायद में जुट गई है. 

सपा के PDA फार्मूले का काउंटर प्लान 
अखिलेश यादव के विनिंग फार्मूले 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) से  2024 में बीजेपी मात खा चुकी है. यूपी की 80  लोकसभा सीट में से सपा 37 सीटें जीती तो बीजेपी 33 सीट पर सिमट गई थी. इसका ही नतीजा था कि बीजेपी बहुमत के आंकड़े से दूर रह गई और सहयोगी दलों के सहारे केंद्र में सरकार बनानी पड़ी.  अखिलेश यादव अपने इस फार्मूले को विस्तार देना चाहते हैं तो सपा ने उसे काउंटर करने की रणनीति बनाई है. 

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योगी सरकार ने दलित  दलित अस्मिता और सामाजिक न्याय से जुड़े महापुरुषों की सुध लेना शुरू कर दिया है. बीजेपी लगातार दलित समुदाय के बीच अपनी पैठ जमाने की कोशिशों में जुटी है. आरएसएस सामाजिक समरसता के जरिए दलित समुदाय के विश्वास को जीतने की कोशिश में है तो योगी सरकार की कोशिश डा. आंबेडकर की मूर्ती और दलित प्रेरण स्थलों की सुरक्षा व मरम्मत कराकर सपा के दलितों के बीच बढ़ते ग्राफ को रोकने की रणनीति है. 

दलितों के मसीहाओं का बीजेपी का सम्मान 
मुख्यमंत्री ने कहा कि दलित समुदाय के आदर्शों से जुड़े सभी स्थलों पर विकास के कार्य कराने के प्रयास किए जाएंगे. संविधान निर्माता डा. आंबेडकर, संत रविदास, वाल्मिकी जी, जहां भी प्रतिमाएं हैं, वहां पर सौंदर्यीकरण कराया जाएगा. दलित प्रेरण स्थलों की पूरी देख रेख की जाएगी. मुख्यमंत्री योगी ने 13 अप्रैल को अंबेडकर से जुड़े स्थलों पर राज्यव्यापी स्वच्छता अभियान चलाने का भी आह्वान किया, जिसके बाद 14 अप्रैल को 'पुष्पांजलि' कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. 14 अप्रैल आंबेडकर जयंती है. 

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले योगी सरकार द्वारा दलित प्रेरणा स्थलों की सुध लेना,दलित वोट बैंक को सीधे साधने, बीएसपी के जनाधार में सेंध लगाने और विपक्षी सपा-बसपा गठबंधन की संभावनाओं को रोकने की एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है. यह कदम दलितों के मसीहाओं का सम्मान कर उन्हें भाजपा के 'विकास' और 'राष्ट्रवाद' के एजेंडे से जोड़ने का प्रयास है. यही वजह है कि लंबे समय से नोएडा के सेक्टर-95 में बने दलित प्रेरण के लिए सरकार अपना खजाना चुनाव से पहले खोल दिया है. 

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योगी सरकार इन पार्कों के रखरखाव के माध्यम से दलित समुदाय के बीच एक सकारात्मक संदेश देना चाहती है. बसपा द्वारा इन स्मारकों को दलित अस्मिता से जोड़े जाने के कारण, इनके रखरखाव को दलितों के सम्मान से भी जोड़कर देखा जाता रहा है. मायावती अक्सर आरोप लगाती रही हैं कि सपा सरकार ने इन पार्कों की अनदेखी की और टिकटों से आए पैसे का इस्तेमाल दूसरी जगहों पर किया. योगी सरकार इन पार्कों की मरम्मत कराकर यह दिखाना चाहती है कि वह दलित महापुरुषों के सम्मान के प्रति गंभीर है.

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