मुंबई की एक सेशन कोर्ट ने कथित रेप के एक मामले में आरोपी को बरी कर दिया है. अदालत ने कहा कि मामले की शिकायतकर्ता महिला कई वर्षों से लापता है और उसके बिना आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत उपलब्ध नहीं हैं. कोर्ट ने माना कि इस मामले में पीड़िता की गवाही सबसे महत्वपूर्ण थी, लेकिन उसके गैरमौजूद रहने की वजह से अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित नहीं कर सका.
यह मामला उस महिला से जुड़ा है, जो अपने पति से झगड़े के बाद घर छोड़कर चली गई थी. अभियोजन पक्ष के अनुसार, महिला ने आरोप लगाया था कि एक व्यक्ति ने उसे अपनी बस में बैठाकर नशीला पदार्थ पिलाया और उसके बाद उसके साथ दुष्कर्म किया. हालांकि, लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद मुंबई सेशन कोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
अभियोजन पक्ष के रिकॉर्ड के अनुसार, 25 नवंबर 2018 को पुलिसकर्मियों ने एक 35 वर्षीय महिला को एक बस के अंदर बैठे हुए पाया था. पूछताछ के दौरान महिला ने बताया कि वह अपने पति की दूसरी पत्नी है. उसके पति की पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी और महिला ने यह भी बताया था कि वह और उसका पति दोनों एड्स से पीड़ित हैं.
महिला ने पुलिस को बताया था कि घटना से एक रात पहले उसका अपने पति से झगड़ा हुआ था. इसके बाद वह घर छोड़कर मुंबई के उपनगरीय इलाके विक्रोली के एक बस स्टॉप पर पहुंच गई थी. इसी दौरान एक व्यक्ति ने उसे अपनी बस से उसकी मंजिल तक पहुंचाने का प्रस्ताव दिया.
महिला के मुताबिक, आरोपी बस चालक उसे बस में बैठाकर गांधी नगर जंक्शन की ओर ले गया, जो लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर था. वहां पहुंचने के बाद उसने बस को सड़क किनारे रोक दिया और महिला से बस में ही बैठने को कहा. इसके बाद वह खाने का सामान लाने की बात कहकर बाहर गया.
अभियोजन के अनुसार, आरोपी ने महिला को एक सॉफ्ट ड्रिंक दी, जिसमें कथित तौर पर नशीला पदार्थ मिलाया गया था. महिला ने आरोप लगाया कि ड्रिंक पीने के बाद वह बेहोश हो गई और इसी दौरान उसके साथ दुष्कर्म किया गया. होश में आने के बाद उसने पुलिस हेल्पलाइन पर फोन किया, जिसके बाद पुलिस ने उसे बस से बरामद किया था.
मामले में आरोपी को बाद में वर्ष 2023 में गिरफ्तार किया गया था. पुलिस ने उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, लेकिन आरोपी ने खुद को निर्दोष बताया. ट्रायल के दौरान पुलिस ने अदालत के सामने तीन गवाह पेश किए और आरोपों को साबित करने की कोशिश की.
सुनवाई के दौरान पुलिस ने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता महिला की तलाश के लिए कई प्रयास किए गए. पुलिस ने समय-समय पर महिला को खोजने के लिए रिपोर्ट भी दाखिल की, लेकिन उसका कोई पता नहीं चल सका. यहां तक कि पुलिस महिला की मृत्यु से जुड़े किसी प्रमाण तक भी नहीं पहुंच पाई.
विशेष न्यायाधीश सुरेखा सिन्हा ने अपने फैसले में कहा कि कथित घटना के समय महिला बस में अकेली थी, इसलिए उसकी गवाही सबसे महत्वपूर्ण और प्रमुख साक्ष्य थी. अदालत ने यह भी कहा कि महिला के एड्स से पीड़ित होने का दावा किया गया था, लेकिन इस संबंध में कोई मेडिकल रिपोर्ट रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई.
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी महिला के लिए एक अज्ञात व्यक्ति था, लेकिन जांच एजेंसियों ने उसकी पहचान परेड भी नहीं कराई. न्यायालय ने कहा कि कम से कम अदालत में शिकायतकर्ता द्वारा आरोपी की पहचान किया जाना आवश्यक था. लेकिन शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति में न तो एफआईआर की सामग्री साबित हो सकी और न ही आरोपी की पहचान.
विशेष न्यायाधीश सुरेखा सिन्हा ने अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता की गवाही के अभाव में यह साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है कि आरोपी ने दुष्कर्म किया था, न ही यह साबित हुआ कि उसे कोई संदिग्ध पदार्थ पिलाया गया या उसे बस में अवैध रूप से बंधक बनाया गया. अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता की गवाही के बिना मेडिकल साक्ष्यों पर चर्चा करने का भी कोई औचित्य नहीं है. पर्याप्त और संतोषजनक साक्ष्य न होने के कारण अदालत ने आरोपी को बरी करते हुए उसकी जेल से रिहाई का आदेश दे दिया.