एक कहावत है कि 'रोज एक सेब खाएं और डॉक्टर को दूर भगाएं', लेकिन अब लग रहा है कि डॉक्टर को भगाने के लिए सेब ही नहीं बचेंगे. ये हम नहीं कह रहे, बल्कि रिपोर्ट्स में अधिकारियों के हवाले से ये डराने वाले अनुमान जाहिर किए जा रहे हैं. सेब के उत्पादन के लिए सबसे बड़ा खलनायक बन रहा है मौसम का मिजाज, जिसके चलते हिमाचल प्रदेश में इस साल सेब उत्पादन में 40 फीसदी की बड़ी गिरावट की आशंका जताई जा रही है.
Apple इकोनॉमी खतरे में है
बिजनेस टुडे पर छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमाचल प्रदेश की 5,000 करोड़ रुपये की सेब अर्थव्यवस्था (Apple Economy) इस समय अभूतपूर्व जलवायु संकट का सामना कर रही है. मौसम की अनियमितता के चलते इस साल सेब उत्पादन में लगभग 40% की गिरावट आने की आशंका है और ये सेब की फसल पर निर्भर जिससे इस फसल पर निर्भर करीब 25 लाख किसान परिवारों की आजीविका पर संकट मंडरा रहा है.
अधिकारियों को सता रही चिंता
हिमाचल प्रदेश राज्य के बागवानी अधिकारियों ने अनुमान जाहिक करते हुए कहा कि राज्य में सेब का उत्पादन 2025 में 6.99 लाख मीट्रिक टन से घटकर 2026 में लगभग 4.36 लाख मीट्रिक टन (लगभग 2.15 करोड़ बक्से) रह जाएगा, यानी 2.63 लाख मीट्रिक टन की गिरावट आएगी. इसके साथ ही इसी अनुपात में सेब अर्थव्यवस्था में भी गिरावट देखने को मिल सकती है.
सेब उत्पादन में इस बड़ी गिरावट को लेकर अधिकारियों ने कारण बताते हुए कहा कि सर्दियों में अपर्याप्त हिमपात, बेमौसम बारिश, लगातार ओलावृष्टि और तापमान में अनियमित उतार-चढ़ाव से ये हालात पैदा हुए हैं. बागवानों की मानें, तो मौसम ने उत्पादन लागत बढ़ाने और पैदावार घटाने की चुनौतियां पैदा कर दी हैं. दूसरी ओर कीटनाशक दवाओं और मशीनरी समेत अन्य एग्रीकल्चर उपकरणों की कीमतों में बढ़ोतरी ने उनका बोझ बढ़ा दिया है.
किसानों ने सरकार से लगाई गुहार
राज्य के भारी भरकम 5000 करोड़ रुपये के करीब के सेब कारोबार पर संकट बढ़ता देख, किसानों ने सरकार से मदद की गुहार लगाई है. उन्होंने फसल बीमा योजनाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने का आग्रह किया है, ताकि नुकसान की भरपाई में मदद मिल सके.
मौसम का बदलता मिजाज न सिर्फ राज्य की इकोनॉमी, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी मुसीबत माना जा रहा है, इसका प्रभाव सिर्फ सेब तक ही सीमित नहीं है. तमाम एक्सपर्ट शेयर बाजार पर भी मौसम के प्रभाव का अनुमान जता रहे हैं.
मौसम बनता जा रहा खलनायक?
बीते कुछ महीनों में कच्चे तेल की कीमतों ने महंगाई का जोखिम बढ़ाया था, लेकिन अब अमेरिका-ईरान में बात बनते ही तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगातार गिरावट देखने को मिली है. बीते दिनों आई एक रिपोर्ट में तेल सस्ता होने के बाद अब एक्सपर्ट भी मानते नजर आए थे कि मौसम इकोनॉमी के लिए खलनायक बनता जा रहा है.
इंफोमेरिक्स रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट डॉ. मनोरंजन शर्मा ने कहा था कि आज देश में महंगाई का सबसे बड़ा जोखिम तेल नहीं, बल्कि मानसून है. कमजोर मानसून अब भारत के लिए कच्चे तेल की तुलना में महंगाई का बड़ा खतरा पैदा कर रहा है, क्योंकि देश में महंगाई की कैलकुलेशन में Fuel Price से कहीं ज्यादा खाद्य पदार्थों का रोल रहता है और भारत की करीब आधी एग्रीकल्चर लैंड बारिश पर निर्भर है, इसमें अनियमितता से अनाज, दालों, सब्जियों, फलों और तिलहन के प्रोडक्शन में कमी आ सकती है, जिससे महंगाई दर में तेज इजाफा हो सकता है और घरेलू बजट गड़बड़ा सकता है.