अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ एक महत्वपूर्ण MoU यानी मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर सहमति जताई है. यह 60 दिन की अस्थाई डील बताई जा रही है, जिसे भारतीय शब्दों में 'जुगाड़ू डील' भी कहा जा रहा है. दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में स्थिरता लाने के लिए यह समझौता किया गया है. हालांकि विशेषज्ञ इसे स्थायी समाधान की बजाय अस्थायी ठहरा रहे हैं.
पिछले कई हफ्तों से अमेरिका और ईरान के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर तीखा टकराव चल रहा था. ईरान ने जलमार्ग बंद करने की धमकी दी थी, जबकि अमेरिका ने बंदर अब्बास समेत कई ठिकानों पर हमले किए.
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पाकिस्तान की मध्यस्थता भी असफल रही. ऐसे में ट्रंप प्रशासन ने अचानक ईरान के साथ बातचीत तेज की और 60 दिन के लिए एक अस्थाई MoU पर सहमति बन गई. ट्रंप ने इसे अच्छी शुरुआत बताया है, जबकि ईरान ने इसे अमेरिकी दबाव में मजबूरी का समझौता करार दिया है.

60 दिन की डील में क्या-क्या शामिल है?
इस अस्थायी समझौते में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें शामिल बताई जा रही हैं...

क्यों कह रहे हैं 'जुगाड़ू डील'?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह डील लंबे समय तक टिकने वाली नहीं है. सिर्फ 60 दिनों का समय रखा है ताकि दोनों पक्ष आगे की स्थाई बातचीत के लिए समय ले सकें. ट्रंप प्रशासन घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबाव में जल्दबाजी में यह समझौता कर रहा है, इसलिए इसे जुगाड़ू डील कहा जा रहा है. ईरान की अर्थव्यवस्था भारी सैंक्शन्स से जूझ रही है, जबकि अमेरिका होर्मुज में युद्ध नहीं चाहता. दोनों पक्षों की मजबूरी ने इस समझौते को जन्म दिया है.
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भारत पर क्या असर?
भारत के लिए यह डील महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारा 80% से ज्यादा तेल खाड़ी क्षेत्र से आता है. होर्मुज बंद होने की स्थिति में तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं, जो महंगाई बढ़ाती हैं. 60 दिन का यह समझौता भारत को राहत देगा. लेकिन अगर लंबे समय में स्थाई समाधान नहीं निकला तो फिर से तनाव बढ़ सकता है. भारत दोनों देशों से संतुलित संबंध रखना चाहता है, इसलिए इस डील का स्वागत कर रहा है.
अगले 60 दिनों में दोनों पक्ष पूर्ण समझौते पर बातचीत करेंगे. अमेरिका परमाणु मुद्दे पर सख्ती दिखा सकता है, जबकि ईरान क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखना चाहेगा. अगर यह डील कामयाब रही तो मध्य पूर्व में कुछ स्थिरता आ सकती है. लेकिन अगर फेल हुई तो फिर से बड़े टकराव की आशंका रहेगी. ट्रंप की यह पहल दिखाती है कि वह बड़े संघर्ष से बचना चाहते हैं, लेकिन ईरान पर दबाव भी बनाए रखना चाहते हैं.