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अकेला शेर’... तमिलनाडु चुनाव में मल्टी पार्टी अलायंस के सामने ’234 विजय’ फॉर्मूला

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में अभिनेता विजय की पार्टी TVK 'एक्स-फैक्टर' बनी हुई है. विजय के सामने अकेले लड़कर 'NTR' जैसा करिश्मा करने या गठबंधन कर 'पवन कल्याण' की तरह सत्ता में भागीदारी पाने की दुविधा है. 4 मई को तय होगा कि उनकी फिल्मी लोकप्रियता राजनीतिक बॉक्स ऑफिस पर कितनी सफल रहती है.

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थलपति विजय ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है. (Photo-ITG)
थलपति विजय ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है. (Photo-ITG)

तमिलनाडु जैसे राज्य के लिए, जो लंबे समय से कॉलीवुड (फिल्म जगत) और राजनीति के मेल का आदी रहा है. यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि 23 अप्रैल को दो 'मल्टीस्टारर' राजनीतिक गुटों के बीच मुकाबला देखने को मिलेगा. एक तरफ करीब 15 पार्टियों वाला AIADMK+BJP के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और दूसरी तरफ 23 पार्टियों वाला DMK+कांग्रेस के नेतृत्व वाला धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन (SPA). उनके सामने अभिनेता से नेता बने विजय की एकल नायक वाली पार्टी 'तमिलगा वेत्री कझगम' (TVK) है. एक और अभिनेता से नेता बने सीमन की 'नाम तमिलर काची' (NTK) भी मैदान में है.

यह मुकाबला बिल्कुल रजनीकांत की फिल्मों जैसा लग रहा है. दो स्थापित राजनीतिक दिग्गजों से लोहा लेकर, विजय उम्मीद करेंगे कि तमिलनाडु का मतदाता उनके "सिंगम सिंगल-ला-दान वरुम" (शेर हमेशा अकेला आता है) वाले नैरेटिव को तवज्जो दें. दूसरे शब्दों में, उनके राजनीतिक अवतार उनके फिल्मी पर्दे वाले बड़े व्यक्तित्व का ही विस्तार है.

सच तो यह है कि 'थलपति' (कमांडर), जैसा कि उन्हें बुलाया जाता है, इस चुनाव के मौसम में चर्चा के केंद्र में रहे हैं, चाहे वह चाय की दुकान हो, टेलीविजन बहस हो, सोशल मीडिया हो या शादियों का जमावड़ा. चूंकि पिछले चुनाव का कोई डेटा उपलब्ध नहीं है, इसलिए विजय वह 'एक्स-फैक्टर' हैं जिसके प्रभाव के बारे में कोई नहीं जानता. वह उस रहस्यमयी गेंदबाज की तरह हैं जिसे खेलना कोई नहीं जानता.

उनकी पर्दे पर लोकप्रियता, जो हाल के समय में किसी भी अन्य अभिनेता से कहीं अधिक है, राजनीतिक बॉक्स ऑफिस पर एक शानदार ओपनिंग में बदल गई है. जैसा कि उनकी जनसभाओं के पहले, दौरान और बाद में देखी गई भारी भीड़ से स्पष्ट है. यही कारण है कि राजनीतिक दलों ने उनके साथ गठबंधन करने की संभावना पर गंभीरता से चर्चा की है.

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टीवीके हुए अहम प्लेयर

कांग्रेस ने इस विचार पर गंभीरता से विचार किया, लेकिन जब उसके आलाकमान ने DMK का साथ न छोड़ने का फैसला किया, तो NDA द्वारा सक्रिय होने की खबरें आईं. बताया जाता है कि दोनों पक्षों ने अपने अपने फिल्मी कॉन्टैक्ट्स के जरिए TVK के शीर्ष नेतृत्व से संपर्क साधा. ताकि यह देखा जा सके कि चुनावों के लिए कोई साझेदारी बनाई जा सकती है या नहीं. यह दावा किया गया कि विजय को भविष्य की NDA सरकार में उपमुख्यमंत्री पद की पेशकश की गई थी. TVK की एक बैठक से लीक हुई खबरों ने संकेत दिया कि अधिकांश जिला सचिव NDA के साथ जाने के पक्ष में थे क्योंकि इससे चुनावी खर्च मैनेज हो जाएगा. हालांकि, आधिकारिक तौर पर TVK और AIADMK दोनों नेताओं ने चुनाव पूर्व गठबंधन की किसी भी संभावना से इनकार किया है.

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नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू होने से दो हफ्ते पहले, विजय के सामने यही दुविधा है. चिरंजीवी या पवन कल्याण - उन्हें कौन सा मॉडल अपनाना चाहिए? उनका फैसला ही तय करेगा कि विजय के पास राजनीतिक सत्ता हासिल करने का वास्तविक मौका है या वह तमिलनाडु की राजनीति के दलदल में महज एक और असफल खिलाड़ी बनकर रह जाएंगे.

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तय है कि यदि वे 15 से 20 प्रतिशत वोट शेयर हासिल करते हैं, तो यह सीटों के रूप में बदलने के लिए पर्याप्त नहीं होगा. ठीक वैसे ही जैसे 2009 में अविभाजित आंध्र प्रदेश में हुआ था. जहां चिरंजीवी की नई 'प्रजा राज्यम पार्टी' ने 16 प्रतिशत वोट हासिल किए लेकिन 294 सदस्यीय विधानसभा में केवल 18 सीटें जीतीं. मेगास्टार ने कुछ समय एक साधारण विधायक के रूप में बिताया, फिर अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया. समझौते के तहत राज्यसभा की सीट पाई और राजनीति को अलविदा कहने से पहले केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय का कार्यभार संभाला. यदि विजय, चिरंजीवी के पदचिन्हों पर चलते हैं, तो उनके साथ भी वही हश्र होने का जोखिम है.

बीजेपी संग जाएंगे विजय?

 पवन कल्याण दूसरा विकल्प हैं. 2019 में, पवन की 'जनसेना' अकेले चुनाव लड़ी. 5.5 प्रतिशत वोट हासिल किए और केवल एक सीट जीती. पवन खुद दो सीटों से चुनाव लड़े और दोनों ही हार गए. पांच साल बाद, अपनी गलती का एहसास होने पर, जनसेना ने तेलुगु देशम और भाजपा के साथ गठबंधन किया और चुनाव लड़ी गई सभी 21 विधानसभा सीटें जीत लीं. पवन कल्याण अब आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं.

लेकिन क्या विजय भाजपा के पक्ष में होना बर्दाश्त कर सकते हैं? उन्होंने शुरू में भाजपा को अपना "वैचारिक दुश्मन" बताया था और केंद्र द्वारा नियुक्त सेंसर बोर्ड ने विभिन्न कारणों से उनकी अलविदा मूवी कही जा रही 'जन नायकन' को मंजूरी नहीं दी है. अतीत में, भाजपा नेताओं ने उनकी 2017 की फिल्म 'मेरसल' में जीएसटी-विरोधी संवादों के लिए उन पर हमला किया था और उनकी ईसाई पहचान को रेखांकित करने के लिए उनके पूरे नाम - जोसेफ विजय - को उछाला था. पिछले महीने, तमिलनाडु भाजपा प्रमुख नैनार नागेंद्रन ने विजय और अभिनेत्री तृषा के बारे में एक अभद्र टिप्पणी की थी.

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इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि NDA के साथ चलने का मतलब होगा AIADMK के बाद दूसरे स्थान पर रहना और 50 से कम सीटों पर चुनाव लड़ना. ये उनके समर्थकों को रास नहीं आएगा जो उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं. दूसरी ओर, अकेले चुनाव लड़ने का मतलब है कि वह केवल सत्ता विरोधी वोटों को काटेंगे, जिससे परोक्ष रूप से सत्तारूढ़ DMK को मदद मिलेगी.

TVK के भीतर जो लोग अकेले जाने के पक्ष में हैं, उनका मानना है कि विजय चिरंजीवी के बजाय एन टी रामा राव (NTR) के करीब हैं. 1983 में, NTR की तेलुगु देशम पार्टी बनने के एक साल से भी कम समय में आंध्र प्रदेश में सत्ता में आ गई थी. इसका कारण यह था कि लोग कांग्रेस के आधिपत्य और दिल्ली से पार्टी के नियंत्रण से ऊब चुके थे. NTR ने 'तेलुगु आत्म गौरवम' (तेलुगु स्वाभिमान) का नारा बुलंद किया था.

इसी तरह, द्रविड़ शासन के 60 वर्षों के बाद विजय का प्रवेश उन मतदाताओं को लुभाने की कोशिश है जो शासन के द्रविड़ मॉडल से ऊब महसूस कर रहे हैं. युवाओं और महिला मतदाताओं के बीच उनकी जबरदस्त लोकप्रियता है. जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता. तमिलनाडु में 2.89 करोड़ महिला और 2.77 करोड़ पुरुष मतदाता हैं.

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हालांकि, TVK के सामने दोहरी कमजोरियां यह हैं कि उसके उम्मीदवार काफी हद तक अनजान चेहरे होंगे और पार्टी का बूथ मैनेजमेंट अभी तक परखा नहीं गया है. इसका मुकाबला करने के लिए, विजय ने मतदाताओं से कहा है कि वे यह सोचें कि मैदान में 234 'विजय' खड़े हैं और उनकी पार्टी को वोट दें. 4 मई को पता चलेगा कि क्या मतदाता विजय और अन्य 233 'विजयों' पर अपना भरोसा जताते हैं.

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