हर चुनाव आपको कुछ ऐसे संकेत देता है, जो यह बता देते हैं कि हवा किस दिशा में बह रही है. मेरे लिए वह पल तब होता था, जब विजय चुनाव प्रचार के लिए अपनी वैन से बाहर निकलते थे. भारत में चुनाव कवर करने के अपने तीन दशकों के अनुभव में, मैंने कभी आम पुरुषों और महिलाओं को किसी राजनेता पर उपहारों की बौछार करते नहीं देखा. (मेरे पटना के एक दोस्त ने बताया कि 90 के दशक में लालू प्रसाद यादव के लिए ऐसा क्रेज था, पर उसके अलावा कभी नहीं) लेकिन यहां विजय को टेडी बियर, क्रिकेट बैट, चश्मे, तस्वीरें, फ्रूट ड्रिंक, नारियल पानी और न जाने क्या-क्या मिल रहा था. यह दिखाता था कि लोग विजय के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे. उन्हें केवल एक और उम्मीदवार के रूप में नहीं देखा जा रहा था जो वोट मांग रहा हो. बल्कि 'विजय अन्ना' और 'विजय थम्बी' को उनका अपना माना जा रहा था.
दूसरे संकेत द्रमुक (DMK) की दो रणनीतिक गलतियां थीं. सार्वजनिक रूप से उसने विजय की मौजूदगी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, लेकिन निजी तौर पर उनकी छवि बिगाड़ने की पूरी कोशिश की, उनके निजी जीवन और तलाक से जुड़े नैरेटिव को आक्रामक तरीके से प्रचारित किया गया. विजय के प्रशंसकों ने इसे सिरे से नकार दिया और 'डर्टी ट्रिक्स' का यह दांव द्रमुक पर ही उल्टा पड़ गया.
एम.के. स्टालिन की दूसरी बड़ी गलती अपनी पार्टी के खिलाफ पनप रहे गुस्से की लहर को नजरअंदाज करना था. भले ही मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से लोकप्रिय माने जाते थे, लेकिन उनकी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अहंकारी के रूप में देखा गया. पिछले तीन चुनावों 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव में मिली जीत ने उनमें यह भावना भर दी थी कि सत्ता पर उनका ही हक है. इससे भी बुरा यह रहा कि सोशल मीडिया पर उनके मुखर समर्थकों का व्यवहार बेहद अशिष्ट था, जिसने पार्टी के खिलाफ गुस्से को और भड़काने का काम किया.
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विजय को लोगों ने क्यों किया पसंद
हर बार जब मैंने किसी विजय समर्थक को ''थारकुरी'' (मूर्ख के लिए इस्तेमाल होने वाला एक अशिष्ट तमिल शब्द) कहा जाते देखा, तो मुझे एहसास हो गया कि स्टालिन दर्जनों की संख्या में वोट खो रहे हैं. द्रमुक को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाना असल में उन्हीं लोगों का बदला है, जिन्हें "थारकुरी" कहकर अपमानित किया गया था. लेकिन क्या विजय की टीवीके ने यह राजनैतिक सेंधमारी की और केवल द्रमुक की गलतियों के आधार पर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी?
नहीं विजय के पास भ्रष्टाचार के मामलों या अधूरे वादों का कोई ऐतिहासिक बोझ नहीं था, उन्होंने उन लोगों को एक विकल्प दिया जो द्रविड़ दिग्गजों के दशकों पुराने वर्चस्व से तंग आ चुके थे. ईवीएम पर उनका 'सीटी' चुनाव चिन्ह तमिलनाडु की राजनीति में प्रतीकात्मक रूप से एक नई शुरुआत करने जैसा था.
विजयकांत, सरथकुमार और कमल हासन जैसे अभिनेता से नेता बने दिग्गजों के फ्लॉप चुनावी इतिहास को देखते हुए, विजय को भी महज एक और 'महत्वाकांक्षी राजनेता' मानकर खारिज कर दिया गया था. लेकिन लोग इस बात को भांपने में चूक गए कि उनका प्रशंसक नेटवर्क पिछले करीब एक दशक से एक 'शैडो' राजनीतिक संगठन की तरह काम कर रहा था और जमीनी स्तर पर सामाजिक कार्यों में जुटा था. उनकी पार्टी 'तमिलगा वेत्री कज़गम' (TVK) ने इसी फैन क्लब को एक औपचारिक राजनीतिक इकाई के रूप में बदलकर उसे एक घातक हथियार बना दिया.
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अकेले चुनाव लड़े विजय
तीसरी बात यह कि जहां द्रमुक और अन्नाद्रमुक ने कई छोटे दलों के साथ गठबंधन कर खुद को मजबूत करने की कोशिश की, वहीं विजय ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. उन्होंने यह कदम उन तमाम दबावों के बावजूद उठाया जो उन पर डाले गए चाहे वह करूर भगदड़ मामले में सीबीआई के सामने पेशी हो, उनकी राजनीतिक सभाओं पर पाबंदियां लगाने वाले एसओपी हों या उनकी आखिरी फिल्म 'जन नायक' की रिलीज को रोकना हो. एक आम मतदाता की नजर में, वह एक ऐसे साहसी व्यक्ति के रूप में उभरे, जिसमें व्यवस्था के इन 'दिग्गजों' से टकराने का दम और जज्बा था.
विजय के पास सबसे बड़ा लाभ 40 वर्ष से कम उम्र के 2 करोड़ से अधिक युवा मतदाताओं के बीच उनकी जबरदस्त अपील थी. यह कहना पर्याप्त होगा कि उन्होंने इस वर्ग का दिल बड़े ही शानदार तरीके से जीता. इसी वोट बैंक ने उन्हें उस नुकसान से उबरने में मदद की, जो पर्याप्त चुनाव प्रचार न कर पाने के कारण हो सकता था. टीवीके के 'डिजिटल-फर्स्ट' अभियान की सोशल मीडिया पर साझा होने की दर बसे अधिक थी, क्योंकि जेन-जी पीढ़ी ने विजय के संदेश को घर-घर पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई. जहां अन्य दलों को अपने नेताओं की रैलियों और जनसभाओं में भीड़ जुटाने के लिए 300 रुपये, बिरयानी और शराब का सहारा लेना पड़ता था, वहीं विजय एक ऐसे चुंबक साबित हुए जिन्होंने बिना किसी भुगतान के भारी भीड़ को अपनी ओर खींचा.
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DMK ने विजय के खिलाफ उतारे कई स्टार्स
DMK ने इसके जवाब में कॉलीवुड को मैदान में उतार दिया, लेकिन प्रकाश राज और सत्यराज जैसे अभिनेताओं ने राजनीति में विजय के प्रवेश को जितना खारिज करने की कोशिश की, टीवीके के लिए समर्थन उतना ही बढ़ता गया. इसने विजय को 'अंडरडॉग' कार्ड खेलने का मौका दे दिया, बिल्कुल उनकी फिल्मों के किरदारों की तरह. मतदाता फिल्म की बाकी पटकथा को पहले से ही जानते थे और उन्हें पता था कि आगे क्या करना है.
तमिलनाडु जैसे जाति-प्रधान समाज में विजय के उदय को जो बात खास बनाती है, वह यह है कि उनकी अपील जाति, लिंग और धर्म की सीमाओं से परे थी. युवाओं ने उनके विजन पर भरोसा किया और एक ऐसे नेता को चुना जिससे वे जुड़ाव महसूस कर सकें. दूसरी बड़ी बात यह कि दोनों द्रविड़ दिग्गजों के विपरीत, टीवीके ने कुछ धनवान उम्मीदवारों को छोड़कर चुनाव की पूर्व संध्या पर पैसा नहीं बांटा. मेरे विचार में, इस चुनाव के ये दो सबसे बड़े सकारात्मक पहलू हैं.
इन्हीं संकेतों के आधार पर मैंने तमिलनाडु में मतदान से ग्यारह दिन पहले, यानी 12 अप्रैल को, अपने कुछ करीबी दोस्तों को लिखित में बताया था कि विजय बाजी मार लेंगे. क्योंकि आप जहां भी जाते, लोगों को एक ही बात कहते सुनते ''मात्रम वेणुम'' (हमें बदलाव चाहिए). संक्षेप में कहें तो, यह चुनाव यथास्थिति के खिलाफ, 'मात्रम' (बदलाव) और उम्मीद के लिए दिया गया वोट था, जबकि रील 'जन नायक' के इस महीने के अंत में रिलीज होने की संभावना है, 'असली जन नायक' आपके नजदीकी मतगणना केंद्र पर रिलीज हो चुका है.