नई दिल्ली का चिन्मय मिशन ऑडिटोरियम बीते शनिवार भारतीय संस्कृति और नृत्य विधा की अद्भुत परंपरा का साक्षी बना. पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भरतनाट्यम गुरु गीता चंद्रन की शिष्या विधि बंसल ने इस दौरान 11 वर्षों की कठिन साधना के बाद भरतनाट्यम अरंगेत्रम प्रस्तुति दी. यह प्रस्तुति विधि की 11 वर्षों की कठोर साधना और गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति समर्पण का महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई.
कार्यक्रम में कला जगत की कई प्रतिष्ठित हस्तियां, शिक्षाविदों के साथ-साथ बड़ी संख्या में रसिक दर्शक मौजूद रहे. इस अवसर पर जीवंत संगीत मंडली ने प्रस्तुति को विशेष गरिमा दी. गुरु गीता चंद्रन ने खुद नट्टुवांगम संभाला, जबकि श्रीराग नायर ने गायन, विग्नेश जयरामन ने मृदंगम, वरुण राजशेखरन ने घटम और वीएसके. अन्नादोरई ने वायलिन पर संगत की. सजीव संगीत ने नृत्य प्रस्तुति को और अधिक प्रभावशाली बना दिया.

भरतनाट्यम की पारंपरिक मार्गम शैली का अनुसरण करते हुए विधि बंसल ने पुष्पांजलि, अलारिप्पु, रागमालिका में जतिस्वरम्, नट्टैकुरिंजी राग का वर्णम, सूरदास रचित पद 'सुंदर श्याम', राग वृंदावनी और अंत में मंगलम् प्रस्तुत किया. उनकी सधी हुई तकनीक, मंच पर आत्मविश्वासपूर्ण उपस्थिति और भावपूर्ण अभिनय (अभिनय-अभिनया) ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. प्रस्तुति के अंत में उन्हें लंबे समय तक तालियों और स्टैंडिंग ओवेशन से सम्मानित किया गया.
इस अवसर पर गुरु गीता चंद्रन ने कहा कि 'अरंगेत्रम किसी नर्तकी की आजीवन सीखने और कलात्मक साधना की शुरुआत है. विधि ने वर्षों की साधना के दौरान अनुशासन, विनम्रता और समर्पण का अद्भुत परिचय दिया है. मुझे विश्वास है कि वह भरतनाट्यम की परंपराओं और मूल्यों को आगे भी पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ाएंगी.'
विधि बंसल ने बचपन से ही गुरु गीता चंद्रन के मार्गदर्शन में भरतनाट्यम का प्रशिक्षण लिया है. यह अरंगेत्रम उनकी नृत्य शिक्षा के एक महत्वपूर्ण चरण की पूर्णता के साथ आजीवन कलात्मक साधना की नई शुरुआत का प्रतीक बना. कार्यक्रम ने एक बार फिर गुरु गीता चंद्रन के भारतीय शास्त्रीय नृत्य के प्रति दीर्घकालिक योगदान और नाट्य वृक्षा (NATYA VRIKSHA) द्वारा गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से नई पीढ़ी के भरतनाट्यम कलाकारों को तैयार करने की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया.