भारत की रक्षा तकनीक बनाने वाली कंपनी सैमटेल एवियोनिक्स जल्द ही अपनी स्वदेशी जैमिंग और इंटरसेप्शन टेक्नोलॉजी लॉन्च करने की तैयारी में है. कंपनी के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर पुनीत कौरा ने बताया कि कंपनी सैटेलाइट बनाने पर भी काम कर रही है. भारत को रक्षा क्षेत्र में सिर्फ हथियार या उपकरण बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनकी तकनीक और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी भी देश के पास होनी चाहिए. इससे भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में और मजबूत होगा.
भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से रक्षा क्षेत्र में विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही है. आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसे अभियानों के तहत सरकारी और निजी कंपनियों को स्वदेशी रक्षा तकनीक विकसित करने के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है. इसी दिशा में सैमटेल एवियोनिक्स ने अपनी आने वाली प्लानिंग की जानकारी दी है.
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कंपनी जल्द अपनी स्वदेशी जैमिंग और इंटरसेप्शन टेक्नोलॉजी को बनाने की तैयारी कर रही है. इसके अलावा सैटेलाइट बनाने पर भी काम चल रहा है. इसका शुरुआती कॉन्सेप्ट तैयार हो चुका है. जरूरी तकनीकी हिस्सों की पहचान भी कर ली गई है. सैटेलाइट तैयार होने के बाद इसे भारतीय आर्म्ड फोर्सेस के साथ-साथ दूसरे देशों को भी उपलब्ध कराया जा सकेगा.

क्या है जैमिंग और इंटरसेप्शन टेक्नोलॉजी?
जैमिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल दुश्मन के संचार, रेडियो, जीपीएस और ड्रोन जैसे सिस्टम के सिग्नल को बाधित करने के लिए किया जाता है. वहीं इंटरसेप्शन टेक्नोलॉजी की मदद से दुश्मन के संचार और इलेक्ट्रॉनिक सिग्नलों की निगरानी की जाती है. आज के समय में इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर मॉर्डन युद्ध का अहम हिस्सा माना जाता है. पुनीत कौरा ने कहा कि यह तकनीक भारत में ही विकसित की गई है और जरूरत पड़ने पर सीमा पार होने वाली गतिविधियों से निपटने में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा.
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तकनीक और रिसर्च पर बढ़ाना होगा फोकस
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए सिर्फ देश में निर्माण करना काफी नहीं है. तकनीक, डिजाइन और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी का मालिकाना हक भी भारत के पास होना जरूरी है. पुनीत ने बताया कि तभी किसी रक्षा उत्पाद को पूरी तरह भारतीय कहा जा सकता है.
उन्होंने बताया कि भारत अभी अपने GDP का करीब 0.3% हिस्सा ही रिसर्च और इनोवेशन पर खर्च करता है, जबकि कई विकसित देश 3% से 5% तक खर्च करते हैं. 2047 तक विकसित देश बनने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए नई तकनीक और रिसर्च में निवेश बढ़ाना जरूरी होगा.

2047 तक आत्मनिर्भर बनने का लक्ष्य
भारत फिलहाल अपनी रक्षा तकनीक का करीब 60% हिस्सा इम्पोर्ट करता है, हालांकि यह आंकड़ा लगातार कम हो रहा है. आने वाले वर्षों में करीब 70% रक्षा तकनीक देश में ही विकसित और तैयार हो. 2047 तक भारत रक्षा तकनीक के मामले में आत्मनिर्भर बन सकता है. उनका कहना है कि सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर काम करें, तो इस लक्ष्य को हासिल करना संभव है.
वैश्विक बाजार में बढ़ रहे हैं अवसर
दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे युद्धों के कारण रक्षा उपकरणों की मांग बढ़ रही है. ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए भी नए अवसर बन रहे हैं. खासकर यूरोप में उत्पादन क्षमता सीमित है, जिससे वहां भारतीय कंपनियों के लिए साझेदारी और मैन्युफैक्चरिंग के मौके बढ़ सकते हैं.
उन्होंने बताया कि भारत आज करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है. रक्षा पर करीब 2% जीडीपी खर्च करता है. आने वाले वर्षों में अर्थव्यवस्था के 5 ट्रिलियन और फिर 10 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने के साथ रक्षा खर्च भी बढ़ने की उम्मीद है. इससे भारतीय रक्षा कंपनियों के लिए घरेलू और वैश्विक बाजार में नए अवसर पैदा होंगे, जबकि नई तकनीक विकसित करने में निजी कंपनियां अहम भूमिका निभाएंगी.