आप मेट्रो सिटीज़ में रहते हैं तो देखा होगा कि हर ओर, आपके आसपास कोई ना कोई डिलीवरी पार्टनर मिल ही जाता है. कोई साइकिल से, कोई बाइक तो कोई स्कूटी से. पिछले कुछ वक्त में भारत में गिग इकोनॉमी और क्विक-कॉमर्स का दायरा तेजी से बढ़ रहा है. खुद का व्हीकल और स्मार्टफोन रखने वाला व्यक्ति स्विगी और जेप्टो जैसे प्लेटफॉर्म्स पर डिलीवरी पार्टनर के तौर पर जुड़कर अपनी सहूलियत के घंटों में कमाई कर सकता है.
लेकिन काम शुरू करने से पहले सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या डिलीवरी पार्टनर बनने के लिए फीस देनी होती है, या जॉइनिंग पूरी तरह मुफ्त होती है.
ऑन-बोर्डिंग फीस, सिक्योरिटी डिपॉजिट और किट चार्ज को लेकर कंपनियों के तय नियम हैं. डिलीवरी पार्टनर बनने पर फीस लागू होती है, लेकिन ऑन-बोर्डिंग या किट के लिए अपनी जेब से तुरंत कैश या एडवांस ऑनलाइन पेमेंट नहीं करना पड़ता. कंपनियां इन शुल्कों को काम शुरू होने के बाद मिलने वाले पे-आउट, यानी सर्विस फीस, से एक या अधिक किस्तों में काट लेती हैं.
कई जगह रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया डिजिटल और आसान होती है, लेकिन पार्टनर बनने पर कंपनियां ऑन-बोर्डिंग असिस्टेंस और ट्रेनिंग के नाम पर शुल्क लेती हैं.
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कितनी लगती है जॉइनिंग की फीस?
जैसे स्विगी (इंस्टामार्ट) पर ऑन-बोर्डिंग फीस लगभग ₹1500 के आसपास होती है, जो अलग-अलग शहरों के हिसाब से बदल सकती है. जेप्टो जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी ऑन-बोर्डिंग और ट्रेनिंग के लिए फीस, टैक्स सहित, तय होती है और इसकी जानकारी रजिस्ट्रेशन के दौरान पार्टनर को दी जाती है.
हर प्लेटफॉर्म और कंपनी अपने तरीके से चीज़ों को हैंडल करती है. काम की प्रतिबद्धता और कंपनी के नियमों के पालन के लिए कंपनियां पार्टनर्स से रिफंडेबल सिक्योरिटी डिपॉजिट भी जमा करवाती हैं. ये राशि ऑन-बोर्डिंग के समय तय की जाती है. अगर डिलीवरी पार्टनर काम छोड़ता है या एग्रीमेंट खत्म करता है, तो कस्टमर से कलेक्ट किए गए कैश, सीओडी, और बाकी सभी बकाए क्लियर होने के बाद यह डिपॉजिट वापस कर दिया जाता है.
ऑर्डर पिक-अप और डिलीवरी के दौरान ब्रांडेड सामान का इस्तेमाल करना अनिवार्य होता है. कंपनियां पार्टनर्स को टी-शर्ट, रिफ्लेक्टिव जैकेट और डिलीवरी बैग जैसी किट मुहैया कराती हैं. इस किट का खर्च राइडर के खाते में जोड़ा जाता है या उसकी सर्विस फीस में से एडजस्ट किया जाता है. सामान खराब होने या दोबारा इश्यू कराने पर क्वालिटी कंजर्वेशन फीस का भी हिसाब होता है.
सबसे ज़रूरी बात ये है कि ऑन-बोर्डिंग या किट के लिए शुरुआत में नकद देना जरूरी नहीं होता. कंपनियां ये सभी शुल्क डिलीवरी शुरू होने के बाद मिलने वाले पे-आउट से एक या अधिक इंस्टॉलमेंट्स में काटती हैं. यानी पहले दिन जेब से रकम जमा करने की जरूरत नहीं पड़ती.
कब कटते हैं डिलीवरी पार्टनर के पैसे?
कुछ दूसरी कटौतियां भी ध्यान में रखने लायक हैं. अगर कोई ऑर्डर रास्ते में चोरी हो जाता है, खराब हो जाता है या गलत डिलीवर होता है, तो उसकी भरपाई पे-आउट से की जा सकती है. वहीं ऐप पर ग्राहकों की तरफ से दी गई 100% टिप पर कंपनियां कोई फीस नहीं काटतीं और पूरी राशि सीधे राइडर तक पहुंचती है.
यानी कि डिलीवरी पार्टनर बनने के लिए ऑन-बोर्डिंग, किट और डिपॉजिट के रूप में फीस लागू होती है. लेकिन यह रकम पहले दिन जमा नहीं करानी पड़ती और काम शुरू होने के बाद वीकली कमाई से धीरे-धीरे एडजस्ट की जाती है. यही स्विगी और जेप्टो जैसे प्लेटफॉर्म्स पर फीस और कटौती का पूरा नियम है.
मान लीजिए कि किसी कंपनी का डिलीवरी पार्टनर बनने के लिए 2000 रुपये की ओन-बोर्डिंग फीस है, तो ज़रूरी नहीं कि वो जॉइनिंग के वक्त ही पूरी रकम ले. बल्कि वो हर महीने के 500 या हर हफ्ते के हिसाब से छोटी किस्त बना लेते हैं, ताकि पार्टनर को कोई दिक्कत ना आए.