ईरान और अमेरिका के बीच मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने के साथ ड्रोन युद्ध नया रूप ले चुका है. ईरान पारंपरिक हवाई ताकत में कमजोर होने के बावजूद सस्ते और बड़े पैमाने पर ड्रोन बनाकर अमेरिका को बड़ी चुनौती दे रहा है. स्वार्म अटैक की रणनीति से ईरान अमेरिकी ठिकानों, जहाजों और सहयोगी देशों पर दबाव बना रहा है.
ईरान की ड्रोन रणनीति: सस्ता लेकिन घातक
ईरान की ड्रोन नीति एसिमेट्रिक वॉरफेयर पर आधारित है. यानी कम खर्च में ज्यादा नुकसान पहुंचाना. ईरान के पास हजारों सस्ते शाहेद (Shahed) सीरीज के ड्रोन हैं. सबसे प्रसिद्ध Shahed-136 एक वन-वे अटैक ड्रोन है, जो 2000 किलोमीटर तक जा सकता है. 40-50 किलो वॉरहेड ले जाता है.
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ये ड्रोन बहुत सस्ते हैं – लगभग 20 से 50 हजार डॉलर में बन जाते हैं. ईरान इन्हें बड़े पैमाने पर उत्पादन करता है. हालिया संघर्ष में ईरान ने सैकड़ों ड्रोन एक साथ छोड़े, जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों को महंगे मिसाइलों से इन्हें रोकना पड़ रहा है. एक छोटे ड्रोन को मारने के लिए अमेरिका को लाखों डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. यह कॉस्ट इम्पोजिशन की रणनीति है- दुश्मन को महंगा पड़ता है, खुद को सस्ता.

ईरान Mohajer-6, Shahed-129, Mohajer-10 और Shahed-149 जैसे ड्रोन भी इस्तेमाल करता है. ये जासूसी, हमला और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के लिए इस्तेमाल होते हैं. भूमिगत फैक्टरियों और पहाड़ों में छिपी उत्पादन यूनिट्स की वजह से ईरान के ड्रोन उत्पादन को पूरी तरह रोकना मुश्किल है.
अमेरिका की ड्रोन ताकत: तकनीक में आगे, लेकिन महंगी
अमेरिका दुनिया की सबसे एडवां, ड्रोन ताकत रखता है. उसके पास MQ-9 Reaper जैसे हमलावर ड्रोन हैं, जो लंबे समय तक उड़ सकते हैं. हाई-रिजोल्यूशन कैमरे और मिसाइलें ले जाते हैं. एक Reaper की कीमत 30 मिलियन डॉलर से ज्यादा है. RQ-4 Global Hawk हाई एल्टीट्यूड पर जासूसी करता है. हजारों किलोमीटर कवर करता है.
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अमेरिका के पास कुल 16,000 से ज्यादा ड्रोन हैं, लेकिन बड़े और एडवांस ड्रोन की संख्या कुछ सौ में है. अमेरिका ने हाल ही में शाहेद-136 की नकल करके सस्ते LUCAS ड्रोन बनाए हैं, लेकिन उसकी संख्या अभी सीमित है. अमेरिका की ताकत बेहतर टेक्नोलॉजी, सैटेलाइट कंट्रोल, AI और स्टेल्थ क्षमता में है.

दोनों देशों की ड्रोन शक्ति की तुलना
संख्या: ईरान के पास हजारों शाहेद जैसे सस्ते ड्रोन हैं. वह सैकड़ों ड्रोन एक साथ छोड़ सकता है. अमेरिका के पास कुल ज्यादा ड्रोन हैं, लेकिन महंगे वाले कम हैं. ईरान की उत्पादन क्षमता बहुत तेज है. वह सैकड़ों सस्ते ड्रोन महीने में बना सकता है.
तकनीक और क्षमता: अमेरिकी ड्रोन ज्यादा सटीक, लंबे समय तक उड़ने वाले और बेहतर सेंसर्स वाले हैं. रीपर 27 घंटे तक उड़ सकता है. सटीक हमले करता है. ईरान के ड्रोन सरल हैं. GPS गाइडेड हैं, लेकिन स्वार्म में इस्तेमाल होने पर खतरनाक हो जाते हैं.
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लागत
रणनीति
हालिया संघर्ष में ईरान ने लाल सागर, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और अमेरिकी बेस पर ड्रोन हमले किए. अमेरिका ने कई ड्रोन मार गिराए, लेकिन हर बार महंगे इंटरसेप्टर इस्तेमाल करने पड़ रहे हैं.

ईरान की चुनौती कैसे बढ़ रही है?
ईरान अपने ड्रोन हूती विद्रोहियों, हिज्बुल्लाह और दूसरे प्रॉक्सी ग्रुप्स को भी देता है. इससे अमेरिका को कई मोर्चों पर लड़ना पड़ रहा है. ईरान भूमिगत मिसाइल सिटी की तरह ड्रोन बेस भी छिपाकर रखता है. अमेरिका ने जवाब में LUCAS जैसे सस्ते ड्रोन विकसित किए हैं. बेहतर काउंटर-ड्रोन सिस्टम (लेजर, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग) लगा रहा है.
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विशेषज्ञों का कहना है कि सस्ते ड्रोन की बाढ़ को पूरी तरह रोकना बहुत मुश्किल है. ड्रोन युद्ध अब आधुनिक लड़ाई का मुख्य हिस्सा बन चुका है. ईरान ने दिखाया कि तकनीकी रूप से कमजोर देश भी सस्ती तकनीक से महाशक्ति को टक्कर दे सकता है. अमेरिका अपनी तकनीक और एयर डिफेंस को और मजबूत कर रहा है, लेकिन लागत का बोझ बढ़ रहा है.
यह संघर्ष दिखाता है कि भविष्य की लड़ाई सिर्फ हथियारों की नहीं, बल्कि रणनीति, उत्पादन क्षमता और लागत प्रबंधन की भी होगी. ईरान फिलहाल ड्रोन के जरिए अमेरिका को मध्य पूर्व में बांधे रखने में सफल हो रहा है, जबकि अमेरिका अपनी बेहतर तकनीक से जवाब दे रहा है. स्थिति लगातार बदल रही है. ड्रोन युद्ध में ईरान की चुनौती अमेरिका के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गई है, जो आने वाले समय में और गहरा सकती है.