महाराष्ट्र के एक प्रसिद्ध मंदिर ट्रस्ट में ट्रस्टियों की नियुक्ति रोकने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस के नाम का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल किए जाने का मामला सामने आया है. इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने ही प्रशासन की एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी को कड़ी फटकार लगाई है.
जस्टिस जीएस कुलकर्णी और जस्टिस नीला गोखले की बेंच ने अधिकारी के आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए रद्द कर दिया. अदालत ने कहा कि यह बेहद अनुचित आचरण है और अधिकारी के खिलाफ गंभीर कदाचार का मामला भी हो सकता है.
यह पूरा मामला महाराष्ट्र के नासिक स्थित प्रसिद्ध श्री सप्तश्रृंगी निवासिनी देवी ट्रस्ट से जुड़ा है. इस धार्मिक स्थल का प्रबंधन जिला अदालत की ओर से तय एक योजना के तहत किया जाता है. ट्रस्ट में नए ट्रस्टियों की नियुक्ति के लिए खुली चयन प्रक्रिया आयोजित की गई थी.
इसमें 600 से ज्यादा लोगों ने आवेदन किया था और उम्मीदवारों के विस्तृत इंटरव्यू भी लिए गए थे. इस प्रक्रिया के बाद नासिक के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज ने 12 मार्च 2026 को पांच उम्मीदवारों के नाम ट्रस्टी पद के लिए फाइनल किए थे.
लेकिन चयन सूची जारी होने के महज दो दिन बाद ही पूरी प्रक्रिया पर रोक लगा दी गई. उस समय बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की स्पेशल ऑफिसर के पद पर तैनात अंजू शेंडे ने नासिक के जिला जज को ईमेल भेजा.
इस ईमेल में उन्हें तत्काल वेबसाइट से पांच उम्मीदवारों की चयन सूची हटाने और नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया रोकने का निर्देश दिया गया था. इस अचानक आए निर्देश के बाद ट्रस्टियों की नियुक्ति का मामला अटक गया. चयन प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद पांचों उम्मीदवारों की नियुक्ति आगे नहीं बढ़ सकी.
अंजू शेंडे ने अपने ईमेल में दावा किया था कि उन्हें तत्कालीन चीफ जस्टिस ने फोन पर सीधे निर्देश दिए हैं. उन्होंने राज्य सरकार के एक अध्यादेश (State Ordinance) से जुड़े कानूनी पहलुओं और संभावित अनिश्चितता का हवाला देते हुए नियुक्ति प्रक्रिया रोकने की बात कही थी.
इस निर्देश के बाद नासिक के जिला जज ने चयन सूची वेबसाइट से हटवा दी और नियुक्तियों पर रोक लगा दी. हालांकि, इस आदेश के पीछे किसी आधिकारिक फाइल या लिखित प्रस्ताव का रिकॉर्ड मौजूद नहीं था. बाद में यही सवाल पूरे विवाद का सबसे अहम आधार बना.
नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगाए जाने के बाद चयनित पांच उम्मीदवारों ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने इस रोक को चुनौती देते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की.
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट प्रशासन और अंजू शेंडे की ओर से पेश वकीलों ने स्वीकार किया कि ईमेल भेजे जाने से पहले तत्कालीन चीफ जस्टिस के सामने कोई आधिकारिक फाइल, प्रस्ताव या लिखित आवेदन पेश नहीं किया गया था. यानी चीफ जस्टिस के नाम पर जारी निर्देश के समर्थन में कोई औपचारिक प्रशासनिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं था. इस खुलासे के बाद अदालत ने पूरी कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए.
जस्टिस जीएस कुलकर्णी और जस्टिस नीला गोखले की बेंच ने इस बात पर हैरानी जताई कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के सचिवालय में काम करने वाली कोई अधिकारी बिना किसी आधिकारिक रिकॉर्ड या कानूनी प्रशासनिक अधिकार के इतना बड़ा निर्देश कैसे जारी कर सकती है.
अदालत ने अंजू शेंडे के बचाव को स्वीकार नहीं किया. बेंच ने स्पष्ट कहा कि ईमेल में दिए गए निर्देशों को तत्कालीन चीफ जस्टिस का कानूनी फैसला नहीं माना जा सकता. अदालत के मुताबिक, स्पेशल ऑफिसर ने चीफ जस्टिस के नाम का गलत इस्तेमाल करते हुए विवादित ईमेल जारी किया था. ऐसा करने के पीछे क्या वजह थी, यह भी रिकॉर्ड पर सामने नहीं आया.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में अधिकारी के आचरण को बेहद गंभीर बताया. बेंच ने कहा कि यह केवल अधिकारों का अतिक्रमण नहीं है, बल्कि संभव है कि यह संबंधित अधिकारी की ओर से गंभीर कदाचार (Serious Misconduct) का मामला भी हो.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चीफ जस्टिस के सचिवालय में काम करने का मतलब यह नहीं है कि किसी अधिकारी को मनमाने या गैरकानूनी निर्देश जारी करने की छूट मिल जाती है. न्यायपालिका के सर्वोच्च पद के साथ काम करने से किसी को असीमित अधिकार नहीं मिल जाते.
सुनवाई के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने अंजू शेंडे की ओर से भेजे गए विवादित ईमेल को रद्द कर दिया. इसके साथ ही नासिक के जिला जज की ओर से नियुक्ति प्रक्रिया पर लगाई गई रोक का आदेश भी निरस्त कर दिया गया.
अदालत के इस फैसले से श्री सप्तश्रृंगी निवासिनी देवी ट्रस्ट में पांच ट्रस्टियों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है. इस तरह हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी न्यायिक या प्रशासनिक प्रक्रिया को रोकने के लिए विधिवत अधिकार और आधिकारिक रिकॉर्ड का होना जरूरी है.