रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने रेपो रेट में अनचेंज करके बैंक और फाइनेंशियल शेयरों को सपोर्ट दिया. साथ ही डॉलर भारत में लेकर आने के लिए भी कुछ उपाए किए. इसके अलावा, सरकार ने भी एफआईआई को लुभाने के लिए ऐलान किए, फिर भी भारतीय शेयर बाजार में गिरावट देखने को मिली.
भारतीय शेयर बाजार में सेंसेक्स 116.67 अंक गिरकर 74,243.34 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 अंक टूटकर 23,366.70 पर था. हालांकि, बैंक निफ्टी में 188 अंकों की तेजी रही. इंट्राडे के दौरान निफ्टी में 100 अंकों से ज्यादा की गिरावट देखने को मिली.
BSE सेंसेक्स के टॉप 30 शेयरों में से 17 शेयर गिरावट पर रहे और बाकी 13 शेयरों में तेजी दिखी. सबसे ज्यादा गिरावट टाटा के शेयरों में रही. टाटा के टीसीएस, ट्रेंट और टाटा स्टील शेयर 3 फीसदी तक गिर गए थे. वहीं तेजी वाले शेयरों में बजाज फाइनेंस, हिंदुस्तान यूनिलीवर और अडानी पोर्ट के शेयर रहे.
शुक्रवार को RBI और सरकार ने कई ऐलान किए, जो शेयर बाजार के लिए अच्छे हो सकते थे, लेकिन शेयर बाजार में गिरावट आई, लेकिन ये गिरावट क्यों हुई? आइए जानते हैं... हालांकि, उससे पहले यह जान लेते हैं कि सरकार और आरबीआई ने क्या-क्या ऐलान किया?
बॉन्ड मार्केट में टैक्स छूट
विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए आरबीआई ने बॉन्ड मार्केट में एक बड़ी छूट दी. 1 अप्रैल से प्रभावी, किसी भी विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा सरकारी सिक्योरिटी बेचने पर हुई कमाई पर कोई भी LTCG टैक्स नहीं देना होगा. लंबे समय तक इसकी मांग की जा रही थी, ताकि देश में विदेशी निवेश बढ़ सके. जिसे अब लागू कर दिया गया है. इससे FIIs के भारत में निवेश बढ़ने की संभावना है.
ब्याज दर में नहीं कोई बदलाव
आरबीआई ने आम लोगों को राहत देते हुए रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया, जबकि ग्लोबल अनिश्चतता के कारण दुनिया भर में रेट बढ़ाए जा रहे हैं. लेकिन आरबीआई ने रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर ही अनचेंज रखा है. इस फैसले ने बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयरों को सपोर्ट किया. फिर भी शेयर बाजार में दबााव दिखाई दिया.
डॉलर के फ्लो को बढ़ाने के लिए आरबीआई के कई उपाय
फिर क्यों गिरा शेयर बाजार?
ये सभी फैसले विदेशी संस्थागत निवेशकों को भारत में लाने की एक पहल मानी जा रही है, फिर भी शेयर बाजार में आज दबाव दिखाई दिया. इससे एक खास बात पता चलती है. बाजार का मानना है कि नीति निर्माताओं ने अपने नियंत्रण में रहते हुए लगभग सब कुछ कर लिया है. आगे क्या होगा यह उन कारकों पर निर्भर करता है जिन पर न तो आरबीआई और न ही सरकार का कोई कंट्रोल है. वह है कच्चे तेल के दाम और जियो पॉलिटिकल टेंशन, जो मौजूदा समय में जारी है.
आज भारत के सामने जो चुनौती है, वह लिक्विडिटी या मांग की नहीं है. अर्थव्यवस्था आपूर्ति संकट से जूझ रही है. शेयर बाजार ऐसी स्थिति नहीं चाहता जहां ऊर्जा की बढ़ती लागत मांग को कम कर दे. साथ ही, ऐसे समय में जब भारत एआई-ट्रेड और भू-राजनीतिक स्थिति के कारण वैश्विक स्तर पर अनुकूल प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा है. ऐसे में रुपये का कमजोर होना भी बाजार के लिए ठीक नहीं है.
जानकारों का कहना है कि इससे मार्केट में तेजी भले ही ना आए, लेकिन आगे चलकर शेयर बाजार को सपोर्ट दे सकता है. यह एक कवच के तौर पर काम कर सकता है. वहीं 3 से 4 महीनों में इस उपाय से 30 से 40 अरब डॉलर के आने की उम्मीद जताई जा रही है.
(नोट- किसी भी शेयर में निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की मदद जरूर लें.)