दिल्ली में भड़की छात्र आंदोलन की चिंगारी ने देश का राजनीतिक माहौल गर्मा गया है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन को प्रधानमंत्री के दरवाजे तक पहुंचा दिया. संसद के मॉनसून सत्र की तरह ही बिहार में विधानसभा की भी मानसून सत्र चल रहा है और बांकीपुर उपचुनाव की तपिश गर्म है, लेकिन आरजेडी के सबसे बड़े चेहरे और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव कहीं नजर नहीं आ रहे?
बिहार की राजनीति में जब भी कोई बड़ा पड़ाव आता है, तो निगाहें अपने आप तेजस्वी यादव पर टिक जाती हैं. इस समय एक तरफ बिहार विधानसभा का महत्वपूर्ण सत्र चल रहा है, तो दूसरी तरफ पटना की हाई-प्रोफाइल सीट बांकीपुर में उपचुनाव का सियासी समर पूरी गर्माहट के साथ जारी है. इन सबके बीच तेजस्वी यादव की गैरमौजूदगी ने राजनीतिक बहस छेड़ दी है.
तेजस्वी यादव ऐसे समय विदेश गए हैं, जब विपक्ष के पास बीजेपी सरकार को घेरने के लिए कई मुद्दे मौजूद हैं और बिहार में सियासी गतिविधियां तेज हैं. छात्र सड़क पर आंदोलन कर रहे हैं, जिससे सियासी माहौल गर्म है. ऐसे में तेजस्वी की गैर-मौजूदगी पर सवाल खड़े होने लगे हैं.
आरजेडी के सबसे बड़े चेहरे तेजस्वी यादव कहां है?
बिहार का मॉनसून सत्र सोमवार से शुरू हुआ और बुधवार को तीसरा दिन है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव विदेश में होने चलते अनुपस्थित है. जुलाई के शुरू में विदेश दौरे पर गए तेजस्वी के अब तक लौटने की कोई सूचना नहीं है. तेजस्वी यादव के फेसबुक और एक्स पर 6 दिनों से कोई पोस्ट नहीं किया गया है. संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज को लेकर उनकी कोई प्रतिक्रिया अब तक सामने नहीं आई है.
बिहार विधानसभा के पांच दिन के सत्र का तीसरा दिन चल रहा है और शुक्रवार को यह खत्म भी हो जाएगा. तेजस्वी यादव की पार्टी के नेता तक उनके विदेश से लौटने की तारीख नहीं बता पा रहे हैं. तेजस्वी अगर शुक्रवार तक देश नहीं लौटे तो विधानसभा का सत्र समाप्त हो जाएगा. तेजस्वी यादव कहां गए हैं, कोई नहीं बता पा रहा है, लेकिन चर्चा है कि वो इस बार परिवार के साथ गर्मी छुट्टी पर यूरोप घूमने गए हैं.
तेजस्वी ने पार्टी के स्थापना दिवस कार्यक्रम को 5 जुलाई के बदले चार दिन पहले 1 जुलाई को ही मना लिया था. बिहार विधानसभा के लिए नवंबर 2025 में हुए आम चुनाव के बाद नवगठित विधानसभा के सत्र में भी तेजस्वी पूरे सत्र के दौरान नहीं रहे थे. राज्यपाल के अभिभाषण के दिन भी उनके नहीं आने पर सत्ता पक्ष ने गंभीर सवाल उठाया था तब भी तेजस्वी के विदेश दौरे पर जाने की चर्चा हुई थी और अब फिर से मॉनसून सत्र के बीच गैर-हाजिर हैं.
तेजस्वी यादव की गैरमौजूदगी पर उठे सवाल
बिहार विधानसभा सत्र के दौरान जनता से जुड़े कई जलंत मुद्दों जैसे राज्य की कानून व्यवस्था, शिक्षा, कृषि और विकास योजनाओं पर विपक्ष की ओर से सरकार को घेरने की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन सदन में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की खाली कुर्सी ने सारी उम्मीदवारों पर पानी फेर दिया है.
संसद के मानसून सत्र के दौरान दिल्ली में विपक्षी दलों के प्रदर्शन में राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे नेता सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ राजनीतिक संदेश दे रहे हैं। इसके विपरीत, बिहार में विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन रही है. सत्तापक्ष ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं.
एनडीए नेताओं का कहना है कि जब बिहार की जनता के हक के लिए सदन में आवाज उठाने का वक्त आता है, तो तेजस्वी यादव अचानक बिहार से बाहर या विदेश दौरों पर चले जाते हैं, उनका आरोप है कि नेता प्रतिपक्ष का काम राज्य में रहकर संघर्ष करना है, न कि अहम मौकों पर गायब रहना. जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने कहा कि बिहार के लोकतांत्रिक इतिहास में तेजस्वी के जैसा गैर-जिम्मेदार नेता प्रतिपक्ष कभी नहीं हुआ.
कुशवाहा ने कहा कि जब विधानसभा का सत्र चल रहा है, तब नेता प्रतिपक्ष विदेश में छुट्टियां मना रहे हैं. यह रवैया जनता के प्रति तेजस्वी की गैर-जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को दिखाता है. इसके अलावा बीजेपी ने भी सवाल उठाए हैं, जिसे लेकर आरजेडी को जवाब देते नहीं बन पा रहा है.
बांकीपुर उपचुनाव के बीच तेजस्वी यादव गैर-हाजिर
बांकीपुर विधानसभा सीट के उप-चुनाव में राजद कैंडिडेट रेखा गुप्ता को भी तेजस्वी यादव के देश लौटने और प्रचार में उतरने का इंतजार है, जिन्हें बीजेपी के नीरज सिन्हा और जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर के साथ चुनौती मिल रही है. यह चुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं माना जा रहा, बल्कि बिहार की बदलती राजनीति का संकेतक भी है.
तेजस्वी यादव की गैर-मौजूदगी से आरजेडी के चुनाव प्रचार को रफ्तार नहीं मिल पा रही. तेजस्वी यादव अगर तीन दिन ही प्रचार कर पाते हैं, तो राजद के लिए चुनावी माहौल बनाने का समय सीमित रह जाएगा. ऐसे चुनावों में शीर्ष नेता की लगातार मौजूदगी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाती है और मतदाताओं तक पार्टी का संदेश पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इस परिस्थिति का राजनीतिक लाभ किसे मिल सकता है?
विश्लेषकों की नज़र में इसका सबसे बड़ा लाभ प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी को मिल सकता है. आरजेडी प्रत्याशी रेखा गुप्ता का प्रचार अपेक्षाकृत कमजोर रहता है, तो विपक्षी मतों और सरकार-विरोधी वोटों के एक हिस्से को आकर्षित करने का अवसर प्रशांत किशोर को मिल सकता है. हालांकि चुनाव परिणाम अनेक स्थानीय और राजनीतिक कारकों पर निर्भर करेगा, इसलिए यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि केवल इसी कारण परिणाम तय होंगे.