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रूस फिर ला रहा वह मिसाइल जो अमेरिकी स्टेल्थ विमान गिरा चुकी है, भारत के पास भी है

रूस पुराने पेचोरा एस-125 मिसाइल सिस्टम को मोबाइल बना रहा है. यही मिसाइल 1999 में अमेरिकी स्टेल्थ विमान गिरा चुकी है. भारत को भी अपनी पेचोरा को मोबाइल बनाने पर ध्यान देना चाहिए.

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ये है पेचोरा एस-125 मिसाइल सिस्टम, जिसे रूस एडवांस बना रहा है. (Photo: IAF)
ये है पेचोरा एस-125 मिसाइल सिस्टम, जिसे रूस एडवांस बना रहा है. (Photo: IAF)

रूस अपने पुराने सोवियत काल के पेचोरा एस-125 मिसाइल सिस्टम को दोबारा जिंदा करने और आधुनिक बनाने की तैयारी में है. यह खबर भारतीय वायुसेना के लिए खास मायने रखती है. पेचोरा एस-125 वही मिसाइल सिस्टम है जिसने 27 मार्च 1999 को कोसोवो युद्ध के दौरान अमेरिकी वायुसेना के एफ-117 नाइटहॉक स्टेल्थ फाइटर-बॉम्बर को सर्बिया के आसमान में गिरा दिया था. उस समय यह एक जगह सेट रहता था. अब रूस इसे पूरी तरह मोबाइल बनाने जा रहा है. इससे इसकी ताकत और बचाव क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी.

पेचोरा एस-125 (नाटो नाम एसए-3 गोआ) सोवियत संघ का छोटे से मध्यम दूरी का जमीन से हवा में मार करने वाला मिसाइल सिस्टम है. यह कम से मध्यम ऊंचाई वाले हवाई खतरों को रोकने के लिए बनाया गया था. इसमें कमांड गाइडेंस सिस्टम होता है. 

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Pechora S-125 modernization

भारत ने भी अपने पेचोरा सिस्टम का आधुनिकीकरण किया था. भारतीय वायुसेना में MRSAM और आकाश सिस्टम की देरी के कारण पेचोरा को अपग्रेड किया गया ताकि अंतर को भरा जा सके. लेकिन भारत का अपग्रेड रूस के पेचोरा-2एम जितना नहीं था.

रूस कैसे कर रहा है आधुनिकीकरण

यूक्रेनी सैन्य समाचार वेबसाइट मिलिटरीनी के अनुसार, मिन्स्क व्हील ट्रैक्टर प्लांट (एमजेडकेटी) ने मास्को की कंपनी जेएससी ओबोरोनिटेलने सिस्टेमी के साथ 30 खास पहिए वाले चेसिस सप्लाई करने का ठेका किया है. ये चेसिस पेचोरा-2एम सिस्टम के लिए हैं. रूस को 20 एमजेडकेटी-8021-021, पांच एमजेडकेटी-8022-021 और पांच एमजेडकेटी-80211-021 चेसिस मिलेंगे. डिलीवरी 2029 तक चलेगी. 

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Pechora S-125 modernization

इससे साफ है कि रूस एक बार का काम नहीं, बल्कि लंबे समय की योजना पर काम कर रहा है. आधुनिक युद्ध में ड्रोन और सस्ते हवाई खतरे बहुत बढ़ गए हैं. इसलिए रूस पुराने सिस्टम को फेंकने के बजाय उन्हें नया रूप देकर इस्तेमाल कर रहा है.

पेचोरा-2एम में क्या नया है

पेचोरा-2एम पुराने एस-125 का गहरा आधुनिकीकरण है. इसमें स्व-चालित ट्रक पर लगी लॉन्चर, डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स, ज्यादा दूरी तक मार करने की क्षमता और दिन-रात काम करने वाला इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम जोड़ा गया है. पुराना सिस्टम स्थिर था. उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में काफी समय लगता था. अब पेचोरा-2एम को करीब 20-25 मिनट में तैयार किया जा सकता है. 

Pechora S-125 modernization

यह शूट-एंड-स्कूट यानी फायर करके तुरंत दूसरी जगह चले जाने की रणनीति अपना सकता है. इससे एंटी-रेडिएशन मिसाइल और सटीक हमलों से बचने की क्षमता बढ़ जाती है. पुराने चार रेल वाले स्थिर लॉन्चर की जगह अब दो रेल वाला लॉन्चर भारी 6x6 ट्रक पर लगाया गया है. ट्रैकिंग रडार और दूसरे हिस्से भी मोबाइल ट्रक पर हैं.

भारत ने अपना पेचोरा कैसे अपग्रेड किया

2016 में भारतीय रक्षा मंत्रालय ने 16 पेचोरा सिस्टम को डिजिटल बनाने के लिए 272 मिलियन डॉलर का टेंडर निकाला. यह टेंडर सिर्फ भारतीय कंपनियों के लिए था ताकि मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिले. 2020 में अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज लिमिटेड को 591.3 करोड़ रुपये का ठेका मिला. 

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Pechora S-125 modernization

रूसी कंपनी अल्माज-एंटे मूल निर्माता है. भारतीय अपग्रेड में मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक और मैकेनिकल सुधार किए गए. मिसाइल गाइडेंस रडार को नया बनाया गया और सिस्टम को वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जोड़ा गया. पुराने इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स को आधुनिक सेमीकंडक्टर और डिजिटल प्रोसेसिंग से बदला गया. ऑपरेटर कंसोल भी नए बनाए गए. 

लेकिन सबसे बड़ी कमी यह रही कि सिस्टम स्थिर ही रहा. चार रेल वाला पुराना लॉन्चर और टो किए जाने वाले ट्रांसपोर्ट सिस्टम को नहीं बदला गया. इसलिए भारतीय वायुसेना पेचोरा को सिर्फ एयरबेस, रडार स्टेशन जैसी महत्वपूर्ण जगहों की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करती है.

Pechora S-125 modernization

आधुनिक युद्ध में गतिशीलता क्यों जरूरी

आज के युद्ध में सटीक हथियार बहुत आम हो गए हैं. स्थिर एयर डिफेंस सिस्टम खुद निशाना बन सकता है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी वायुसेना ने आदमपुर एयरबेस की सुरक्षा कर रहे एस-400 सिस्टम पर हमला करने की कोशिश की थी. लेकिन वायुसेना ने समय रहते एस-400 को दूसरी जगह ले जाकर बचा लिया. 

यह घटना बताती है कि गतिशीलता कितनी जरूरी है. पेचोरा में भी इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग है. इससे बिना रडार चलाए लक्ष्य ट्रैक किया जा सकता है. रडार बंद रखने से एंटी-रेडिएशन मिसाइल से बचा जा सकता है. रूसी और भारतीय दोनों अपग्रेड में थर्मल इमेजिंग जोड़ी गई है. थर्मल इमेजिंग दिन-रात काम करती है और रोशनी पर निर्भर नहीं रहती. हालांकि खराब मौसम में इसकी क्षमता कम हो सकती है.

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Pechora S-125 modernization

पुराना होने के बावजूद पेचोरा उपयोगी है. अगर इसमें गतिशीलता, आधुनिक सेंसर और बेहतर नेटवर्किंग जोड़ दी जाए तो इसकी सुरक्षा और इस्तेमाल की क्षमता काफी बढ़ जाएगी. इसकी 5वी27 मिसाइल में करीब 70 किलो का फ्रैगमेंटेशन वॉरहेड है. कमांड गाइडेंस सिस्टम है. रूस के पास इन मिसाइलों का बड़ा स्टॉक है.

इसलिए पुराने सिस्टम को नया रूप देना समझदारी भरा कदम है. आधुनिक युद्ध का सिद्धांत यही है कि पुराने हथियार को नए सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स, गतिशीलता और नेटवर्किंग से जोड़कर उसकी कीमत बदल दी जा सकती है.

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भारतीय वायुसेना को क्या सीखना चाहिए

भारतीय वायुसेना को अभी कई और एयर डिफेंस सिस्टम लगाने की जरूरत है. विमान, हेलीकॉप्टर, क्रूज मिसाइल, गाइडेड बम और ड्रोन जैसे सभी खतरों से निपटने के लिए मजबूत नेटवर्क चाहिए. नए सिस्टम बनाने में समय और पैसा दोनों लगते हैं. 

Pechora S-125 modernization

पुराने पेचोरा को मोबाइल बनाकर, आधुनिक इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और नेटवर्किंग जोड़कर जल्दी फायदा उठाया जा सकता है. भारत की तकनीकी क्षमता इतनी है कि यह काम स्थानीय स्तर पर किया जा सकता है. सही समझौते के साथ अतिरिक्त सिस्टम भी बनाए जा सकते हैं. इससे लागत भी कम आएगी.

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रूस का यह कदम पुरानी तकनीक को दोबारा जिंदा करने जैसा नहीं दिखता. यह दिखाता है कि आधुनिक युद्ध की जरूरत और अर्थव्यवस्था के हिसाब से पुराने हथियारों को कैसे बदला जा सकता है. भारत को भी अपने पेचोरा सिस्टम को स्थिर रखने के बजाय मोबाइल बनाने पर गंभीरता से सोचना चाहिए.

ड्रोन के युग में एयर डिफेंस की संख्या और गतिशीलता दोनों बढ़ानी होगी. रूस की यह तैयारी भारतीय वायुसेना के लिए सीखने लायक सबक है. पुराने सिस्टम को सही तरीके से अपग्रेड करके देश की सुरक्षा मजबूत की जा सकती है. समय रहते कदम उठाए गए तो भविष्य के खतरों से बेहतर तरीके से निपटा जा सकेगा.

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