तापमान इतना बढ़ेगा कि 'जल' उठेगी दुनिया... UNEP की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

जलवायु संकट को लेकर संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट ने दुनिया के सामने बड़ी चेतावनी रखी है. 1.5 डिग्री की सीमा अब पार होना तय माना जा रहा है. इसे ध्यान में रखते हुए तापमान को और बढ़ने से रोकने की कोशिश अभी भी जरूरी है.

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सिर्फ दिल्ली ही नहीं पूरी दुनिया बढ़ते हुए तापमान और प्रदूषण से जूझ रही है. (File Photo: PTI) सिर्फ दिल्ली ही नहीं पूरी दुनिया बढ़ते हुए तापमान और प्रदूषण से जूझ रही है. (File Photo: PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 02 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 3:58 PM IST

दुनिया अब उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रोकना संभव नहीं दिख रहा. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले समय में धरती का औसत तापमान लगातार इस लीमिट से ऊपर रह सकता है. अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि तापमान कितनी दूर तक बढ़ेगा और उसे दोबारा नीचे लाने में दुनिया कितनी सफल होगी.

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रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे अच्छे हालात में भी तापमान बढ़कर करीब 1.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है और उसके बाद धीरे-धीरे नीचे आने की उम्मीद है. कई दूसरे अनुमान बताते हैं कि तापमान 2 डिग्री से भी ऊपर जा सकता है. 

1.5 डिग्री क्यों है अहम?

2015 के पेरिस समझौते में दुनिया ने कोशिश की थी कि औद्योगिक दौर से पहले के मुकाबले तापमान बढ़ोतरी को 2 डिग्री से काफी नीचे रखा जाए और इसे 1.5 डिग्री तक सीमित करने की कोशिश की जाए. यह 1.5 डिग्री कोई ऐसी दीवार नहीं है, जिसे पार करते ही अचानक कोई नई आपदा शुरू हो जाएगी. लेकिन तापमान जितना बढ़ेगा, लू, बाढ़, सूखा और दूसरे मौसम से जुड़े खतरे उतने ही ज्यादा गंभीर हो सकते हैं.

यह भी पढ़ें: नेपाल में ऐसी तबाही पहले नहीं देखी! ग्लेशियर और पहाड़ टूटा, कैसे आया ये जलप्रलय?

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2024 में दुनिया का औसत तापमान पहली बार एक साल के स्तर पर 1.5 डिग्री से ऊपर गया था. उस साल तापमान करीब 1.55 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा. हालांकि वैज्ञानिक लंबे समय के तापमान के रुझान को देखते हैं, सिर्फ एक साल के आंकड़े को नहीं.

अब क्या करना होगा?

UNEP के मुताबिक, तापमान को फिर 1.5 डिग्री के आसपास लाने के लिए कार्बन डाइऑक्साइड हटाने वाली तकनीकों की जरूरत पड़ेगी. लेकिन अभी इन तकनीकों का असर सीमित है. इसलिए सिर्फ तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय ग्रीनहाउस गैसों के इमिशन में तेजी से लगातार कटौती करनी होगी.

जलवायु विशेषज्ञ अजय माथुर ने नेपाल तबाही को भी बढ़ते तापमान से जुड़े जोखिमों का उदाहरण बताया. उनके मुताबिक, तापमान बढ़ने की कीमत कई बार लोगों की जान और पूरी बस्तियों के उजड़ने के रूप में सामने आती है. रिपोर्ट साफ करती है कि 1.5 डिग्री की सीमा टूटने के बाद भी कोशिश खत्म नहीं होनी चाहिए. हर अतिरिक्त डिग्री के साथ खतरे बढ़ते हैं, इसलिए अब कोशिश  तापमान रोकने के साथ ही जितना हो सके उतना कम करने की है.

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