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'ये एकतरफा और भेदभावपूर्ण नियम ...', BRICS देशों ने क्यों किया 'कार्बन टैक्स' का विरोध?

ब्रिक्स देशों ने कार्बन टैक्स और ग्लोबल ट्रेड से जुड़े अहम मुद्दों पर अपना रुख साफ किया है. समूह ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे एकतरफा और भेदभावपूर्ण कदमों का विरोध करते हुए कहा कि इनसे विकासशील देशों पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर स्टील, सीमेंट, फर्टिलाइजर और एल्युमिनियम जैसे सेक्टरों पर पड़ सकता है.

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ब्रिक्स देशों ने कार्बन टैक्स का​ विरोध करते हुए इसे विकासशील देशों के लिए भेदभावपूर्ण और एकतरफा बताया है. (Photo: PTI)
ब्रिक्स देशों ने कार्बन टैक्स का​ विरोध करते हुए इसे विकासशील देशों के लिए भेदभावपूर्ण और एकतरफा बताया है. (Photo: PTI)

ब्रिक्स देशों ने शनिवार को कहा कि वे 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) जैसे एकतरफा, दंडात्मक और भेदभावपूर्ण कदमों के खिलाफ हैं. समूह का कहना है कि ऐसे फैसलों से जलवायु परिवर्तन से निपटने की कोशिशों को नुकसान पहुंच सकता है, खासकर विकासशील देशों के लिए. इसका असर आयरन और स्टील प्रोडक्ट, सीमेंट, फर्टिलाइजर और एल्युमिनियम जैसे सामानों के निर्यात पर पड़ सकता है, क्योंकि इन सेक्टर्स में कार्बन उत्सर्जन ज्यादा होता है.

क्या है CBAM और क्यों अहम है?

कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म एक तरह का टैक्स सिस्टम है, जो उन सामानों पर लगाया जाता है जिनके उत्पादन में कार्बन उत्सर्जन अधिक होता है. इस मैकेनिज्म के तहत किसी सामान को बनाने में जितना कार्बन उत्सर्जन हुआ है, उसके आधार पर दूसरे देश में आयात के समय अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है. यूरोपीय संघ (EU) और ब्रिटेन (UK) पहले ही इस तरह के कार्बन टैक्स को लागू करने की अपनी योजनाएं बता चुके हैं. ऐसे में BRICS देशों का यह रुख भारत समेत उन देशों के लिए अहम है, जो इन बाजारों में बड़े पैमाने पर सामान निर्यात करते हैं.

कार्बन टैक्स पर BRICS का स्टैंड

नई दिल्ली डिक्लेरेशन में BRICS नेताओं ने कहा कि वे CBAM जैसे ऐसे कदमों का विरोध करते हैं, जो एकतरफा, दंडात्मक, भेदभावपूर्ण या संरक्षणवादी हैं और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं हैं. नेताओं ने कहा कि उन्हें चिंता है कि इस तरह के कदम देशों, खासकर विकासशील देशों की जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने की क्षमता को कमजोर कर सकते हैं. इससे उन्हें अपनी अनुकूलन क्षमता बढ़ाने और भविष्य के जोखिमों से निपटने में भी मुश्किल हो सकती है.

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IPR और AI पर भी बढ़ेगा सहयोग

BRICS देशों ने बौद्धिक संपदा अधिकारों (Intellectual Property Rights) के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई है. इसमें पेटेंट की प्रक्रिया, पारंपरिक ज्ञान, भौगोलिक संकेतक (Geographical Indications), बौद्धिक संपदा को कारोबार में इस्तेमाल करने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े मामलों पर सहयोग शामिल है. डिक्लेरेशन में कहा गया कि डिजिटल दौर में बौद्धिक संपदा अधिकारों का सम्मान जरूरी है. AI की ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली सामग्री और उसके मालिकों के अधिकारों पर भी ध्यान देने की जरूरत है. साथ ही विकासशील देशों की जरूरतों और प्राथमिकताओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए.

AI के बढ़ते इस्तेमाल से जुड़े जोखिम

BRICS नेताओं ने AI के बढ़ते इस्तेमाल से जुड़े कुछ जोखिमों पर भी चिंता जताई. उनका कहना है कि AI के जरिए किसी देश या समुदाय के ज्ञान, विरासत और सांस्कृतिक मूल्यों का गलत इस्तेमाल या गलत तरीके से पेश किए जाने का खतरा है. नेताओं ने यह भी माना कि मौजूदा डेटा सेट और AI मॉडल में कई जगहों पर अलग-अलग देशों और संस्कृतियों की पर्याप्त जानकारी मौजूद नहीं है. इससे AI के नतीजों में भी असंतुलन पैदा हो सकता है.

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ग्लोबल वैल्यू चेन की मजबूती पर जोर

BRICS देशों ने ग्लोबल वैल्यू चेन यानी GVCs को मजबूत बनाने पर भी जोर दिया. इसका मतलब है कि किसी सामान के उत्पादन से लेकर उसकी सप्लाई और बिक्री तक अलग-अलग देशों में होने वाली पूरी प्रक्रिया को ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद बनाया जाए. इसके लिए BRICS देशों के बीच तकनीकी सहयोग, व्यापार को आसान बनाने, जरूरी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और औद्योगिक क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया गया है. इसके अलावा देशों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने, बौद्धिक संपदा की सुरक्षा और नई तकनीक तक सुरक्षित और किफायती पहुंच सुनिश्चित करने की बात भी कही गई है.अBRICS देशों ने आपसी व्यापार बढ़ाने के लिए भी नई नीतियों और तरीकों की संभावनाएं तलाशने पर सहमति जताई है.

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SEZs को सहयोग का जरिया बनाएंगे

घोषणा में स्पेशल इकोनॉमिक जोन यानी SEZs को भी व्यापार, निवेश, औद्योगिक सहयोग और नई तकनीक के लिए अहम माध्यम बताया गया है. BRICS देशों का कहना है कि SEZs में कारोबार के लिए बेहतर माहौल, अच्छी सुविधाएं और आसान नियम होने चाहिए. इससे कंपनियों को कारोबार बढ़ाने और दूसरे देशों के साथ जुड़ने में मदद मिल सकती है. साथ ही GVCs पर ब्रिक्स की साझा समझ के तहत तय वर्कप्लान को लागू करने औरब्रिक्स GVC कार्य योजना 2026-2030 को आगे बढ़ाने का समर्थन किया गया है.

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