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स्कूल ने बैन क‍िया चैट जीपीटी तो 17 साल की छात्रा ने खड़ी की अपनी AI कंपनी! दे रही 20000 जॉब्स

जहां एक तरफ पूरी दुनिया के स्कूल इस बात से परेशान हैं कि बच्चे होमवर्क के लिए AI का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं 17 साल की नव्या टुटेजा ने स्कूल में लगी पाबंदी को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया. वाई-फाई पर चैट जीपीटी ब्लॉक होने पर नव्या ने खुद का दिमाग चलाया और 'राहा' नाम से अपना खुद का एआई स्टार्टअप खड़ा कर दिया. आज उनके इस प्लेटफॉर्म पर 20 हजार से ज्यादा नौकरियां और 1000 से ज्यादा एक्टिव यूजर्स मौजूद हैं.

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वाशिंगटन में 12वीं की छात्रा नव्या ने बनाया 'राहा' एआई प्लेटफॉर्म (Photo credit: Linkedin-Navya Tuteja)
वाशिंगटन में 12वीं की छात्रा नव्या ने बनाया 'राहा' एआई प्लेटफॉर्म (Photo credit: Linkedin-Navya Tuteja)

जब दुनिया भर के स्कूल और कॉलेज इस बात से परेशान हैं कि छात्र असाइनमेंट और पढ़ाई के लिए एआई (AI) टूल्स का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं भारतीय मूल की एक 17 साल की छात्रा ने इस पाबंदी को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया. वाशिंगटन डी.सी. के मशहूर थॉमस जेफरसन हाई स्कूल की छात्रा नव्या टुटेजा के स्कूल प्रशासन ने जब वाई-फाई पर चैट जीपीटी और क्लाउड जैसे एआई टूल्स को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया, तो नव्या ने हताश होने के बजाय खुद का दिमाग चलाना शुरू किया.

नतीजा यह है कि आज 12वीं क्लास में पढ़ने वाली नव्या 'राहा' (Raaha) नाम के एक एआई स्टार्टअप की फाउंडर हैं, जिसके प्लेटफॉर्म पर 1,000 से ज्यादा एक्टिव यूजर्स और 20,000 से ज्यादा जॉब लिस्टिंग्स मौजूद हैं.

मां की समस्या से आया क्रांतिकारी बिजनेस आइडिया

फॉर्च्यून के मुताब‍िक नव्या के इस एआई स्टार्टअप 'राहा' की शुरुआत के पीछे एक बेहद भावुक और पारिवारिक वजह है. नव्या की मां को सुनने में दिक्कत होती है. नव्या ने गौर किया कि न्यूरोडाइवर्जेंट (विशेष ज़रूरतों या दिमागी भिन्नता वाले) लोगों के लिए नौकरी खोजना कितना तनावपूर्ण होता है. कंपनियां बड़ी-बड़ी शर्तों के साथ जॉब डिस्क्रिप्शन तो लिख देती हैं, लेकिन यह कोई नहीं बताता कि वहां काम का असल माहौल कैसा होगा.

इसी परेशानी को दूर करने के लिए नव्या ने एक ऐसा फ्री प्लेटफॉर्म बनाया जो न्यूरोडाइवर्जेंट जॉब सीकर्स को आवेदन करने से पहले ही यह बता देता है कि कोई नौकरी उनके अनुकूल है या नहीं. नव्या ने इसका एल्गोरिदम खुद लिखा है.

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'स्कूल में बैन था ChatGPT, इसलिए खुद सोचना पड़ा'

ओईसीडी (OECD) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, एआई टूल्स के अत्यधिक इस्तेमाल और घटते अटेंशन स्पैन के कारण दुनिया भर में 15 साल के बच्चों का पढ़ाई का स्तर 25 साल के निचले स्तर पर आ गया है. लेकिन नव्या इस रेस से अलग निकलीं. नव्या बताती हैं कि जब स्कूल के वाई-फाई पर एआई बंद हुआ, तो शुरुआत में गुस्सा आया. लेकिन इसने उन्हें परीक्षा और पढ़ाई से जुड़ी चीज़ें खुद सोचने पर मजबूर किया. 

उनका मानना है कि अगर आप बिना सोचे-समझे एआई का इस्तेमाल करेंगे तो यह आपको बेवकूफ बना देगा. जब स्कूल के बाद पाबंदी हटती थी, तब वे अपने स्टार्टअप को बनाने में उस दिमाग का इस्तेमाल करती थीं. आज नव्या अपने स्कूल के एआई क्लब की प्रेसिडेंट हैं, लेकिन वे अपने स्कूल प्रोजेक्ट्स या एग्जाम की तैयारी के लिए एआई का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करतीं.

भारतीय मूल के माता-पिता का मार्गदर्शन और अनुशासन

नव्या के पिता रोहित टुटेजा साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट हैं और मां दीप्ति टुटेजा ई-ट्रेड और वीडी बैंक जैसी दिग्गज कंपनियों में डेटा मैनेजमेंट हेड रह चुकी हैं. दिल्ली से अमेरिका बसे इस परिवार ने अपनी इकलौती बेटी में शुरुआत से ही 'शॉर्टकट न लेने' के संस्कार डाले. नव्या के पिता का कहना है कि उन्होंने हमेशा उसे यही सिखाया कि चीटिंग से कोई कहीं नहीं पहुंच सकता, कड़ी मेहनत ही इकलौता रास्ता है.

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केवल स्टार्टअप नहीं, सामाजिक सरोकार भी!

'राहा' के अलावा नव्या ने 'लेजिबल' नाम का एक और टूल बनाया है, जो स्पेशल नीड वाले बच्चों के कानूनी और मेडिकल पेपर्स को आसान भाषा में समझता है. इस पहल के लिए नव्या ने स्थानीय सिनेटरों और अमेरिकी शिक्षा विभाग तक से संपर्क साधा है. नव्या का मानना है कि एआई को बैन करना कोई समाधान नहीं है, बल्कि इसे सही तरीके से रेगुलेट करना और सही इस्तेमाल सीखना ही असली समझदारी है.

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