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आजादी की लड़ाई से सत्ता के संघर्ष तक क्यों कहलाता है बलिया ‘बागी’

'बागी बलिया' की धरती महान स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी चित्तू पांडेय की जन्मस्थली, महर्षि भृगु की तपस्थली, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सियासत और ऐतिहासिक ददरी मेले तक की कई कहानियां समेटे है. जिले की सात विधानसभा सीटों का चुनावी गणित, स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और स्थानीय संस्कृति जानने के लिए पढ़िए बलिया जिले की प्रोफाइल.

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बलिया जिले में सात विधानसभा सीटें हैं (Photo: ai generated)
बलिया जिले में सात विधानसभा सीटें हैं (Photo: ai generated)

अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई में अपनी अलग पहचान बनाने वाला बलिया आज भी ‘बागी बलिया’ के नाम से जाना जाता है. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान यहां चित्तू पांडेय के नेतृत्व में स्थानीय लोगों ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी. इस ऐतिहासिक विरासत के साथ बलिया की पहचान राजनीति, खेती-किसानी और गंगा-घाघरा के बीच बसे अपने भौगोलिक स्वरूप से भी है.  जिले की राजनीति में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का नाम खास महत्व रखता है. बलिया की पहचान स्वतंत्रता सेनानियों और राजनीतिक हस्तियों के साथ-साथ भृगु आश्रम जैसे धार्मिक स्थलों से भी जुड़ी है. जिले की सात विधानसभा सीटों पर होने वाले चुनाव में स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवारों की भूमिका अहम रहती है.

गंगा-घाघरा के बीच बसा बलिया

उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित बलिया की सीमाएं मऊ, देवरिया, गाजीपुर और बिहार के क्षेत्र से मिलती हैं. जिले का बड़ा हिस्सा गंगा और घाघरा नदियों के बीच बसा है. नदियों के आसपास की जमीन और खेती यहां के जनजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. जिला प्रशासन के अनुसार, बलिया का क्षेत्रफल करीब 2,981 वर्ग किलोमीटर है. 2011 की जनगणना के आधार पर जिले की आबादी 32,39,774 दर्ज की गई थी.

आजादी की लड़ाई में बलिया की भूमिका

बलिया का इतिहास सिर्फ किसी जिले की स्थापना या प्रशासनिक बदलावों तक सीमित नहीं है. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में यहां के लोगों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ खुलकर विरोध किया. जिला प्रशासन के इतिहास संबंधी विवरण के अनुसार, 19 अगस्त 1942 को चित्तू पांडेय और अन्य नेताओं की रिहाई के बाद आंदोलन ने निर्णायक रूप लिया. इसके बाद बलिया में स्थानीय स्तर पर सरकार चलाने की कोशिश हुई, हालांकि कुछ ही दिनों बाद ब्रिटिश सेना ने फिर नियंत्रण स्थापित कर लिया. इस घटना ने बलिया को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में खास जगह दिलाई. चित्तू पांडेय का नाम आज भी इसी आंदोलन और जिले की बागी पहचान के साथ लिया जाता है.

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ददरी मेला: बलिया की सांस्कृतिक पहचान

बलिया की पहचान में ददरी मेले का खास स्थान है. यह मेला हर साल कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित होता है और इसकी परंपरा महर्षि भृगु के शिष्य दर्दर मुनि से जुड़ी है. मेले के पहले चरण में पशुओं की खरीद-बिक्री होती है, जबकि दूसरे चरण में सांस्कृतिक कार्यक्रम और दुकानों की रौनक देखने को मिलती है. यह मेला बलिया की लोकपरंपरा और सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा है. इस मेले में आसपास जिलों और बिहार से भी बहुत से लोग आते हैं.

चंद्रशेखर की राजनीतिक विरासत

बलिया का नाम देश की राजनीति में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कारण भी जाना जाता है. वह देश के नौवें प्रधानमंत्री बने और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई. जिले की राजनीतिक चर्चा में उनका नाम लंबे समय से लिया जाता है. उनकी विरासत को उनके बेटे नीरज सिंह संभाल रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा था.

बलिया जिले की सात विधानसभा सीटें

बलिया जिले में सात विधानसभा क्षेत्र हैं. हालांकि, सभी सीटें एक ही लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत नहीं आतीं. जिला निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट के अनुसार, बेल्थरा रोड, सिकंदरपुर और बांसडीह सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र में आते हैं; रसड़ा घोसी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है, जबकि फेफना, बलिया नगर और बैरिया बलिया लोकसभा क्षेत्र में आते हैं.

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बैरिया : यहां सपा के जयप्रकाश अंचल ने बीजेपी के आनंद स्वरूप शुक्ला को हराया था.

बलिया नगर:  यह सीट बेहद हाईप्रोफाइल थी. यहां से योगी सरकार में मंत्री रहीं स्वाति सिंह के पति दयाशंकर सिंह को बीजेपी ने टिकट दिया था. इसके अलावा सपा से नारद राय, बसपा से शिवदास प्रसाद वर्मा और कांग्रेस से ओमप्रकाश भी इस सीट पर अपनी किस्मत आजमा रहे थे. यहां से दयाशंकर सिंह ने जीत दर्ज की.

बांसडीह: बांसडीह विधानसभा से बीजेपी प्रत्याशी केतकी सिंह ने सपा प्रत्यासी रामगोविंद चौधरी को हरा दिया

बेल्थरा रोड: यहां से सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के हंसू राम ने बीजेपी के छत्तू राम को हरा दिया.

फेफना: सपा के संग्राम सिंह ने भाजपा के उपेन्द्र तिवारी को हराकर जीत हासिल की.

रसाड़ा: यहां से बसपा के उमाशंकर सिंह लगातार आगे चल रहे थे. उन्होंने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के महेंद्र को मात दी.

सिकंदरपुर: बीजेपी के संजय यादव, सपा के जियाउद्दीन रिजवी, बसपा के संजीव कुमार वर्मा और कांग्रेस के बृजेश सिंह की किस्मत दांव पर थी. इस विधानसभा से सपा प्रत्यासी जियाउद्दीन रिजवी को जीत मिली. 

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