भारत और जापान ने अपने रक्षा संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है. दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों की बैठक में समुद्री सुरक्षा समझौता साइन किया गया. इसमें नौसेना सहयोग, सूचना साझाकरण, खोज और बचाव (SAR), मानवीय सहायता और आपदा राहत (HDR) जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों पक्ष नौसेना जहाजों के संयुक्त विकास और डिजाइन पर काम करने पर सहमत हुए. जापान की एडवांस तकनीक और भारत की उत्पादन क्षमता का मेल 'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा देगा. यह कदम हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच रणनीतिक महत्व रखता है.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और जापानी रक्षा मंत्री शिन्जिरो कोइजुमी ने 20 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में द्विपक्षीय बैठक की. इसी बैठक में ये फैसले लिए गए.
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समुद्री सुरक्षा समझौते का महत्व
भारत और जापान ने मेरीटाइम डोमेन अवेयरनेस (MDA) सूचना साझाकरण पर नया समझौता किया. इसमें सर्च एंड रेस्क्यू, आपदा राहत और नौसेना सहयोग शामिल है. दोनों देश समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करेंगे. हिंद महासागर और प्रशांत महासागर की सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ी हुई है.
भारत का महासागर विजन और जापान का फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक पहल एक-दूसरे के पूरक हैं. इस समझौते से दोनों नौसेनाओं के बीच समन्वय बढ़ेगा. जहाजों की पारस्परिक यात्राएं, संयुक्त अभ्यास और लॉजिस्टिक सपोर्ट आसान होगा. इससे समुद्री व्यापार मार्ग सुरक्षित रहेंगे जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हैं.

थिएटर कमांड्स के साथ सहयोग
जापान और भारत ने सहमति जताई कि भारत के एकीकृत थिएटर कमांड्स बनने के बाद उनसे सहयोग बढ़ाया जाएगा. स्पेशल फोर्सेज के आदान-प्रदान को भी बढ़ावा दिया जाएगा. भारत अपनी सैन्य संरचना को थिएटर कमांड्स के रूप में रीऑर्गनाइज कर रहा है ताकि विभिन्न सेवाओं का बेहतर समन्वय हो. जापान के साथ यह सहयोग दोनों देशों की इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ाएगा. इससे संयुक्त अभियानों में आसानी होगी. बदलते सुरक्षा माहौल में यह कदम समयानुकूल है क्योंकि दोनों देश क्षेत्रीय स्थिरता चाहते हैं.
संयुक्त नौसैनिक जहाज निर्माण
दोनों पक्ष नौसेना जहाजों के संयुक्त विकास और डिजाइन की संभावना तलाशेंगे. जापान अपनी तकनीक उपलब्ध कराएगा जबकि भारत उत्पादन क्षमता का उपयोग करेगा. यह मेक इन इंडिया के तहत होगा. जापान के मॉगामी क्लास फ्रिगेट जैसे आधुनिक जहाजों की तकनीक भारत के लिए उपयोगी हो सकती है.
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पहले भी दोनों देशों ने यूएनआईसीओआरएन नेवल रेडियो एंटीना सिस्टम पर सह-विकास समझौता किया था. अब जहाज निर्माण में सहयोग से भारत की नौसेना आत्मनिर्भर बनेगी और जापान को उत्पादन आधार मिलेगा. इससे रक्षा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के अवसर पैदा होंगे.
जापानी फाइटर्स का भारत दौरा
जापानी फाइटर एयरक्राफ्ट पहली बार भारत आएंगे. वीर गार्डियन 26 अभ्यास में भाग लेंगे. दोनों देश अनमैन्ड सिस्टम वाले और जटिल अभ्यासों पर भी विचार कर रहे हैं. इससे वायुसेना सहयोग मजबूत होगा. संयुक्त अभ्यास से दोनों देशों के सैनिकों में समझ बढ़ेगी और क्षमताएं निखरेगी. यह सहयोग सिर्फ नौसेना तक सीमित नहीं रहकर थ्री सर्विसेज तक फैल रहा है.

नया समन्वय तंत्र और 2+2 संवाद
एक नया डायरेक्टर जनरल/जॉइंट सेक्रेटरी स्तर का वर्किंग ग्रुप बनाया जाएगा. यह परिचालन, खुफिया, प्रौद्योगिकी और रक्षा उद्योग सहयोग का समन्वय करेगा. दोनों पक्ष टोक्यो में चौथे भारत-जापान 2+2 संवाद को भी तेज करेंगे. यह तंत्र नियमित बातचीत सुनिश्चित करेगा. रक्षा उद्योग सहयोग से आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी. निर्भरता कम होगी.
चीन पर प्रभाव और क्षेत्रीय संदर्भ
यह सहयोग चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियों के बीच आया है. दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में तनाव बना हुआ है. भारत और जापान दोनों लोकतांत्रिक देश हैं और नियम आधारित व्यवस्था चाहते हैं. संयुक्त जहाज निर्माण और समुद्री सुरक्षा सहयोग से हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन मजबूत होगा. चीन की टेंशन बढ़ना स्वाभाविक है क्योंकि यह साझेदारी उसकी विस्तारवादी नीतियों का जवाब है. क्वाड ढांचे के तहत भी दोनों देश अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ काम कर रहे हैं.
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भारत-जापान रक्षा साझेदारी पिछले वर्षों में काफी आगे बढ़ी है. अब यह सिर्फ अभ्यासों तक सीमित नहीं रहकर प्रौद्योगिकी और उद्योग सहयोग तक पहुंच गई है. जापान ने अपनी रक्षा निर्यात नीति में बदलाव किया है जिससे सहयोग आसान हुआ. भारत की उत्पादन क्षमता और जापान की तकनीक का मेल दोनों के लिए फायदेमंद है.
समुद्री सुरक्षा पर फोकस इसलिए जरूरी है क्योंकि ज्यादातर व्यापार समुद्री मार्गों से होता है. थिएटर कमांड्स के साथ सहयोग भविष्य के युद्ध के लिए तैयारियां बढ़ाएगा. यह कदम इंडो-पैसिफिक में स्थिरता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण है. दोनों देश मिलकर क्षेत्रीय चुनौतियों का सामना कर सकेंगे.
रक्षा उद्योग में सहयोग से आर्थिक लाभ भी होंगे. आगे और अधिक संयुक्त परियोजनाएं आने की उम्मीद है. भारत और जापान की यह साझेदारी न सिर्फ द्विपक्षीय बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए भी मायने रखती है. चीन की बढ़ती आक्रामकता के बीच यह सहयोग संतुलन बनाए रखने में मदद करेगा.