एक शरीर, दो सिर... केप कॉड में मिला बेहद दुर्लभ दो सिर वाला कछुआ

अमेरिका के केप कॉड में डायमंडबैक टेरापिन का एक ऐसा नन्हा बच्चा मिला है, जिसके शरीर पर दो सिर हैं. यह बेहद दुर्लभ विकास से जुड़ी स्थिति है. खास बात है कि इलाके में पांच साल के अंदर ऐसा तीसरा कछुआ मिला है.

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ये है दो सिर वाला कछुआ जो केप कॉड में मिला है. (Photo: Cape Wildlife Center) ये है दो सिर वाला कछुआ जो केप कॉड में मिला है. (Photo: Cape Wildlife Center)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 07 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 5:33 PM IST

अमेरिका के मैसाचुसेट्स के केप कॉड में एक बेहद दुर्लभ दो सिर वाला कछुए का बच्चा मिला है. यह डायमंडबैक टेरापिन प्रजाति का है. इसे वेलफ्लीट इलाके में एक नेस्टिंग साइट पर पाया गया. इस छोटे कछुए के शरीर पर दो अलग-अलग सिर हैं. ऐसी स्थिति को बाइसिफली कहा जाता है.

इस कछुए का वजन करीब 5.1 ग्राम है. इसे अब केप वाइल्डलाइफ सेंटर में निगरानी में रखा गया है. एक्सपर्ट्स देख रहे हैं कि यह ठीक से खा पा रहा है या नहीं और दोनों सिर शरीर के साथ कैसे काम कर रहे हैं. खास बात यह है कि पिछले पांच साल में केप कॉड में ऐसा तीसरा टेरापिन मिला है.

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बाइसिफली एक बहुत दुर्लभ स्थिति है. यह कछुए के बच्चे के अंडे के अंदर विकसित होने के दौरान होती है. शुरुआत में जब शरीर बन रहा होता है, तब शरीर के दो हिस्से पूरी तरह अलग नहीं हो पाते. इसी वजह से एक शरीर पर दो सिर बन जाते हैं. ऐसे जानवरों में दोनों सिर अलग-अलग काम कर सकते हैं, लेकिन शरीर एक ही होता है. शरीर के अंदर के कुछ अंग भी साझा हो सकते हैं. यह इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे का विकास किस तरह हुआ है.

दो सिर होने से क्या परेशानी होती है?

दो सिर होने की वजह से कछुए को चलने और खाने में परेशानी हो सकती है. दोनों सिरों को एक ही शरीर के साथ तालमेल बनाना पड़ता है. अगर शरीर के अंदर के जरूरी अंग भी साझा हैं, तो इससे उसकी सेहत पर असर पड़ सकता है. हालांकि इस कछुए के लंबे समय तक जीवित रहने को लेकर अभी कुछ पक्का नहीं कहा जा सकता. एक्सपर्ट्स लगातार इसकी निगरानी कर रहे हैं. वे इसके खाने, चलने और व्यवहार को देख रहे हैं.

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क्या है डायमंडबैक टेरापिन?

डायमंडबैक टेरापिन अमेरिका के समुद्री किनारे वाले इलाकों में पाया जाने वाला कछुआ है. यह खारे पानी वाले दलदली इलाकों और समुद्र के पास के दूसरे क्षेत्रों में रहता है. इसके खोल पर हीरे जैसी आकृतियां होती हैं. इसी वजह से इसका नाम डायमंडबैक टेरापिन पड़ा है. मैसाचुसेट्स में इस कछुए को थ्रेटेंड यानी खतरे वाली प्रजाति माना जाता है. इसके लिए रहने की जगह कम होना, सड़क पर वाहनों की चपेट में आना, प्रदूषण और मछली पकड़ने के जाल जैसे खतरे हैं.

तापमान से भी जुड़ी है खास बात

डायमंडबैक टेरापिन के बच्चों के विकास में तापमान की भी बड़ी भूमिका होती है. अंडे के अंदर का तापमान यह तय करने में मदद करता है कि बच्चा नर होगा या मादा. कम तापमान पर नर और ज्यादा तापमान पर मादा बनने की संभावना बढ़ जाती है.

इस दुर्लभ दो सिर वाले कछुए पर फिलहाल एक्सपर्ट्स की नजर बनी हुई है. ऐसे मामले वैज्ञानिकों के लिए खास होते हैं, क्योंकि इनसे उन्हें यह समझने में मदद मिलती है कि कछुए के बच्चे के शरीर का विकास कैसे होता है और कभी-कभी इसमें ऐसी असामान्य स्थिति क्यों बन जाती है.

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