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'मुंबई मैनहट्टन जैसी, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर 18वीं सदी का!' हर्ष गोयनका के पोस्ट पर पूर्व अफसर ने उठाया सवाल

मुंबई की ऊंची इमारतों और उसके नीचे मौजूद बदहाल बुनियादी ढांचे का यह विरोधाभास सिर्फ शहर की खूबसूरती और बदसूरती का सवाल नहीं है. यह शहरी नियोजन, प्रशासनिक फैसलों, राजनीतिक प्राथमिकताओं और नागरिक जवाबदेही से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है.

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मुंबई के चमकते स्काईलाइन पर हर्ष गोयनका का तंज (Photo-ITG)
मुंबई के चमकते स्काईलाइन पर हर्ष गोयनका का तंज (Photo-ITG)

मुंबई की चमकती गगनचुंबी इमारतों और शहर के बदहाल बुनियादी ढांचे के बीच का अंतर एक बार फिर चर्चा में है. आरपीजी एंटरप्राइजेज के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने मुंबई की तस्वीर साझा करते हुए शहर की सड़कों, झुग्गियों, गड्ढों और जर्जर बुनियादी ढांचे पर सवाल उठाए. उनके बयान पर दिल्ली की पूर्व मुख्य सचिव शैलजा चंद्रा ने सहमति जताते हुए इससे भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया- आखिर मुंबई को इस स्थिति तक पहुंचने दिया किसने?

हर्ष गोयनका ने एक पोस्ट में लिखा कि मुंबई दूर से देखने पर शानदार गगनचुंबी इमारतों के साथ किसी मैनहट्टन जैसी नजर आती है. लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे फैली झुग्गियां, टूटी सड़कें, गड्ढे और जर्जर बुनियादी ढांचा शहर की दूसरी तस्वीर दिखाते हैं. उन्होंने इसे इस अंदाज में बताया कि मुंबई की गगनचुंबी इमारतें 21वीं सदी की हैं, जबकि उसका बुनियादी ढांचा 18वीं सदी जैसा नजर आता है.

शैलजा चंद्रा ने उठाया जवाबदेही का सवाल

गोयनका की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए शैलजा चंद्रा ने कहा कि वह उनकी आलोचना का स्वागत करती हैं. उन्होंने कहा कि वह गोयनका को उनकी शानदार तस्वीरों और अक्सर समझदारी भरी टिप्पणियों के लिए फॉलो करती हैं. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि कभी-कभी उन्हें लगता है कि गोयनका उन मुद्दों पर आलोचना करने से बचते हैं, जहां सवाल सीधे सत्ता और व्यवस्था तक पहुंच सकता है.

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उन्होंने कहा कि इस बार की टिप्पणी का वह पूरी तरह समर्थन करती हैं, लेकिन इसके साथ यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर मुंबई को इस हालत तक पहुंचने दिया किसने.

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राजनीतिक और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल

शैलजा चंद्रा ने कहा कि हर्ष गोयनका एक प्रभावशाली उद्योगपति हैं और वह खुद एक सेवानिवृत्त नौकरशाह हैं. दोनों इस बात से परिचित हैं कि किस तरह नगर निकाय के नियमों और शहर की योजना को राजनीतिक और प्रशासनिक फैसलों के जरिए कमजोर किया जा सकता है.

उन्होंने कहा कि अतिक्रमण को नजरअंदाज किया जाता है, नगर निकाय के कानूनों का पालन नहीं होता और वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा मिलता है. उनके मुताबिक जब किसी इलाके की आबादी और निर्माण वहां की पानी, सीवर और जल निकासी व्यवस्था की क्षमता से आगे बढ़ जाता है, तो इसके नतीजे पहले से तय होते हैं.

आम लोगों को भुगतना पड़ता है खामियाजा

उन्होंने शहर में आर्थिक और सामाजिक असमानता की ओर भी इशारा किया. उनका कहना था कि प्रभावशाली लोग ऊंची दीवारों, सुरक्षा व्यवस्था और बंद खिड़कियों के पीछे शहर की परेशानियों से खुद को काफी हद तक बचा सकते हैं. लेकिन जिन लोगों के पास ऐसी सुरक्षा नहीं है, वे कई बार खुलकर अपनी बात कहने की स्थिति में भी नहीं होते, क्योंकि उन्हें अपने परिवार और रोजी-रोटी की चिंता होती है.

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तस्वीरों से आगे बढ़कर जवाबदेही तय करने की जरूरत

शैलजा चंद्रा ने सवाल उठाया कि आखिर मुंबई की चमक और बदहाली के इस विरोधाभास को हम कब तक सिर्फ तस्वीरों के जरिए देखते और साझा करते रहेंगे. उनके मुताबिक अब यह पूछने की जरूरत है कि इन हालात को पैदा करने के लिए कौन जिम्मेदार है, कौन आज भी इन्हें बढ़ावा दे रहा है और शहर की बुनियादी सुविधाओं की इस कथित उपेक्षा के लिए जवाब कौन देगा.
 

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