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BJP ने चुकाया पितामह का पितृऋण, श्यामा प्रसाद की धरती पर पहली बार 'कमल' सरकार

जनसंघ के संस्थापक श्याम प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि पश्चिम बंगाल में 75 साल के बाद कमल खिला है. मुखर्जी के विचारों के आधार पर ही बीजेपी की नींव रखी गई थी, जिसके चलते उन्हें पार्टी का पितामह कहा जाता है. बीजेपी बंगाल एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरी है.

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बीजेपी के पितामह श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना साकार (Photo-ITG)
बीजेपी के पितामह श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना साकार (Photo-ITG)

पश्चिम बंगाल की सियासत ने एक नया इतिहास लिखा है. हुगली की लहरों से लेकर दार्जिलिंग की पहाड़ियों तक, 'जय श्री राम' के  नारे गूंज रहे हैं, जो बता रहे हैं कि बंगाल की सियासी मिजाज में बदलाव आ चुका है. इस दिन का इंतजार कई दशकों से बीजेपी के नेता और कार्यकर्ता कर रहे थे. 

बीजेपी के लिए बंगाल विधानसभा चुनाव की जीत केवल एक जीत नहीं है, यह उस 'पितृऋण' की भी अदायगी है, जो भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रति इस विचार के हर कार्यकर्ता पर बकाया था. बीजेपी के 'पितामह कहे जाने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि पर पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ 'कमल' खिला है.

बीजेपी संस्थापक दीन दयाल उपाध्याय के 'कर्तव्य पथ' उत्तराखंड से उत्तर प्रदेश में पहले ही सरकार बनाकर बनी ली थी, लेकिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि बंगाल में 75 साल के बाद जाकर सपना साकार हुआ है. मुखर्जी के विचारों के आधार पर ही बीजेपी की नींव रखी गई थी. ऐसे में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि पर बीजेपी एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरी है.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे की तस्वीर एकदम साफ हो गई है. चुनाव रुझानों में राज्य में बीजेपी को बहुमत से ज्यादा सीटें मिलती दिख रही है. बीजेपी 190 से ज्यादा सीटें जीतती दिख रही है तो टीएमसी 100 से कम सीटों पर सिमटती नजर आ रही है. ऐसे में बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने की स्थिति में है.

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वहीं, तृणमूल कांग्रेस की 15 साल पुरानी ममता सरकार की सत्ता से विदाई दिख रही है. ममता बनर्जी की पार्टी का ढलान साफ दिख रहा है. बंगाल में भाजपा की यह जीत महज आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक गहरी वैचारिक विजय है. 2026 के नतीजों ने साबित कर दिया है कि बंगाल की जनता ने उस 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' को स्वीकार कर लिया है, जिसकी नींव डॉ. मुखर्जी ने रखी थी.

बीजेपी के पितामह का 'पितृऋण' 
श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों के आधार पर ही 1980 में बीजेपी की बुनियाद पड़ी. यही वजह है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी को बीजेपी के पितामह कहा जाता हैं, जिनका सपना अब कहीं जाकर साकार हुआ. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नारा दिया था, 'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे.' कश्मीर से अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद, बीजेपी के लिए बंगाल जीतना वैचारिक चक्र को पूरा करने जैसा था.

ममता बनर्जी की 'मां, माटी, मानुष' की राजनीति के जवाब में बीजेपी ने 'सबका साथ, सबका विकास' और 'सभ्यता की सुरक्षा' का जो नैरेटिव पेश किया, उसने बंगाल के मध्यम वर्ग और ग्रामीण आबादी के बड़े हिस्से को झकझोर कर रख दिया. बंगाल चुनाव प्रचार के दौरान अमित शाह से लेकर पीएम मोदी तक जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना पूरा करने का वादा करते रहे हैं, जिसे साकार करके दिखाया.

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मुखर्जी की जन्मभूमि कैसे बनी रही बंजर 
श्यामा  प्रसाद मुखर्जी का जन्म 1901 में कोलकाता के बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ. उन्होंने अपने राजनीतिक सफर का आगाज 1929 से किया और कांग्रेस से जुड़े. हालांकि, एक साल बाद ही उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी. 1939 में वे हिंदू महासभा में शामिल हुए और 1940 में हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने. स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे.

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनकी काबिलयत को देखते हुए अपने मंत्रिमंडल में मुखर्जी को उद्योग और आपूर्ति मंत्री बनाया था, लेकिन बहुत दिनों तक साथ नहीं रहे. नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा देकर साल 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ का गठन किया, ये वही भारतीय जनसंघ है, जिसके वैचारिक एजेंडे पर बीजेपी का गठन हुआ. 

इतिहास गवाह है कि जनसंघ (अब भाजपा) का जन्म बंगाल की कोख से हुआ था, लेकिन राजनीतिक विडंबना यह थी कि दशकों तक यह दल अपनी ही जन्मभूमि पर 'बाहरी' कहलाया. जनसंघ से लेकर बीजेपी तक के लिए 75 साल तक बंगाल की जमीन सियासी बंजर बनी रही. लेफ्ट के 34 साल और तृणमूल कांग्रेस के 15 सालों ने भाजपा को एक सीमांत ताकत बनाकर रखा था.

पितामह का सपना और 2026 की हकीकत
आजादी के बाद पहली बार बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने जा रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में विजय संकल्प सभा के दौरान सियासी माहौल को देखकर कहा था कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना साकार होने जा रहा है. उन्होंने कहा कहा था कि जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधान निरस्त करके बीजेपी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के संकल्पों में से एक को पूरा किया. बंगाल में नई भाजपा सरकार श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राज्य की समृद्धि के सपने को पूरा करेगी और अवैध घुसपैठ के मुद्दे का समाधान करेगी.

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बंगाल में अब भाजपा बहुमत का आंकड़ा (148) पार कर 190 से ज्यादा सीटें जीत रही है, तो यह डॉ. मुखर्जी के उस विजन की जीत है, जिसमें उन्होंने एक अखंड और सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ भारत की कल्पना की थी. पार्टी नेतृत्व ने इस चुनाव को 'अंतिम युद्ध' की तरह लड़ा. पीएम मोदी की रैलियों से लेकर बूथ स्तर तक 'प्रवास' करने वाले कार्यकर्ताओं ने बंगाल को यह समझाने में सफलता पाई कि भाजपा 'बाहरी' नहीं, बल्कि बंगाल की असली 'मिट्टी की पार्टी' है. 

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि जब पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार बनेगी, तो हम बंग गौरव और बंग संस्कृति को फिर से जिंदा करेंगे. यह 'बंग भूमि' हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा का गठन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने किया था, जो यहां के एक बड़े नेता थे.

अमित शाह ने कहा- हम यह वादा भी करना चाहते हैं कि पीएम मोदी के नेतृत्व में बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही यहां की विरासत को हम पुनर्जीवित करेंगे, एक ऐसी मजबूत राष्ट्रीय ग्रिड बनाएंगे जो बंगाल से घुसपैठ को समाप्त कर देगी. इंसान छोड़ दीजिए परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा. ना केवल घुसपैठ रोकेंगे, सारे घुसपैठियों को चुन-चुन कर भारत के बाहर निकालने का काम भी भाजपा सरकार करेगी.'

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यह जीत सिर्फ जीत नहीं बल्कि वैचारिक है
कोलकाता के बीजेपी मुख्यालय 'हेस्टिंग्स' में आज गुलाल उड़ रहा है, लेकिन यह जश्न सिर्फ जीत का नहीं है. यह उस संकल्प के पूरा होने का है, जो 1951 में डॉ. मुखर्जी ने लिया था।. पहली बार बंगाल विधानसभा में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कोई 'कमल' का सिपाही बैठेगा.

भाजपा के लिए यह जीत इसलिए भी बड़ी है, क्योंकि उन्होंने उस धरती पर अपनी सत्ता स्थापित की है, जहां से उनके वैचारिक पूर्वज ने भारत को एक नई दिशा देने का साहस किया था. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आत्मा आज संतुष्ट होगी, उनके बंगाल ने आखिरकार उनके ही 'वैचारिक वंशजों' को अपना लिया है.

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