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हर वक्त लीक-लीक-लीक... टेलीग्राम बैन के बाद भी कोटा में क्यों परेशान हैं NEET छात्र? पढ़ें ग्राउंड रिपोर्ट

21 जून को होने वाली नीट (NEET) री-एग्जामिनेशन की तैयारी कर रहे कोटा के हजारों छात्रों का कहना है कि टेलीग्राम, व्हाट्सएप और फोन कॉल्स के जरिए उन तक पेपर लीक के दावे लगातार पहुंच रहे हैं. हालांकि सरकार ने परीक्षा से पहले टेलीग्राम पर पाबंदी लगाने का कदम उठाया है, लेकिन जमीनी स्तर पर हो रही बातचीत से साफ है कि छात्र और शिक्षक इस प्लेटफॉर्म को अफवाहों, तनाव और गलत सूचनाओं से भरे एक बहुत बड़े चक्रव्यूह का सिर्फ एक हिस्सा मानते हैं.

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कोटा में क्यों परेशान हैं छात्र, पढ़ें हमारी कोटा ग्राउंड रिपोर्टसीरीज पार्ट टू
कोटा में क्यों परेशान हैं छात्र, पढ़ें हमारी कोटा ग्राउंड रिपोर्टसीरीज पार्ट टू

(अदालती लड़ाइयों और नीतिगत फैसलों से परे क्लासरूम, हॉस्टल्स, कोचिंग सेंटरों और घरों में एक समानांतर कहानी चल रही है. कोटा और सीकर से रिपोर्ट करते हुए, यह सीरीज डेटा, जांच, अर्थशास्त्र और एक और मौका पाने की तैयारी कर रहे छात्रों के अनुभवों के जरिए NEET री-टेस्ट के रास्ते को ट्रैक करती है. यह हमारी ग्राउंड रिपोर्ट का दूसरा भाग है.)

कोटा में यह मेरा दूसरा दिन था. टेलीग्राम पर अस्थायी प्रतिबंध की घोषणा होने में अभी कुछ दिन बाकी थे, लेकिन 21 जून की नीट री-एग्जाम की तैयारी कर रहे छात्रों के बीच यह प्लेटफॉर्म पहले से ही चर्चाओं के केंद्र में था.

जैसे ही छात्र कोचिंग संस्थानों से बाहर आए, री-टेस्ट की तैयारियां अपने अंतिम दौर में पहुंच चुकी थीं. क्लासरूम में भीड़ कम होने लगी थी. ज्यादातर छात्र केवल चुनिंदा रिवीजन सेशन में ही शामिल हो रहे थे, और अपना बाकी का समय लाइब्रेरी, हॉस्टल, कैफे और किराए के कमरों में बिता रहे थे, जहां पढ़ाई ही जिंदगी का दूसरा नाम बन चुकी थी.

लेकिन इस रूटीन के पीछे, कुछ बदल गया था.

जो बातचीत बायोलॉजी के डायग्राम, मॉक टेस्ट और संभावित कट-ऑफ के बारे में होनी चाहिए थी, वह बार-बार एक ही विषय पर आकर टिक जा रही थी, वो हैं टेलीग्राम चैनल्स.

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कोटा के सबसे व्यस्त छात्र हब में से एक से गुजरना किसी शहर में प्रवेश करने जैसा नहीं, बल्कि एक विशाल शैक्षणिक टाउनशिप में कदम रखने जैसा महसूस हो रहा था. हर तरफ छात्र नोट्स ले जाते, फिजिक्स के न्यूमेरिकल सॉल्व करते और रिवीजन स्ट्रेटेजी पर चर्चा करते नजर आ रहे थे. फिर भी, परीक्षा के सामान्य तनाव के बीच, अनिश्चितता की एक गहरी भावना भी घर कर रही थी.

ये वो छात्र थे जिन्होंने पहले ही उस परीक्षा के रद्द होने का दर्द झेला था, जिसके लिए उन्होंने महीनों और कुछ मामलों में सालों तक तैयारी की थी. अब वे एक बार फिर से तैयारी कर रहे थे.

कोटा के सबसे व्यस्त कोचिंग हब्स में से एक के बाहर गन्ने के जूस के स्टॉल पर छात्रों का एक समूह अपने फोन के इर्द-गिर्द इकट्ठा था. मैं अचानक उनकी बातचीत में शामिल हो गया, जिससे वहां मौजूद सभी लोग मुझे सतर्क निगाहों से देखने लगे. एक पल के लिए ऐसा लगा मानो मैंने उनके निजी दायरे में दखल दे दिया हो.

री-नीट से पहले जमीनी स्तर पर छात्र बेहद सतर्क नजर आ रहे हैं.

मेरा पहला सवाल सीधा था, 'यहां सब कैसा चल रहा है?' लेकिन जवाब इतने सीधे नहीं थे.

अजमेर के 18 वर्षीय छात्र अभय सिंह ने कहा, 'अब सिर्फ अच्छी तैयारी करना ही काफी नहीं रह गया है. मैं दो साल से तैयारी कर रहा हूं. मैंने दोनों बार कड़ी मेहनत की, और मुझे एक ऐसे स्कोर की उम्मीद थी जिससे मुझे एक अच्छा मेडिकल कॉलेज मिल सके. लेकिन अब हमेशा एक अनिश्चितता बनी रहती है.. 

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जैसे ही मैंने अपना परिचय दिया, वहां का माहौल तुरंत बदल गया. उनका संदेह दूर हो गया, चेहरों पर मुस्कान आ गई और कुछ ही मिनटों में मुझे "भैया" कहकर बुलाया जाने लगा. उनके शब्दों में न तो गुस्सा था और ना ही लाचारी. जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा चौंकाया, वह थी उनकी थकान.

'हम खुद को इन सब चीजों में फंसने नहीं दे सकते. हमारा पहला काम पढ़ाई करना है. अगर हम दिन भर लीक और अफवाहों के बारे में सोचते रहेंगे, तो फोकस नहीं कर पाएंगे.'

कुछ और छात्रों ने मुझे अपने फोन पर कुछ ऐसा दिखाना शुरू किया जो आंखें खोलने वाला भी था और डराने वाला भी. जमीन पर मौजूद होने के नाते, मैं इस हकीकत को खुद समझना चाहता था, और यह बिल्कुल मेरे सामने थी.

कुछ ही मिनटों में, प्रश्नपत्रों तक पहुंच होने का दावा करने वाले चैनलों के स्क्रीनशॉट उनकी स्क्रीन पर तैरने लगे. कुछ छात्रों ने इन दावों को धोखाधड़ी (स्कैम) कहकर खारिज कर दिया, तो कुछ थोड़े असमंजस में दिखे. हालांकि, एक बात साफ थी कि ज्यादातर छात्र इन सब बातों को सुन-सुनकर थक चुके थे. छात्रों का कहना था कि जहां देखो, लीक-लीक और लीक की बातें, दिल टूट जाता है ये सब देख-सुनकर. 

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टेलीग्राम चैनल अभी भी एक्टिव हैं और छात्रों को निशाना बना रहे हैं. (इमेज: इंडिया टुडे डिजिटल)

जैसा कि NTA ने हाल ही में अपने एक बयान में आगाह किया था, ऐसे कई टेलीग्राम चैनल हैं जो री-टेस्ट का प्रश्नपत्र भेजने का दावा करते हुए 14,000 रुपये से 25,000 रुपये, और कुछ तो 10 लाख रुपये तक की मांग कर रहे हैं. यह सब छात्रों के बीच एक ऐसी जानकारी से घिरे होने की बेचैनी पैदा करता है, जिसे उन्होंने कभी खुद नहीं ढूंढा था.

मैंने देखा कि एक छात्र ने अपना फोन निकाला और टेलीग्राम स्क्रॉल करने लगा. स्क्रीन पर जो दिखा, वो परेशान करने वाला था. कई चैनलों ने प्रश्नपत्र होने का दावा किया था. कुछ ने "कंफर्म पेपर" के विज्ञापन दिए थे. दूसरों ने पेमेंट के निर्देश, कॉन्टैक्ट नंबर और गारंटीड सफलता के वादे दिखाए थे.

इन दावों में से किसी की भी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकती थी. इस बात का कोई सबूत नहीं था कि कोई प्रश्नपत्र वास्तव में लीक हुआ था.

अब, सरकार ने दोबारा पेपर लीक की किसी भी संभावना को रोकने के लिए 22 जून तक टेलीग्राम पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है. इस कदम के लिए नकल कराने वाले गिरोहों से जुड़ी चिंताओं का हवाला दिया गया है. हालांकि, क्या ऐसा कदम इस प्रक्रिया को पूरी तरह से फुलप्रूफ बना सकता है, यह एक बहुत बड़ा सवाल है.

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इसके साथ ही भरोसे का संकट भी जुड़ा है. पेपर लीक हुआ है या नहीं, इस सवाल से परे एक बड़ी चिंता उस परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर विश्वास की है, जो मेडिकल पेशे में प्रवेश का एकमात्र जरिया है. फिर भी, इस पूरे इकोसिस्टम का पैमाना कितना बड़ा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.

'आप एक ग्रुप छोड़ते हैं, दूसरा सामने आ जाता है' 

यही पैटर्न कई छात्रों के फोन पर दिखाई दिया.

एक छात्र ने कहा कि हमें तो यह भी नहीं पता होता कि हम इन ग्रुप्स में कैसे जुड़ जाते हैं. आप एक छोड़ते हैं और दूसरा सामने आ जाता है. हममें से ज्यादातर लोग स्टडी मटेरियल और नोट्स के लिए टेलीग्राम का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन ये चैनल किसी न किसी तरह हमारे फोन तक पहुंच ही जाते हैं.

पहले से ही राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के दबाव से जूझ रहे छात्रों पर इसका गहरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है. टेलीग्राम पर प्रतिबंध की घोषणा 16 जून को की गई, जो नीट री-टेस्ट से महज चार दिन पहले थी. लेकिन क्या होगा अगर कोई लीक पहले ही हो चुका हो?

कल्पना कीजिए कि आप सालों से एक ही परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं और लगातार ऐसे संदेशों का सामना कर रहे हैं जो दावा करते हैं कि किसी और के पास पेपर की एक्सेस है. चाहे सच हो या झूठ, ऐसे दावे मन में शक पैदा करते हैं. वे छात्रों को यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या सिर्फ मेहनत ही काफी है? वो तनाव पूरे कोटा में साफ देखा जा सकता है.

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छात्रों ने बार-बार इस भावना का जिक्र किया कि वे न केवल एक-दूसरे के खिलाफ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, बल्कि अनिश्चितता से भी लड़ रहे हैं.

यह चिंता इसलिए भी गहरी हो जाती है क्योंकि कई अभ्यर्थी मध्यमवर्गीय या साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं. जिन परिवारों ने अपनी जमा-पूंजी लगा दी है, कर्ज लिया है या बच्चों की तैयारी के लिए शहर बदल लिया है, उनके लिए हर एक अफवाह बहुत भारी पड़ती है. इसलिए, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पेपर लीक हुआ है या नहीं; सवाल यह है कि तब क्या होता है जब छात्र यह मानने लगते हैं कि शायद ऐसा हुआ है.

टेलीग्राम से परे: परीक्षा के तनाव का बाजार 

मैंने जितना करीब से देखा, यह उतना ही साफ होता गया कि टेलीग्राम तो सिर्फ एक बहुत बड़े नेटवर्क का हिस्सा था.

कई छात्रों ने दावा किया कि उन्हें टेलीग्राम, व्हाट्सएप और अन्य प्लेटफॉर्म पर अज्ञात लोगों से परीक्षा से जुड़े मटेरियल तक पहुंच देने का वादा करने वाले मैसेज मिले थे. कुछ ने कहा कि उन्हें फोन कॉल्स भी आए थे. दूसरों ने पैसे के बदले "गारंटीड पेपर" की पेशकश करने वाले विज्ञापनों के स्क्रीनशॉट दिखाए.

मेरे साथ साझा की गई एक ऑडियो रिकॉर्डिंग में एक व्यक्ति पूरे आत्मविश्वास के साथ यह बता रहा था कि प्रश्नपत्र का 'इंतजाम' कैसे किया जा सकता है. इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी, लेकिन ऐसी बातचीत की मौजूदगी परीक्षा के तनाव के इर्द-गिर्द बने बाजार के बड़े पैमाने को दर्शाती है.

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अपनी दूसरी नीट की कोशिश की तैयारी कर रहे एक छात्र ने कहा कि अगर कल टेलीग्राम गायब भी हो जाए, तो लोग कहीं और चले जाएंगे. व्हाट्सएप है, कॉल्स हैं, ऑफलाइन संपर्क हैं. सिर्फ प्लेटफॉर्म बदलता है, लोग नहीं.

शिक्षक, दलाल और जांच के घेरे में खड़ी व्यवस्था 

इसी बात को कोटा में दशकों से पढ़ा रहे एक वरिष्ठ शिक्षक ने भी दोहराया, जिन्होंने यहां के सभी बड़े कोचिंग नामों को उभरते देखा है.

58 वर्षीय देव शर्मा कहते हैं कि पहले ऐसा नहीं था. कोचिंग का यह इकोसिस्टम ज्यादा अनुशासित था. आज इसमें बहुत ज्यादा पैसा शामिल हो चुका है. जब भी किसी सिस्टम में भारी मात्रा में पैसा आता है, तो उसका फायदा उठाने वाले लोग भी पैदा हो जाते हैं. आप एक तरीका तो रोक सकते हैं, लेकिन मानसिकता को रोकना बहुत मुश्किल है. हम इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते कि व्यवस्था का हिस्सा रहे शिक्षक भी इसमें शामिल हो सकते हैं.

उन्होंने चीटिंग रैकेट और संभावित लीक के लिए सीकर के एक हॉटस्पॉट के रूप में उभरने की ओर भी इशारा किया. उन्होंने कहा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सीकर एक बड़ा हॉटस्पॉट बना हुआ है. वहां का पूरा नेटवर्क इसमें गहराई से लिप्त है. उस क्षेत्र में दलालों और इस तरह की गतिविधियों में शामिल लोगों की संख्या काफी ज्यादा है. कोटा का अतीत में ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं रहा है, लेकिन अब यहां भी इसी तरह के ट्रेंड दिखने शुरू हो गए हैं.

तीन दिनों के दौरान, मैंने कई प्रमुख कोचिंग संस्थानों के प्रतिनिधियों से बात करने की कोशिश की. आधिकारिक माध्यमों और प्रशासनिक कार्यालयों के जरिए अनुरोध किए गए थे, लेकिन यह रिपोर्ट फाइल होने तक कोई विस्तृत जवाब नहीं मिला.

हालांकि, छात्रों ने खुलकर बात की. कई छात्रों का तर्क था कि दलाल और बिचौलिए इन एजुकेशनल हब्स के आस-पास खुलेआम सक्रिय रहते हैं. उनके अनुसार, अभ्यर्थियों से अक्सर ऑफर्स, आश्वासनों और शॉर्टकट्स के साथ संपर्क किया जाता है. ज्यादातर छात्र ऐसे प्रस्तावों को खारिज कर देते हैं, कुछ इसकी रिपोर्ट करते हैं, जबकि अन्य इसे बस नजरअंदाज कर देते हैं. फिर भी, ये ऑफर्स आने बंद नहीं होते.

नीट यूजी 2026 पेपर लीक की चिंता सबसे पहले उठाने वाले व्हिसलब्लोअर और केमिस्ट्री टीचर शशिकांत सुथार का मानना है कि इस री-एग्जामिनेशन में गड़बड़ी की संभावना न के बराबर है. लेकिन वे स्वीकार करते हैं कि छात्र अभी भी संशय में हैं, और यही भावना कोटा में हर बातचीत में साफ दिखाई दे रही थी.

शशिकांत सुथार ने indiatoday.in से कहा कि इस बात की संभावना बेहद कम है कि इस री-एग्जाम के प्रश्नपत्र लीक हो जाएं. सरकार ने अब जो कदम उठाए हैं, उन्हें छात्रों को हो रही परेशानियों से बचाने के लिए पहले ही लागू किया जाना चाहिए था.

छात्र असल में क्या चाहते हैं? 
यहीं पर आकर टेलीग्राम को लेकर चल रही बहस और जटिल हो जाती है. किसी प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाने से उसकी विजिबिलिटी कम हो सकती है, नेटवर्क प्रभावित हो सकते हैं और संदिग्ध कंटेंट का फैलना अस्थायी रूप से धीमा हो सकता है.

NTA ने अपने एक हालिया बयान में पूरी ताकत से कहा था कि टेलीग्राम चैनलों के दावों के बावजूद नीट यूजी री-एग्जाम का कोई पेपर लीक नहीं हुआ है.

NTA ने कहा था कि री-एग्जाम के लिए कोई पेपर लीक नहीं हुआ है. जैसे ही आप पैसे ट्रांसफर करते हैं, वे गायब हो जाते हैं. यदि आप अपना एडमिट कार्ड और व्हाट्सएप नंबर भेजते हैं, तो वे अगले छात्र को ठगने के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं.

लेकिन मैंने जितने भी लोगों से बात की, उनका मानना था कि इससे समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी. उनका तर्क था कि चिंता किसी एप्लिकेशन को लेकर नहीं है, बल्कि इस पूरे इकोसिस्टम को लेकर है. एक ऐसा इकोसिस्टम जो परीक्षा के अत्यधिक दबाव, गलत सूचनाओं, अवसरवादी तत्वों और मेडिकल सीट से जुड़ी अत्यधिक प्रतिष्ठा से संचालित होता है.

भारत में हर साल लगभग 24 लाख नीट आवेदक सीमित संख्या में मौजूद एमबीबीएस सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं. ऐसे अत्यधिक प्रतिस्पर्धी माहौल में, एक अफवाह भी तथ्य से ज्यादा तेजी से फैलती है.

अपने आस-पास के इस पूरे शोर-शराबे के बावजूद, ज्यादातर छात्र वही कर रहे थे जिसके लिए वे कोटा आए थे, वो था- पढ़ाई.

इस रिपोर्टिंग का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह था कि छात्र अफवाहों से वाकिफ थे, वे चैनलों और दावों को जानते थे; फिर भी अधिकांश का पूरा ध्यान अपनी तैयारी पर ही था क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है. टेलीग्राम रहे या न रहे, इस हकीकत के बदलने की उम्मीद कम है. कोटा के छात्र असल में जो सबसे ज्यादा चाहते हैं, वह किसी प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध, कोई नया वायरल दावा या सुधार का कोई नया वादा नहीं है. वे सिर्फ यह निश्चितता चाहते हैं कि परीक्षा हॉल ही वह एकमात्र जगह हो, जहां उनका भविष्य तय किया जाए.

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