झारखंड में पिछले 26 दिनों से चला आ रहा अभ्यर्थियों का ऐतिहासिक आंदोलन आखिरकार आज स्थगित हो गया है. सरकार द्वारा भर्ती सुधारों, पारदर्शी जांच और रद्द करने की मांगों पर सहमति जताने के बाद JPSC-JSSC सुधार मंच ने अपना अनशन 60 दिनों के लिए टाल दिया है.
अगर बात की जाए तो हाल के महीनों में देश ने दो बड़े छात्र आंदोलन देखे, एक देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर और दूसरा झारखंड की राजधानी रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में. भले ही दोनों आंदोलनों की नींव 'पेपर लीक' और भर्ती धांधली के खिलाफ सुलगते गुस्से पर टिकी थी, लेकिन धरातल पर दोनों का मिजाज, मांगें, सामाजिक ताना-बाना और परिणाम एक-दूसरे से पूरी तरह जुदा नजर आए. दोनों ही आंदोलन की समाप्ति के बाद एक बात तो कही जा सकती है कि
आपसी गुटबाजी और विरोधाभास
जंतर-मंतर का आंदोलन जहां NEET अभ्यर्थियों और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के इर्द-गिर्द सिमटा था. वहां की मांग बहुत स्पष्ट और सर्वव्यापी थी. ये एक तरह से पूरे देश के सभी अभ्यर्थियों के हित में पारदर्शी परीक्षा की मांग थी. उसमें कोई आंतरिक विरोधाभास नहीं था, क्योंकि हर छात्र एक ही पायदान पर खड़ा होकर नए सिरे से न्याय की मांग कर रहा था.
वहीं, झारखंड में JPSC और JSSC की परीक्षाएं रद्द होने के बाद आंदोलन दो धड़ों में बंट गया. एक तरफ वे अभ्यर्थी हैं जो सालों से परीक्षा की निष्पक्षता, CBI जांच और पूरी भर्ती प्रक्रिया को रद्द करने के लिए अनशन पर बैठे हैं. वहीं, दूसरी तरफ 1,975 चयनित अभ्यर्थी हैं, जिन्हें नियुक्ति पत्र मिल चुके थे और वे नौकरी कर रहे थे. परीक्षाएं रद्द होने से अब वे 'कोर्ट के स्टे' और कानूनी लड़ाई के सहारे अपनी नौकरी बचाने में जुट गए हैं. यानी रांची में 'छात्र बनाम सरकार' के साथ-साथ 'छात्र बनाम छात्र' की स्थिति भी पैदा हो गई.
Gen-Z का डिजिटल तेवर बनाम सालों की थकान
दिल्ली में सड़कों पर उतरने वाली भीड़ मुख्य रूप से 18 से 22 साल के 'Gen-Z' युवाओं की थी. सोशल मीडिया रील्स, पंची पोस्टर्स, मीम्स और वायरल ट्रेंड्स उनके आंदोलन का सबसे बड़ा हथियार थे. उनका विरोध प्रदर्शन हाई-टेक और आक्रामक था. वहीं, रांची के मैदान में जुटी भीड़ 25 से 35 साल के उन परिपक्व युवाओं की थी, जो सालों से इन परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. उनमें से कई अपनी पुरानी सरकारी या प्राइवेट नौकरियां छोड़कर आए थे. इस भीड़ में सोशल मीडिया का ग्लैमर कम और चेहरे पर थकान व भविष्य की चिंता ज्यादा थी. उनका तरीका काफी संयमित, तिरंगा हाथ में लिए और शांतिपूर्ण मार्च तक सीमित था.
प्रशासनिक खींचतान और कोर्ट का अंदेशा
जंतर-मंतर में आंदोलन शुरू होते ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का कैमरा उन पर टिक गया. राजनीतिक दबाव इतना बढ़ा कि केंद्र सरकार को त्वरित कड़े फैसले लेने पड़े और नतीजतन शिक्षा मंत्री तक का इस्तीफा हुआ. वहीं झारखंड के छात्रों को अपनी आवाज सुनाने के लिए 26 दिनों तक सड़कों पर घिसटना पड़ा और 16 दिनों तक आमरण अनशन करना पड़ा. यहां मामला सिर्फ प्रशासनिक फैसलों तक सीमित न रहकर कोर्ट की अवमानना, हाईकोर्ट के सिटिंग जजों से जांच कराने की शर्तों और कानूनी पचड़ों में उलझकर रह गया है.