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'थलपति' अब सियासी सुपरस्टार, डेढ़ साल में विजय की आंधी में ऐसे उड़े स्टालिन

पहली बार चुनाव लड़ने मैदान में उतरे विजय के सियासत के भी सुपर स्टार साबित हुए. उनकी पार्टी शुरुआती रुझानों में करीब 110 सीटों पर आगे चल रही है. चुनाव प्रचार के दौरान विरोधी पार्टियां उनके फिल्मी छवि को लेकर उनका मजाक भी बनाती रही हैं, लेकिन विजय ने ये साबित कर दिया है कि को राजनीति के भी पक्के खिलाड़ी बन चुके हैं.

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पहले ही चुनाव में चला विजय का जादू (Photo-PTI)
पहले ही चुनाव में चला विजय का जादू (Photo-PTI)

तारीख थी 27 अक्टूबर 2024 तमिलनाडु के विल्लुपरम जिले का विक्रवंडी गांव एक ऐसे इतिहास का गवाह बन रहा था, जिसने राज्य की सियासत की दिशा बदल दी. 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) की इस पहली जनसभा में उमड़ी लाखों की भीड़ ने यह साफ कर दिया था कि विजय केवल पर्दे के थलपति नहीं, बल्कि जन-जन के नायक बन चुके हैं.  

अपनी पहली ही रैली में विजय का तेवर किसी अनुभवी राजनेता से कम नहीं था. उन्होंने सीधे तौर पर राज्य सरकार पर आक्रामण हमला बोलते हुए कहा था- 'जो पार्टियां लोगों को बांटने की राजनीति कर रही हैं, वे वैचारिक स्तर पर हमारी दुश्मन हैं.' उन्होंने सत्तारूढ़ डीएमके (DMK) पर प्रहार करते हुए अपना 'राजनीतिक दुश्मन' बताया था और उन पर 'द्रविड़ मॉडल' के नाम पर एक ही परिवार द्वारा राज्य को लूटने का गंभीर आरोप लगाया था. उस वक्त शायद ही किसी ने सोचा होगा कि फिल्म जगत की चकाचौंध को छोड़कर आया यह अभिनेता अपनी पहली ही हुंकार से तमिलनाडु के दशकों पुराने सियासी किलों की नींव हिला देगा.

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विजय की ऐसी आंधी चली है कि सत्ताधारी डीएमके का मजबूत संगठन भी उसके सामने धाराशायी होता नजर आ रहा है. सिनेमा के 'थलपति' अब तमिलनाडु की सियासत के नए 'सुपरस्टार' बनकर उभरे हैं. तमिलनाडु की राजनीति पिछले पांच दशकों से मुख्य रूप से दो ध्रुवों DMK और AIADMK के इर्द-गिर्द घूमती रही है.

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जयललिता के निधन और करुणानिधि के जाने के बाद एक बड़े राजनीतिक शून्य की बात की जा रही थी. हालांकि एम.के. स्टालिन ने डीएमके को मजबूती से संभाला, लेकिन विजय की एंट्री ने 'तीसरे विकल्प' की तलाश कर रही जनता को एक नया और चेहरा दे दिया. उनकी पहली ही चुनावी परीक्षा में जिस तरह का जनसमर्थन मिला, उसने यह साबित कर दिया कि तमिलनाडु की जनता अब पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से आगे देखना चाहती है.

क्यों चली विजय की 'आंधी'?

तमिलनाडु की राजनीति में जो भी पार्टियां हैं, वो दो द्रविड़ खेमों में से किसी एक साथ लड़ीं, लेकिन विजय अकेले खड़े रहे. उनके साथ कोई गठबंधन में नहीं था. चुनाव के दौरान उनके आलोचक भी ये बात मानते रहे कि उनको हर तबके के लोगों से समर्थन मिल रहा है. विजय हर घर के विजय और विजी पर दांव लगाते रहे. खास बात ये रही कि विजय ने AIADMK को चुनाव के दौरान नजरअंदाज किया, ऐसा करके वो खुद को DMK को असली चुनौती देने वाला नेता बताना चाहते थे. उनको ये बात अच्छी तरह पता थी कि जो वोटर डीएमके के खिलाफ हैं वो उसी उम्मीदवार को वोट देगा जो स्टालिन की पार्टी को हरा सके. 

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विजय की जीत महज उनकी फिल्मी लोकप्रियता का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी रणनीति और जमीनी जुड़ाव था. विजय ने सीधे तौर पर 'जेन-जी' और पहली बार मतदान करने वाले युवाओं को टारगेट किया, उनके भाषणों में रोजगार, आधुनिक शिक्षा और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की बात थी, जो युवाओं को सीधे कनेक्ट कर गई. 

वहीं विजय के पास पहले से ही 'विजय मक्कल इयक्कम' (VMI) के रूप में एक अनुशासित और समर्पित संगठन था. चुनाव की घोषणा से सालों पहले ही यह संगठन जनकल्याणकारी कार्यों में जुटा था, जिससे राजनीति में आने पर उन्हें शून्य से शुरुआत नहीं करनी पड़ी. 

विजय की पार्टी 110 सीटों पर आगे

डीएमके के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर

लंबे समय से सत्ता में रहने वाली डीएमके के खिलाफ स्थानीय स्तर पर जो नाराजगी थी, विजय ने उसे बखूबी भुनाया, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों को उन्होंने अपनी रैलियों में प्रमुखता से उठाया. विजय ने खुद को किसी एक विचारधारा में बांधने के बजाय एक समावेशी रास्ता चुना. उन्होंने 'अम्बेडकर', 'पेरियार' और 'कामराज' की विचारधाराओं के मेल की बात की. उन्होंने सामाजिक न्याय के साथ-साथ तमिल राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता को मिलाकर एक ऐसा नैरेटिव पेश किया, जिससे न तो द्रविड़ समर्थक नाराज हुए और न ही आधुनिक सोच वाला युवा.

डीएमके के दुर्ग में कैसे हुई सेंधमारी?

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डीएमके अपनी मजबूत संगठनात्मक शक्ति और 'द्रविड़ मॉडल' के लिए जानी जाती है, लेकिन विजय की रैलियों में उमड़ी भीड़ ने यह संकेत दे दिया था कि खेल बदल रहा है. विजय ने कावेरी जल विवाद, नीट (NEET) परीक्षा और शराबबंदी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर स्पष्ट रुख अपनाया. विशेषकर शराबबंदी के मुद्दे पर उन्हें महिलाओं का भरपूर समर्थन मिला, जो पारंपरिक रूप से डीएमके और एआईएडीएमके के बीच बंटा हुआ था.

करूर घटना के बाद विजय की हुई थी आलोचना

विजय की राजनीतिक सक्रियता के दौरान करूर में हुई वह हृदयविदारक घटना उनके करियर का सबसे कठिन मोड़ साबित हुई थी. एक कार्यक्रम के दौरान उमड़ी अनियंत्रित भीड़ और उसके बाद मची भगदड़ में 40 से अधिक लोगों की जान चली गई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे. उस वक्त चारों तरफ से विजय की आलोचना हुई. विरोधियों ने इसे उनकी प्रशासनिक विफलता बताया और मीडिया के एक बड़े धड़े ने यहां तक कह दिया था कि "विजय का राजनीतिक करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया है.

आलोचकों का मानना था कि एक अभिनेता इतनी बड़ी त्रासदी के दाग के साथ जनता का विश्वास कभी नहीं जीत पाएगा. लेकिन, विजय ने हार नहीं मानी. उन्होंने न केवल इस त्रासदी की जिम्मेदारी ली, बल्कि पीड़ितों के साथ खड़े होकर यह साबित किया कि उनका इरादा केवल सत्ता पाना नहीं, बल्कि लोगों की सेवा करना है.
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