राजनीति संभावनाओं का खेल है. तमिलनाडु से बेहतर इसका उदाहरण कहीं और नहीं मिलता, जहां तमिलगा वेत्री कज़गम (TVK) के उम्मीदवारों ने एक अनोखा रास्ता निकाल लिया है. पार्टी प्रमुख विजय के लिए तमिलनाडु के हर निर्वाचन क्षेत्र में व्यापक रूप से चुनाव प्रचार करना संभव नहीं है. ऐसे में उनके हमशक्ल, जो हाल तक स्टेज शो और शादी समारोहों में विजय के लोकप्रिय गानों पर नाचकर दर्शकों का मनोरंजन करते थे, अब चुनाव प्रचार में 'थलपति' की जगह लेने के लिए बुलाए जा रहे हैं.
इन हमशक्लों का काम बस टीवीके उम्मीदवार के साथ खड़ा होना, भीड़ की ओर हाथ हिलाना और विजय के अंदाज़ और स्टाइल की हूबहू नकल करना है.
सलेम जिले के रहने वाले 38 साल के गोपाल ऐसे ही एक डुप्लीकेट हैं. वो बताते हैं कि पांच घंटे तक कैंपेन का हिस्सा बनने के लिए उन्हें 8000 रुपये मिलते हैं. मंगलवार को कोलाथुर से TVK के उम्मीदवार VS बाबू, जो मुख्यमंत्री MK स्टालिन के खिलाफ़ चुनाव लड़ रहे हैं, एक खुली जीप में विजय के हमशक्ल मतियलगन के साथ नजर आए. 34 साल के मथियेलगन का कहना है कि उन्हें 10 दिनों के लिए एक लाख रुपये देने का वादा किया गया है, जिसके बदले उन्हें चेन्नई के अलग-अलग चुनाव क्षेत्रों में हर शाम पांच घंटे कैंपेन करना होगा.
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हमशक्लों के सहारे प्रचार
दूसरी ओर, तिरुवेरुम्बुर से टीवीके उम्मीदवार एन.एस. विजी (जो डीएमके के स्कूल शिक्षा मंत्री अंबिल महेश के खिलाफ मैदान में हैं) जैसे लोग, जिन्हें कम समय में हमशक्ल नहीं मिल पाए, वे कटआउट से ही काम चला रहे हैं.
दक्षिण भारत के लिए मिमिक्री कलाकार कोई नई बात नहीं हैं. वैसे तो रजनीकांत के हमशक्लों की संख्या सबसे ज्यादा है, लेकिन 2026 के चुनावों में विजय के एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरने के साथ ही, उनके हमशक्लों की मांग चरम पर पहुंच गई है. जहां रजनीकांत के हमशक्लों का इस्तेमाल उनके स्टारडम का जश्न मनाने और उनके पुराने 'पंच डायलॉग्स' और गानों की यादें ताजा करने के लिए किया जाता था, वहीं विजय के हमशक्ल इस कड़े राजनीतिक मुकाबले में एक जरूरत बनकर उभरे हैं.

लेकिन, तमिलनाडु की भीषण गर्मी में पसीना बहा रहे एम.के. स्टालिन और एडप्पादी पलानीस्वामी जैसे दिग्गज राजनेताओं को देखने वाला मतदाता इसे कैसे लेता है? जहां कुछ लोग इसे एक चतुर 'ब्रांडिंग' मान सकते हैं, जिसका सहारा विजय को कई मौकों पर खासकर चेन्नई में अधिकारियों द्वारा रैली की अनुमति न मिलने के कारण लेना पड़ा है, वहीं इसमें 'नॉन-सीरियस' और 'राजनीतिक पैरोडी' कहलाने का जोखिम भी है. यह सब काफी 'कॉलीवुड' (फिल्मी) लग सकता है, जिससे टीवीके की उस छवि को और बल मिलता है कि यह केवल एक फिल्मी उत्पाद और कलाकारों की पार्टी है, न कि गंभीर राजनेताओं या जमीनी कार्यकर्ताओं की.
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कितना सही है विजय का ये दांव
अपने उम्मीदवारों को हमशक्लों के इस्तेमाल की अनुमति देकर, विजय एक ऐसे 'राजनीतिक रंगमंच' पर केवल अपनी छवि बेच रहे हैं, जहां उनके प्रतिद्वंद्वी शासन और अनुभव का दावा पेश कर रहे हैं. चुनाव प्रचार के थकाऊ काम के लिए 'बॉडी डबल' भेजकर, विजय पर चुनाव अभियान को फिल्मी सेट में बदलने के आरोप लगेंगे और उनके एक 'एकांतप्रिय सुपरस्टार' के रूप में देखे जाने का जोखिम बढ़ जाएगा.
विजय के वे प्रशंसक, जिन्होंने पहले ही अपना मन बना लिया है, वे अभी भी TVK को ही वोट देंगे. लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे वोटर्स हैं, जिन्होंने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है और वे किसी ठोस वादे की तलाश में हैं. असली विजय के लिए यह कतई मुनासिब नहीं होगा कि वे खुद को किसी 'लग्ज़री ब्रांड' की तरह पेश करें, जो किसी शहर के चौक-चौराहे पर जाकर पसीना बहाने को तैयार न हो.
चुनाव अभियान की शुरुआत में विजय ने कहा था कि उन्हें हर घर के 'विजय' और 'विजी' का समर्थन प्राप्त है. अब कटाक्ष भरा सवाल यह उठेगा कि क्या उनका वास्तव में मतलब 'विजय' के इन हमशक्लों से था?

जब एमजीआर को लोगों ने दिया था वोट
लेकिन तमिलनाडु एक ऐसा राज्य भी रहा है, जिसने 1967 और 1984 दोनों बार बीमार एमजी रामचंद्रन (MGR) को वोट देकर जिताया था. जनवरी 1967 में विधानसभा चुनाव से कुछ ही हफ्ते पहले, तत्कालीन द्रमुक नेता एमजीआर को साथी अभिनेता एमआर राधा ने गोली मार दी थी. घायल एमजीआर सक्रिय रूप से प्रचार नहीं कर पाए थे, लेकिन उनकी शारीरिक अनुपस्थिति के बावजूद लोगों ने उन्हें जमकर वोट दिया था.
इसी तरह 1984 में जब एमजीआर अमेरिका के एक अस्पताल में इलाज करा रहे थे, तब एआईएडीएमके ने अस्पताल से उनकी तस्वीरों और वीडियो को चुनाव प्रचार के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था. अब तर्क यह दिया जा रहा है कि अगर यह तरीका एमजीआर के लिए काम कर सकता है, तो विजय के लिए क्यों नहीं? हमशक्लों का इस्तेमाल कम से कम 'ब्रांड विजय' की मौजूदगी तो सुनिश्चित करता ही है, भले ही वहां हाड़-मांस के असली विजय मौजूद न हों.
TVK के प्रति निष्पक्ष होकर कहें तो, चूंकि यह केवल एक नेता के इर्द-गिर्द केंद्रित पार्टी है, इसलिए चुनावी वैतरणी पार करने के लिए यह पूरी तरह विजय की 'ब्रांड वैल्यू' पर निर्भर है. यह देखते हुए कि पार्टी को अन्य दलों के नेताओं की तरह विजय के लिए रोज़ाना बड़े पैमाने पर प्रचार की अनुमति लेने में काफी संघर्ष करना पड़ा है, यह टीवीके का 'प्लान-बी' है ताकि मुक़ाबला बराबरी का बना रहे.
हालांकि, इसकी वजह से डीएमके और एआईएडीएमके को विजय पर 'आलसी' और 'वर्क-फ्रॉम-होम' राजनेता होने का ठप्पा लगाने का मौका मिल गया है. लेकिन टीवीके को उम्मीद है कि मतदाता सत्ता पक्ष द्वारा किए जा रहे इस 'उत्पीड़न' को समझ जाएंगे. इस तरह, हमशक्लों का इस्तेमाल करना एक तरह का 'विरोध' है. यह भले ही हास्यास्पद लगे, लेकिन लोकतांत्रिक दायरे में अपनी जगह बनाने की इस लड़ाई में यह 'कमज़ोर पक्ष के प्रतिरोध' का भी एक प्रतीक है.
विजय पर कसे जाने वाले तंजों में सबसे प्रमुख यह है कि उन्हें अपने घर से बाहर निकलकर सड़कों पर उतरना चाहिए. अब रजनीकांत की फिल्म 'एंथिरन' (हिंदी में रोबोट) के एक दृश्य की याद दिलाते हुए, तमिलनाडु की सड़कों पर कई 'विजय' उतर आए हैं. एक ऐसे चुनाव प्रचार में जहां नेता अब 'हर जगह' मौजूद है. अब चुनौती इस बात की है कि मतदाताओं को यह यकीन दिलाया जाए कि नेता के तौर पर विजय ही 'असली खिलाड़ी' हैं, भले ही उनकी पार्टी के उम्मीदवारों ने विजय का 'मुखौटा' ओढ़े हमशक्लों का सहारा लिया हो.
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