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31 की उम्र में अकेले शिमला गया पत्रकार, डेडलाइन और काम के दबाव से लिया ब्रेक, समझ आई ये बात

बर्नआउट के बाद 31 साल के एक पत्रकार ने शिमला में 7 दिन अकेले बिताए और वहां कैफे मालिकों से बात की. इस सफर से उन्हें समझ आया कि नौकरी के साथ खुद के लिए समय निकालना भी जरूरी है. साथ ही, उन्होंने अपने कैफे और बुकस्टोर खोलने के पुराने सपने को गंभीरता से पूरा करने का फैसला किया.

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बर्नआउट दूर करने के लिए गया शिमला... याद आ गया पुराना सपना.
बर्नआउट दूर करने के लिए गया शिमला... याद आ गया पुराना सपना.

काम की थकान और बर्नआउट से बाहर निकलने के लिए मैंने एक साल की छुट्टी ली थी. लेकिन काम पर लौटने के बाद मुझे समझ में आया कि हर आराम का मतलब काम से दूर जाना नहीं होता है. 31 साल की उम्र में शिमला की मेरी पहली अकेली यात्रा ने याद दिलाया कि समयसीमा के बाहर भी जिंदगी है और उसे जीने के लिए पूरी तरह थक जाने का इंतजार जरूरी नहीं है.

बर्नआउट के बाद 31 साल के एक पत्रकार ने शिमला में 7 दिन अकेले बिताए और वहां कैफे मालिकों से बात की. इस सफर से उन्हें समझ आया कि नौकरी के साथ खुद के लिए समय निकालना भी जरूरी है. साथ ही, उन्होंने अपने कैफे और बुकस्टोर खोलने के पुराने सपने को गंभीरता से पूरा करने का फैसला किया. 

 छह साल तक मीडिया में काम करने के बाद छुट्टी पर चले गए. इस दौरान उन्होंने आराम किया, किताबें पढ़ीं और कैफे मालिकों से बातचीत की. इस सफर ने उन्हें समझाया कि अपने काम को जारी रखते हुए भी खुद के लिए समय निकालना और अपने पुराने सपनों पर काम करना जरूरी है. 

छह साल काम करने के बाद लिया ब्रेक

पत्रकार ने बताया कि काम की वजह से उनकी जिंदगी एक तय दिनचर्या में सिमट कर रह गई थी. सुबह उठना, तैयार होना, नाश्ता करना, खबरें देखना और काम पर निकल जाना. इसके बाद लंबा सफर, खबरें लिखना, डेडलाइन पूरी करना और अगले काम की तैयारी में दिन निकल जाता था. उन्हें पत्रकारिता पसंद थी, लेकिन काम की भागदौड़ में वह यह सोचना भूल गए थे कि वह खुद कैसा महसूस कर रहे हैं.

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हालांकि, काम पर लौटने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि वह पत्रकारिता छोड़ना नहीं चाहते. वह अपने पेशे में आगे बढ़ने के साथ-साथ अपनी निजी जिंदगी के लिए भी समय निकालना चाहते थे.इसी सोच के साथ उन्होंने शिमला के बाहरी इलाके में एक छोटा गेस्ट हाउस बुक किया और अकेले यात्रा पर निकल गए. 

शिमला में बिना किसी योजना के बिताए सात दिन

शिमला जाने से पहले उन्होंने ट्रेकिंग करने, नई जगहें देखने, लोगों से मिलने और हर दिन एक कहानी लिखने की योजना बनाई थी. लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन्होंने अपनी ज्यादातर योजनाएं छोड़ दीं.अगले चार-पांच दिनों तक उन्होंने अपनी मर्जी से दिन बिताए. जब मन हुआ, तब उठे. घंटों किताबें पढ़ीं, डायरी लिखी और लंबी सैर की. उन्होंने कुत्तों के साथ समय बिताया, कॉफी पी और चॉकलेट केक खाया. कुछ शाम वह बालकनी में बैठकर तारे देखते और पहाड़ों की ठंडी हवा का मजा लेते रहे.  इतना ही नहीं वह कभी ध्यान लगाते, कभी रोते और कभी बिना कुछ किए आराम करते थे.

पत्रकार ने बताया कि कई महीनों से वह एक काम पूरा करने के बाद दूसरे काम में लग जाते थे. शिमला में उन्हें हर पल कुछ हासिल करने या अपनी किसी योजना को पूरा करने की चिंता नहीं थी.वह बस वहां का मजा ले रहे थे.  इससे उन्हें एहसास हुआ कि वह लंबे समय से इस तरह के आराम को याद कर रहे थे.

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नौकरी छोड़ना नहीं, काम और जिंदगी में संतुलन बनाना था मकसद

पत्रकार का कहना था कि वह नौकरी छोड़ने के लिए शिमला नहीं गए थे. वह बेहतर महसूस करते हुए काम पर लौटना चाहते थे. उनके मुताबिक, किसी को अपना काम पसंद हो सकता है, वह अपने साथियों के साथ अच्छा महसूस कर सकता है और अपने पेशे में आगे बढ़ना चाहता है.इसके बावजूद कभी-कभी काम का दबाव संभालना मुश्किल हो सकता है. उन्होंने महसूस किया कि लगातार डेडलाइन और जिम्मेदारियों के बीच खुद के लिए समय निकालना आसान नहीं होता. सुबह उठते ही काम की चिंता शुरू हो जाती है. पूरा दिन जिम्मेदारियां निभाने में बीतता है और घर लौटने के बाद अगले दिन की तैयारी शुरू करनी पड़ती थी. ऐसे में निजी जिंदगी के लिए बहुत कम समय बचता है.

उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि कई कर्मचारियों के लिए काम से मानसिक रूप से दूर होना मुश्किल हो जाता है. कुछ लोग छुट्टी लेने या मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करने से भी डरते हैं कि कहीं इसका असर उनके करियर पर न पड़े. बर्नआउट का अनुभव करने के बाद पत्रकार समझ चुके थे कि खुद पर जरूरत से ज्यादा दबाव डालने का असर पड़ता है. इस बार वह अपने पेशे से दूर हुए बिना खुद का ख्याल रखने का तरीका तलाशना चाहते थे.

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कैफे-बुकस्टोर खोलने के पुराने सपने पर फिर किया विचार

शिमला में समय बिताने के दौरान पत्रकार को अपना पुराना सपना याद आया. वह पहाड़ों में एक छोटा कैफे और बुकस्टोर खोलना चाहते थे, जहां लोग आराम से बैठकर किताबें पढ़ सकें, कॉफी पी सकें और कुछ समय शांति से बिता सकें. लेकिन परिवार और काम की जिम्मेदारियों की वजह से वह यह सपना भी भूल गए.  शिमला में उन्हें इस पर दोबारा सोचने का मौका मिला. उन्होंने महसूस किया कि कैफे-बुकस्टोर खोलने का सपना पत्रकारिता छोड़ने का विकल्प ही नहीं, बल्कि नौकरी के साथ आगे बढ़ाया जा सकने वाला लक्ष्य भी हो सकता है.

कैफे में जाकर मालिकों से की बातचीत

अपने सपने को बेहतर ढंग से समझने के लिए उन्होंने शिमला के चार कैफे का दौरा किया और पांच दिनों तक वहां बार-बार गए. उन्होंने कैफे के माहौल, कॉफी और ग्राहकों को मिलने वाले अनुभव पर ध्यान दिया. साथ ही, कैफे मालिकों से पहाड़ों में कारोबार चलाने की चुनौतियों के बारे में भी बात की. उन्होंने पाया कि कैफे चलाने के लिए सिर्फ अच्छी कॉफी देना काफी नहीं है. कारोबार का खर्च संभालना, दूसरे कैफे से मुकाबला करना और ग्राहकों को दोबारा आने की वजह देना भी जरूरी है. 

इस दौरान उनकी मुलाकात अक्षय नाम के एक कैफे मालिक से हुई. पहचान की गोपनीयता बनाए रखने के लिए उनका नाम बदल दिया गया है. अक्षय ने बताया कि उनका कैफे शुरू में सिर्फ एक विचार था, लेकिन धीरे-धीरे यह उनका जुनून बन गया. उन्होंने ग्राहकों की पसंद समझने, हर दिन कुछ नया सीखने और ऐसी जगह बनाने के महत्व के बारे में बताया, जहां लोग अच्छी यादें बना सकें. साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि कारोबार चलाने के लिए मुनाफा जरूरी है
क्योंकि कर्मचारियों को उनके पास कर्मचारियों को सैलरी देने जैसी जिम्मेदारियां भी शामिल हैं. इस बातचीत से पत्रकार को समझ आया कि किसी काम में कमाई के साथ-साथ उसका उद्देश्य और लोगों पर पड़ने वाला असर भी मायने रखता है. 

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पहले जैसा था रूटीन 

पत्रकार ने माना कि शिमला से लौटने पर उनकी नौकरी, डेडलाइन और जिम्मेदारियां पहले जैसी ही थीं. लेकिन इस एक यात्रा से उनकी सभी परेशानियां खत्म नहीं हुईं और न ही उन्हें कैफे-बुकस्टोर खोलने की पूरी योजना मिल गई. लेकिन उन्हें अपने भविष्य के बारे में सोचने का समय जरूर मिला. अब वह हर साल कम से कम एक बार अकेले यात्रा करना चाहते हैं, ताकि किताबें पढ़ने, नई जगहें देखने और खुद के साथ समय बिताने का मौका मिले. वह पत्रकारिता में आगे बढ़ना चाहते हैं और अपने कैफे-बुकस्टोर के सपने को भी गंभीरता से लेना चाहते हैं. उनका मानना है कि जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए हर समय काम करते रहना जरूरी नहीं है. कभी-कभी रुककर खुद के बारे में सोचना भी जरूरी होता है.

31 साल की उम्र में उन्होंने यह समझा कि अपने पेशे से प्यार करने और करियर में आगे बढ़ने के साथ-साथ निजी जिंदगी के लिए समय निकालना भी उतना ही अहम है. उनके लिए शिमला का यह सफर केवल सात दिन की एक आम यात्रा नहीं है बल्कि काम और जिंदगी के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक नई शुरुआत है.

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रिपोर्टर- करण यादव
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