भारतीय वायु सेना के स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस MK1A कार्यक्रम में लंबे समय से इंजनों की कमी सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई थी. अब इस समस्या में राहत के साफ संकेत मिल रहे हैं. अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस ने सितंबर 2026 में चार और F404-IN20 इंजन भारत भेज दिए हैं. इससे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को अब तक कुल 14 इंजन मिल चुके हैं.
सरकार को उम्मीद है कि अक्टूबर से दिसंबर तक हर महीने चार इंजन और आएंगे. अगर यह कार्यक्रम कायम रहा तो साल के अंत तक HAL के पास करीब 20 से ज्यादा इंजन हो सकते हैं. यह विकास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि HAL के पास पहले से करीब 27 एयरफ्रेम तैयार पड़े हैं.
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सिर्फ एयरफ्रेम तैयार होना काफी नहीं है. विमान को वायु सेना में शामिल करने से पहले एईएसए रडार, हथियार सिस्टम और अन्य परीक्षण पूरे करने पड़ते हैं. जीई एयरोस्पेस ने कहा है कि वह भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमानों को शक्ति देने वाले इंजनों की आपूर्ति पर ध्यान दे रही है और HAL तथा भारतीय वायु सेना के साथ साझेदारी पर गर्व महसूस करती है.
इंजन आपूर्ति में सुधार कैसे हुआ
2021 में HAL और जीई के बीच 99 F404-IN20 इंजनों का अनुबंध हुआ था. इन इंजनों की कीमत करीब 5375 करोड़ रुपये थी. पहला इंजन मार्च 2025 में पहुंचा. लेकिन आपूर्ति धीमी रही. अगस्त 2026 में तीन इंजन आए थे. सितंबर में चार और आने से कुल संख्या 14 हो गई.

जीई ने पहले 2026 में 20 इंजन देने का वादा किया था. रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार अक्टूबर-दिसंबर में चार-चार इंजन आने की योजना है. इससे HAL उत्पादन तेज कर सकेगा. सरकार का लक्ष्य है कि 2026 के अंत तक कम से कम एक पूरा तेजस MK1A स्क्वॉड्रन वायु सेना में शामिल हो जाए.
HAL के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक रवि के ने पहले बताया था कि 27 एमके-1ए एयरफ्रेम तैयार हैं, लेकिन एईएसए रडार इंटीग्रेशन और हथियार परीक्षण जैसे एक-दो मुद्दे अभी बाकी हैं. इनके सुलझने के बाद ही पहला बैच वायु सेना को सौंपा जा सकेगा.
वायु सेना को क्यों है इतनी जल्दी
भारतीय वायु सेना की लड़ाकू स्क्वॉड्रन संख्या घटकर 29 रह गई है, जबकि स्वीकृत संख्या 42.5 है. मिग-21 विमानों को चरणबद्ध तरीके से बाहर किया जा रहा है, जिससे यह कमी और बढ़ रही है. वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने वायु सेना दिवस से पहले अपनी वार्षिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा कि लड़ाकू विमानों की देरी हमें नुकसान पहुंचा रही है.
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उन्होंने बताया कि कमी को रोकने और स्क्वॉड्रन संख्या बढ़ाने के लिए अगले कुछ वर्षों में हर साल 36 से 40 लड़ाकू विमान शामिल करने की जरूरत है. उन्होंने कहा, “हमें हर साल दो लड़ाकू स्क्वॉड्रन शामिल करने की जरूरत है... असल में इससे भी ज्यादा की जरूरत है.”
सिंह ने जोर दिया कि तकनीक में देरी का मतलब तकनीक से वंचित होना है. तेजस कार्यक्रम में हुई देरी को उन्होंने महत्वपूर्ण बताया. पुराने विमानों की जगह नए विमान जल्द आने से ही वायु सेना की युद्ध क्षमता मजबूत हो सकती है. चीन और पाकिस्तान की बढ़ती ताकत को देखते हुए यह कमी चिंता का विषय है.
दो बड़े ऑर्डर और स्वदेशीकरण
वायु सेना के पास कुल 180 तेजस MK1A विमानों के ऑर्डर हैं. पहला अनुबंध फरवरी 2021 में 83 विमानों के लिए हुआ था. दूसरा अनुबंध सितंबर 2025 में 97 अतिरिक्त विमानों के लिए हुआ, जिसमें 68 लड़ाकू और 29 ट्विन-सीटर विमान शामिल हैं. इस दूसरे सौदे की कीमत कर छोड़कर 62370 करोड़ रुपये से ज्यादा है.
दूसरे बैच की डिलीवरी 2027-28 से शुरू होकर छह साल में पूरी होनी है. दूसरे ऑर्डर में ज्यादा स्वदेशी सिस्टम शामिल किए गए हैं. विमान में 64 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री होगी. पहले अनुबंध की तुलना में 67 अतिरिक्त आइटम जोड़े गए हैं. इनमें स्वदेशी उत्तम एईएसए रडार, स्वयं रक्षा कवच और स्वदेशी कंट्रोल सरफेस एक्चुएटर जैसे सिस्टम शामिल हैं. इससे मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी निर्भरता घटेगी.
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HAL ने नवंबर 2025 में जीई एयरोस्पेस के साथ 113 और एफ404-जीई-आईएन20 इंजनों तथा संबंधित सपोर्ट पैकेज का समझौता किया. ये इंजन 97 विमानों के दूसरे कार्यक्रम के लिए हैं और 2027 से 2032 के बीच आने वाले हैं. यह समझौता पहले 83 विमानों के इंजनों से अलग है. इससे लंबे समय तक आपूर्ति सुनिश्चित होगी.
उत्पादन बढ़ाने की कोशिश
HAL उत्पादन इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ा रहा है. कंपनी का लक्ष्य सालाना करीब 24 विमान बनाने का है. फिलहाल सबसे जरूरी है कि बढ़ती इंजन आपूर्ति को पूरा और चालू विमान बनाने में बदला जाए. 27 एयरफ्रेम तैयार हैं. अब इंजन आने की रफ्तार, रडार और हथियार इंटीग्रेशन परीक्षण पूरे होने पर निर्भर करेगा कि ये विमान कितनी जल्दी वायु सेना तक पहुंचें.

पिछले कुछ वर्षों में इंजन आपूर्ति की कमी ने कार्यक्रम को पीछे धकेला. अब 14 इंजन मिल चुके हैं और साल के अंत तक कम से कम आठ और आने की उम्मीद है. इससे अड़चन कम हो रही है. अगली चुनौती है इन इंजनों और तैयार एयरफ्रेम को असली डिलीवरी में बदलना.
सरकार 83 और 97 विमानों के संयुक्त ऑर्डर के जरिए एमके-1ए बेड़े को मजबूत करने पर काम कर रही है. दूसरा बैच 2033 तक धीरे-धीरे आएगा. लेकिन फिलहाल पहला स्क्वॉड्रन जल्द तैयार करना सबसे जरूरी है. इंजन लगने के बाद भी जमीनी जांच, इंजन रन, उड़ान परीक्षण और स्वीकृति प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है.
HAL को इन चरणों को तेज करना होगा. वायु सेना की स्क्वॉड्रन कमी को देखते हुए हर महीने की देरी नुकसानदेह है. स्वदेशी रडार और अन्य सिस्टम लगाने से विमान ज्यादा आधुनिक बनेगा, लेकिन इनके परीक्षण में समय लगना स्वाभाविक है. जीई उत्पादन बढ़ा रही है. 2026-27 में 24 और उसके बाद 30 इंजन सालाना बनाने का लक्ष्य है. अगर यह रफ्तार बनी रही तो HAL को स्थिर आपूर्ति मिल सकेगी.
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तेजस MK1A सिर्फ एक विमान नहीं, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता का प्रतीक है. लंबे समय तक विदेशी विमानों पर निर्भर रहने के बाद यह कार्यक्रम देश की वायु शक्ति को मजबूत करने वाला है. इंजनों की आपूर्ति सुधरना अच्छी खबर है. लेकिन एयरफ्रेम तैयार होने और इंजन आने का मतलब विमान तैयार होना नहीं है. रडार, हथियार और अन्य सिस्टम का सही इंटीग्रेशन जरूरी है. वायु सेना प्रमुख की चिंता जायज है.
स्क्वॉड्रन संख्या बढ़ाने के लिए नियमित डिलीवरी चाहिए. अगर 2026 के अंत तक पहला स्क्वॉड्रन आ गया तो यह बड़ा कदम होगा. उसके बाद सालाना उत्पादन बढ़ाकर कमी को पाटा जा सकता है. सरकार, HAL, जीई और वायु सेना को मिलकर काम करना होगा. तकनीक में देरी का मतलब सुरक्षा में कमी है.
अब मौका है इस कार्यक्रम को पटरी पर लाने का. 14 इंजन और 27 एयरफ्रेम के साथ रास्ता साफ हो रहा है. अब जरूरत है तेज फैसले और सटीक काम की, ताकि भारतीय आसमान में और ज्यादा स्वदेशी तेजस उड़ सकें और वायु सेना मजबूत बने.