कार्बन डाइऑक्साइड
कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon Dioxide, CO2) एक अम्लीय रंगहीन गैस है जो एक एक रासायनिक यौगिक (Chemical Compound) है. इसका घनत्व शुष्क हवा की तुलना में लगभग 53% अधिक है. कार्बन डाइऑक्साइड अणुओं में एक कार्बन परमाणु होता है जो दो ऑक्सीजन परमाणु से बंधित होता है (Carbon dioxide molecules). यह प्राकृतिक रूप से पृथ्वी के वायुमंडल में ट्रेस गैस के रूप में होता है (Trace Gas).
सांद्रता (Concentration) मात्रा के हिसाब से अभी लगभग 0.04% (412 PPM) है, जो 280 पीपीएम के औद्योगिक स्तरों से बढ़ी है और प्राकृतिक स्रोतों में ज्वालामुखी, जंगल की आग, गर्म झरने, गीजर शामिल हैं. यह पानी और एसिड में घुलने से कार्बोनेट चट्टानों से मुक्त होता है. क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड पानी में घुलनशील है, यह प्राकृतिक रूप से सभी तरह के पानी में होता है. साथ ही, यह पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के भंडार में मौजूद है (Rising of ppm).
कार्बन साइकल में उपलब्ध कार्बन स्रोत वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड पृथ्वी पर जीवन के लिए स्रोत है. पौधे, शैवाल और सायनोबैक्टीरिया फोटोसाइंथेसिस द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड और पानी से ऊर्जा का उपयोग करते हैं, जो अपशिष्ट उत्पाद के रूप में ऑक्सीजन का उत्पादन करता है. इस प्रोसेस में ऑक्सीजन की खपत होती है और सभी एरोबिक जीवों द्वारा CO2 को अपशिष्ट के रूप में छोड़ा जाता है (Carbon Dioxide in Atmosphere)
कार्बन डाइऑक्साइड पृथ्वी के वायुमंडल में सबसे महत्वपूर्ण लंबे समय तक रहने वाली ग्रीनहाउस गैस (Greenhouse Gas) है. औद्योगिक क्रांति के बाद से, मानवजनित उत्सर्जन ने वातावरण में इसकी एकाग्रता में तेजी से वृद्धि की है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग हो रही है (Global Warming). कार्बन डाइऑक्साइड भी समुद्र के अम्लीकरण का कारण बनता है क्योंकि यह कार्बोनिक एसिड (Carbonic Acid) बनाने के लिए पानी में घुल जाता है.
11 साल से हम लोग ज्यादा गर्मी झेल रहे हैं. बारिश के मौसम में गर्मी. सर्दी के वेदर में गर्मी. 2015 से 2025 तक पृथ्वी के लिए सबसे गर्म साल रहे हैं. 2025 तीसरा सबसे गर्म साल था. समंदर का तापमान हो या कार्बन डाइऑक्साइड का लेवल, सब रिकॉर्ड तोड़ रहा है. इससे धरती की एनर्जी का बैलेंस बिगड़ गया है.
ईरान युद्ध के पहले 14 दिनों (28 फरवरी से 14 मार्च 2026) में 56 लाख टन CO2 और ग्रीनहाउस गैसें निकलीं, जो आइसलैंड के पूरे साल के उत्सर्जन से ज्यादा हैं. इमारतों के गिरने, तेल सुविधाओं पर हमलों और ईंधन खपत से ज्यादा प्रदूषण हुआ. क्लाइमेट एंड कम्युनिटी इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध जलवायु पर भारी बोझ डाल रहा है.
जंग जलवायु परिवर्तन को तेज कर रहे हैं. वन अर्थ जर्नल की स्टडी के अनुसार, इजरायल-गाजा संघर्ष से 3.3 करोड़ मीट्रिक टन CO₂e उत्सर्जन हुआ, जो जॉर्डन के पूरे साल के उत्सर्जन या 76 लाख कारों के सालाना धुएं या 3.31 करोड़ एकड़ जंगलों द्वारा एक साल में सोखे जाने वाले कार्बन के बराबर है. सैन्य गतिविधियां, बमबारी और पुनर्निर्माण इसका मुख्य कारण हैं.
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने एक ऐसा डरावना नक्शा पेश किया है, जिसमें पूरी दुनिया पर छाए हुए कार्बन डाईऑक्साइड के बादल दिख रहे हैं. इसमें भारत भी है. यह नक्शा खास कंप्यूटर और मॉडल्स के जरिए बनाया गया है. इसमें दिख रहा है कि कैसे कार्बन डाईऑक्साइड हमारे वायुमंडल में घुल रहा है.
Iceland में एक साइंटिफिक स्टार्टअप कंपनी है, जो कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) को जमा करके, उसे पत्थर में बदल रही है. यानी जो काम प्रकृति हजारों-लाखों सालों में करती है, वो काम ये कंपनी कुछ ही दिनों में कर दे रही है. इस स्टार्टअप कंपनी का नाम है कार्बफिक्स (Carbfix).
एयरक्राफ्ट इंजन बनाने वाली दुनिया की दिग्गज कंपनी रोल्स-रॉयस ने पहला ऐसा इंजन बनाया है. जो हाइड्रोजन फ्यूल से चलेगा. उसका सफल परीक्षण भी कर लिया गया है. यानी कुछ ही सालों में हवाई जहाज की यात्रा प्रदूषण मुक्त होगी. पारंपरिक हवाई ईंधन के बजाय हाइड्रोजन फ्यूल से विमान उड़ेंगे. कार्बन उत्सर्जन कम होगा.
पिछले 52 साल में 69% जंगली जीव कम हो गए हैं. आबादी में लगातार गिरावट आ रही है. इसके पीछे तीन बड़ी वजहें हैं. जलवायु परिवर्तन, रहने की जगह का खोना और प्रदूषण. अब इन तीनों के पीछे तो इंसान ही है. यह डरावनी रिपोर्ट WWF की है. यानी इंसान अपने फायदे के लिए बहुत कुछ खत्म कर रहा है.
दुनिया के तीन देश ऐसे हैं, जो Carbon Negative क्लब में शामिल हो गए हैं. यानी यहां कार्बन उत्सर्जन कम करने की कोई चुनौती नहीं बची. यहां ग्रीनहाउस गैसों का प्रदूषण नहीं है. देश से कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए इन देशों ने जो कुछ भी किया उससे ये दुनिया के सामने मिसाल बन गए हैं. आज जानेंगे कि ये कैसे संभव हुआ.
वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर में 'शिवलिंग' की सही उम्र पता करने के लिए कार्बन डेटिंग की मांग की जा रही है. इस पर कोर्ट 29 सितंबर को सुनवाई करेगी. पर इससे पहले यह जानना जरूरी है कि क्या कार्बन डेटिंग से सही उम्र का पता चलेगा? क्या ये तकनीक सही है? या किसी और तकनीक का उपयोग हो सकता है?
50 वर्षों से हमारे सागर एक्स्ट्रा मेहनत कर रहे हैं. धरती पर निकलने वाले कार्बन डाईऑक्साइड का 40% हिस्सा सोख रहे हैं. साथ ही अपनी क्षमता से 90% से ज्यादा गर्मी सोख रहे हैं. लेकिन सारे सागर ये काम नहीं कर रहे हैं. कुछ सागर बाकियों से ज्यादा गर्मी सोख रहे हैं. यह चिंताजनक बात है. वैज्ञानिक इससे परेशान हैं.
दुनिया ग्लोबल वार्मिंग को लेकर चिंतित है, कार्बन कम करने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं. लेकिन दुनिया के सबसे बड़े वर्षावन की हालत खराब है. अमेजन रेनफॉरेस्ट में कटाई अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है.
जलवायु परिवर्तन की वजह से पकृति में जो भी बदलाव हो रहे हैं, वे धीरे-धीरे हम सबके सामने आ रहे हैं. हाल ही में एक शोध किया गया जिसमें पता चला है कि ऑस्ट्रेलिया के वर्षावनों (rainforests) के उष्णकटिबंधीय पेड़ (Tropical trees), 1980 के दशक की तुलना में दोगुनी तेजी से खत्म हो रहे हैं.
वातावरण और महासागर गर्म हो रहे हैं. बर्फ पिघल रही है. समुद्र का स्तर बढ़ रहा है. गर्म हवाएं तेज़ हो रही हैं. अब ज्यादा ठंड नहीं रहती. ये महज कुछ बदलाव हैं. इन्हें गंभीरता से लेना जरूरी है, क्योंकि ये हमें विनाश की तरफ ले जा रहे हैं.