सुपर अल-नीनो के असर से आने वाले महीनों में अफ्रीका के सहेल इलाके में बहुत ज्यादा गर्मी पड़ सकती है. एक नई रिसर्च के मुताबिक सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच नाइजीरिया, सूडान, नाइजर और चाड में सामान्य साल के मुकाबले करीब 66,800 ज्यादा मौतें हो सकती हैं. इनमें अकेले नाइजीरिया में करीब 31,400 अतिरिक्त मौतों का अनुमान है.
दुनिया के बाकी हिस्सों में भी सुपर अल-नीनो से गर्मी बढ़ने का खतरा है. रिसर्च के मुताबिक जून 2026 से फरवरी 2027 के बीच दुनिया में करीब 4.51 लाख अतिरिक्त मौतें गर्मी की वजह से हो सकती हैं. गरीब देशों में इसका असर ज्यादा होने का खतरा है, क्योंकि वहां बिजली और गर्मी से बचने के साधन कम हैं.
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इन 4 देशों पर सबसे ज्यादा खतरा
सहेल अफ्रीका का एक बड़ा इलाका है, जो सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में फैला है. इसमें कई देश आते हैं. इस बार नाइजीरिया, सूडान, नाइजर और चाड में गर्मी का असर सबसे ज्यादा होने का अनुमान है. रिसर्च के मुताबिक नाइजीरिया में करीब 31,400, सूडान में 17,500, नाइजर में 10,000 और चाड में 8,000 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं. यानी इन चार देशों में कुल करीब 66,800 अतिरिक्त मौतों का अनुमान है.
इन देशों में बहुत से लोग खेती और दूसरे कामों के लिए बाहर रहते हैं. तेज गर्मी में लंबे समय तक बाहर रहने से शरीर पर बुरा असर पड़ सकता है. इससे पानी की कमी और हीटस्ट्रोक जैसी समस्या हो सकती है.
बिजली की कमी भी बड़ी समस्या
गर्मी से बचने के लिए पंखा, कूलर या एयर कंडीशनर चलाने के लिए बिजली जरूरी है. लेकिन इन देशों में बड़ी आबादी के पास बिजली की सुविधा नहीं है. नाइजर में 2024 में सिर्फ करीब 21 फीसदी लोगों के पास बिजली थी, जबकि चाड में यह आंकड़ा करीब 13 फीसदी था. ऐसे में बहुत से लोगों के लिए घर के अंदर भी गर्मी से बचना आसान नहीं होगा. नाइजीरिया में भी बिजली की समस्या बनी रहती है. वहीं सूडान में युद्ध के कारण बिजली और दूसरी जरूरी सुविधाओं को नुकसान पहुंचा है. गरीबी की वजह से भी लोग कूलिंग के साधन नहीं खरीद पाते.
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कैसे लगाया गया मौतों का अनुमान?
रिसर्चर्स ने ECMWF के मौसम के पूर्वानुमान का इस्तेमाल किया. इसमें अगले छह महीनों में तापमान सामान्य से कितना ज्यादा रह सकता है, इसका अनुमान लिया गया. इसके बाद दुनिया के 24,378 इलाकों के तापमान और मौतों से जुड़े पुराने आंकड़ों को देखा गया. इसके लिए 1996 से 2025 तक के आंकड़े इस्तेमाल किए गए. इन आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया गया कि सामान्य साल की तुलना में इस बार गर्मी से कितनी अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं.
बहुत ज्यादा गर्मी का असर बुजुर्गों, छोटे बच्चों और पहले से बीमार लोगों पर ज्यादा पड़ सकता है. इसके अलावा किसान और खुले में काम करने वाले लोग भी ज्यादा खतरे में रहते हैं. खासकर उन जगहों पर खतरा बढ़ जाता है, जहां लोगों के पास घर ठंडा रखने के साधन नहीं हैं. लगातार तेज गर्मी में काम करने से शरीर का तापमान बढ़ सकता है और हीटस्ट्रोक का खतरा हो सकता है.
समय रहते उठाने होंगे ये कदम
गर्मी से होने वाली मौतों को कम करने के लिए सरकारें पहले से तैयारी कर सकती हैं. लोगों को हीट वॉर्निंग देकर समय रहते सावधान किया जा सकता है. ज्यादा खतरे वाले इलाकों में कूलिंग सेंटर और पानी की व्यवस्था की जा सकती है. बाहर काम करने वालों के काम का समय भी बदला जा सकता है, ताकि वे दिन की सबसे तेज गर्मी से बच सकें.
अस्पतालों में भी पहले से अतिरिक्त स्टाफ, दवाएं और जरूरी सामान रखना जरूरी होगा. रिसर्चर्स का कहना है कि ये आंकड़े अनुमान हैं, लेकिन इनसे आने वाले खतरे का अंदाजा लगाया जा सकता है. समय रहते तैयारी की जाए तो तेज गर्मी से होने वाले नुकसान और मौतों को कम किया जा सकता है.
आजतक साइंस डेस्क