ईरान-अमेरिका जंग चरम पर पहुंचने और होर्मुज के बंद होने के बाद कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई थीं, जिसके बाद पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़े थे. हालांकि, अब कच्चे तेल के दाम तेजी से नीचे आए हैं और 80 डॉलर प्रति बैरल के नीचे कारोबार कर रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी पेट्रोल-डीजल को लेकर राहत मिलती हुई नहीं दिख रही है.
केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने गुरुवार को कहा कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने के बाद वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे गिर गई हैं, लेकिन उपभोक्ताओं को ईंधन की कीमतों में तत्काल कमी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.
तुरंत कम नहीं हो सकते पेट्रोल-डीजल के दाम
पत्रकारों से बात करते हुए गोपी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने पर ईंधन की कीमतों में तुरंत कमी नहीं की जा सकती है, क्योंकि सस्ते तेल की खरीद और भारत तक परिवहन में समय लगता है. उन्होंने कहा कि सस्ता कच्चा तेल मार्केट में पहुंचने में समय लगेगा, क्योंकि सस्ते कच्चे तेल को होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत तक पहुंचन होगा, जिसके बाद रिफाइनिंग में समय लगेगा और फिर धीरे-धीरे करके स्थिति सामान्य होगी.
गोपी ने कहा कि ईंधन की कीमतों में हालिया वृद्धि का केवल लगभग 3.94 रुपये प्रति लीटर का ही सीधा प्रभाव पड़ा है, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने मात्र से उस वृद्धि को तुरंत वापस नहीं लिया जा सकता है.
तेल कंपनियों को झेलना पड़ा काफी दबाव
मंत्री ने कहा कि इस साल की शुरुआत में पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने के बाद भारतीय तेल कंपनियों को काफी दबाव का सामना करना पड़ा और केंद्र ने उस दबाव के कुछ हिस्से को वहन किया है. गोपी ने कहा कि इस प्रभाव को झेलने के चक्कर में केंद्र सरकार को 12,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. किसी भी राज्य ने ईंधन की बढ़ी कीमत पर कम टैक्स लगाकर अपने राजस्व में कमी नहीं की. केंद्र सरकार को अपना कामकाज लाना है और तेल कंपनियों को अपना अस्तित्व बनाए रखना है.
एक्सपर्ट्स अब भी है संशय
कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई है, लेकिन विश्लेषक इस बात पर बंटे हुए हैं कि वैश्विक तेल बाजार कितनी जल्दी सामान्य स्थिति में लौट सकते हैं. गोल्डमैन सैक्स ने तेल की कीमतों के अपने पूर्वानुमानों में कटौती की है, जिसका कारण यह उम्मीद है कि फारस की खाड़ी से निर्यात पहले की अपेक्षा जल्दी सामान्य हो जाएगा. ब्रोकरेज फर्म ने 2026 की चौथी तिमाही के लिए ब्रेंट क्रूड के पूर्वानुमान को 90 डॉलर प्रति बैरल से घटाकर 80 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है और 2027 के औसत पूर्वानुमान को 80 डॉलर से घटाकर 75 डॉलर कर दिया है.
हालांकि, एमके ग्लोबल ने चेतावनी दी कि राजनयिक सफलता के बावजूद बाजार निकट भविष्य में आपूर्ति संबंधी बाधाओं को कम आंक रहे होंगे. ब्रोकरेज फर्म ने रसद संबंधी रुकावट, उच्च बीमा लागत, टैंकरो की उपलब्धता संबंधी समस्याओं और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए कहा कि होर्मुज के माध्यम से आपूर्ति को सामान्य होने में हफ्तों, या शायद महीनों भी लग सकते हैं.
एमके ने आगे कहा कि आने वाले हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के करीब या उससे भी ऊपर जा सकती हैं. ब्रोकरेज फर्म को उम्मीद है कि महीनों तक भंडार में कमी और रिफाइनरी गतिविधियों में सुस्ती के बाद चीनी तेल आयात में सुधार होगा. वैश्विक भंडार में कमी और कई देशों द्वारा रणनीतिक भंडार को फिर से बनाने के प्रयासों के साथ, 2026 तक मांग आपूर्ति से अधिक बनी रह सकती है.
भारत की लागत में कटौती
ICICI सिक्योरिटीज के अनुसार, संघर्ष से संबंधित 10-15 डॉलर प्रति बैरल के प्रीमियम को हटाने से भारत के कच्चे तेल के आयात बिल में हर महीने 1.5-1.8 बिलियन डॉलर की कमी आ सकती है. कच्चे तेल और गैस की कम कीमतें रिफाइनर, शहरी गैस वितरकों और एलएनजी अवसंरचना कंपनियों के लिए लाभप्रदता में भी सुधार कर सकती हैं.
साथ ही, ब्रोकरेज फर्म ने कहा कि ओएनजीसी और ऑयल इंडिया जैसे अपस्ट्रीम उत्पादक अगले दो वर्षों में उत्पादन वृद्धि के समर्थन से तब भी लाभ में बने रहेंगे, भले ही कच्चे तेल की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर हो जाए. फिलहाल वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से ईंधन पंपों पर तत्काल राहत मिलने की संभावना नहीं है.