चांद की सतह पर 10 हजार से ज्यादा ऐसे फॉल्ट मिले हैं, जहां भूकंप आ सकते हैं. नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर कैमरा (LROC) की तस्वीरों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने यह जानकारी दी है. यह स्टडी द प्लैनेटरी साइंस जर्नल में प्रकाशित हुई है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, चांद का अंदरूनी हिस्सा धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है. इससे चांद का आकार छोटा हो रहा है. पिछले करीब 40 करोड़ साल में चांद की त्रिज्या लगभग 45 मीटर कम हुई है. इस खोज से चांद पर इंसानों को उतारने की तैयारी कर रहे नासा के आर्टेमिस मिशन के लिए सुरक्षित जगह चुनना और जरूरी हो गया है.
वैज्ञानिकों ने चांद की सतह पर लंबी और उभरी हुई संरचनाओं का अध्ययन किया. इन्हें लोबेट स्कार्प और मारे रिज कहा जाता है. ये संरचनाएं चांद के सिकुड़ने के कारण बनती हैं. जब चांद का आकार कम होता है, तो उसकी सतह पर दबाव पड़ता है. इससे फॉल्ट बनते हैं. इन फॉल्ट में हलचल होने पर चांद पर भूकंप आ सकते हैं.
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चांद पर कहां मिले इतने फॉल्ट?
वैज्ञानिकों ने नासा के LROC कैमरे से मिली तस्वीरों का विश्लेषण किया. इसमें चांद पर 8,900 से ज्यादा लोबेट स्कार्प और 2,000 से ज्यादा छोटी मारे रिज मिलीं. ये दोनों तरह की संरचनाएं चांद के सिकुड़ने के कारण सतह पर होने वाले बदलावों से जुड़ी हैं.
स्टडी के मुताबिक, पिछले करीब 40 करोड़ साल में चांद की त्रिज्या लगभग 45 मीटर कम हुई है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर चांद इसी रफ्तार से सिकुड़ता रहा, तो हर 10 लाख साल में उसकी त्रिज्या करीब 6 से 11 सेंटीमीटर कम हो सकती है. इसका मतलब है कि चांद के अंदर आज भी बदलाव हो रहे हैं.
चांद पर भूकंप क्यों आते हैं?
चंद्रमा का अंदरूनी हिस्सा धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है. ठंडा होने से उसका आकार सिकुड़ता है. इससे उसकी सतह पर दबाव पड़ता है. इस दबाव के कारण नए फॉल्ट बन सकते हैं या पहले से मौजूद फॉल्ट में हलचल हो सकती है. इसी हलचल से चांद पर भूकंप आते हैं. इन भूकंपों को मूनक्वेक कहा जाता है.
साल 2019 में वैज्ञानिक टॉम वॉटर्स और उनकी टीम ने भी चांद की सतह पर मौजूद फॉल्ट और भूकंप के बीच संबंध के सबूत दिए थे. अपोलो मिशन के दौरान चांद पर लगाए गए सीस्मोमीटर ने भूकंप दर्ज किए थे. इन भूकंपों के केंद्र फॉल्ट के काफी पास थे. इससे वैज्ञानिकों को पता चला कि चंद्रमा की सतह पर दिखने वाली ये संरचनाएं भूकंप से जुड़ी हो सकती हैं.
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धरती से कैसे अलग है चांद?
धरती की बाहरी सतह करीब 15 बड़ी प्लेटों में बंटी हुई है. धरती पर होने वाली लगभग 90 फीसदी टेक्टोनिक और भूकंपीय गतिविधियां इन प्लेटों की सीमाओं के पास होती हैं. लेकिन चांद की बाहरी सतह एक बड़ी प्लेट की तरह है. वहां धरती की तरह कई बड़ी प्लेटें नहीं हैं, जो लगातार एक-दूसरे से टकराती हों. इस वजह से चांद पर भूकंप आने की जगह का पता लगाना मुश्किल है. वहां पुराने फॉल्ट में हलचल हो सकती है या नए फॉल्ट बन सकते हैं. इस कारण चांद की अलग-अलग जगहों पर भूकंप आने का खतरा बना रहता है.
नासा के मून मिशन के लिए क्यों जरूरी है यह खोज?
नासा आर्टेमिस मिशन के जरिए इंसानों को फिर से चांद पर भेजने की तैयारी कर रहा है. ऐसे में वहां भूकंप के खतरे को समझना जरूरी है. साल 2024 की एक स्टडी में मिशन के लिए चुनी जाने वाली 13 संभावित जगहों के पास ऐसे इलाके मिले थे, जहां भूकंप आने की आशंका थी. भूकंप के कारण चांद की सतह पर मिट्टी और चट्टानें खिसक सकती हैं. इससे अंतरिक्ष यात्रियों और उनके उपकरणों को नुकसान पहुंच सकता है.
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हालांकि, इस खोज का मतलब यह नहीं है कि चांद पर इंसानों को उतारना संभव नहीं है. स्टडी में यह भी पाया गया कि चांद की जिन जगहों पर बाहरी पपड़ी ज्यादा मोटी है, वहां फॉल्ट कम मिले. ऐसी जगहों को भविष्य के मिशन के लिए बेहतर माना जा सकता है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक, चांद का अंदरूनी हिस्सा ठंडा होने और सिकुड़ने का सिलसिला अभी जारी है. ऐसे में पुराने फॉल्ट में हलचल हो सकती है और नए फॉल्ट भी बन सकते हैं. इसलिए चांद पर इंसानों को सुरक्षित उतारने के लिए इन जगहों का अध्ययन करना जरूरी है.
आजतक साइंस डेस्क