मेड इन इंडिया मॉनसून... अल-नीनो के बावजूद कैसे टिकी है बारिश

अल-नीनो के बावजूद भारत का मॉनसून 'मेड इन इंडिया' मौसमी सिस्टम से टिका हुआ है. जुलाई अंत की भारी बारिश ने जून की कमी को कुछ हद तक संभाला, लेकिन अगस्त 11.8% घाटे से शुरू हो रहा है.

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गुवाहाटी में भारी बारिश के बाद आई बाढ़ में अपना सामान सुरक्षित करते लोग. (Photo: PTI) गुवाहाटी में भारी बारिश के बाद आई बाढ़ में अपना सामान सुरक्षित करते लोग. (Photo: PTI)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 05 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 10:28 AM IST

भारत का मॉनसून इस साल एक बार फिर साबित कर रहा है कि वह सिर्फ वैश्विक मौसमी पैटर्नों पर निर्भर नहीं रहता. अल-नीनो जैसी निगेटिव परिस्थितियों के बावजूद देश का मॉनसून अपनी घरेलू मौसमी सिस्टमों के बल पर टिका हुआ है. एक्सपर्ट इसे मेड इन इंडिया मॉनसून कह रहे हैं. यह घटनाक्रम न सिर्फ वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि किसानों, नीति-निर्माताओं और आम नागरिकों के लिए भी चिंता का विषय बना हुआ है.

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साल 2026 का मॉनसून अब अपने निर्णायक फेज में पहुंच चुका है. जुलाई के अंत में हुई भारी बारिश ने देश को जून की विनाशकारी कमी से कुछ राहत जरूर दी, लेकिन कुल मिलाकर स्थिति अभी भी सामान्य से नीचे बनी हुई है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार अब तक कुल 424.9 मिलीमीटर बारिश हुई है, जबकि सामान्य औसत 481.9 मिमी होना चाहिए था. यानी देश 57 मिलीमीटर की कमी के साथ अगस्त में आ चुका है. 

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प्रतिशत के हिसाब से यह कमी 11.8 प्रतिशत बैठती है. जून में तो यह कमी 39 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जो पूरे मॉनसून के लिए खतरे की घंटी थी. जुलाई के अंतिम हिस्से में आई मूसलाधार बारिश ने स्थिति को कुछ हद तक संभाला, लेकिन घाटा अब भी बना हुआ है.

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जून की भारी गिरावट और जुलाई का अस्थाई बचाव

जून महीने में मॉनसून की शुरुआत ही धीमी रही. कई क्षेत्रों में बारिश सामान्य से काफी कम रही, जिससे कृषि संबंधी चिंताएं बढ़ गईं. खेतों में नमी की कमी, बुवाई में देरी और जलाशयों के जलस्तर में गिरावट जैसी समस्याएं सामने आईं. ऐसे में जुलाई के अंतिम सप्ताह में आई व्यापक बारिश ने अस्थाई राहत प्रदान की. 

इस बारिश ने कई हिस्सों में सूखे की स्थिति को कुछ हद तक सुधारा. नदियों-तालाबों को पानी दिलाया. लेकिन यह राहत केवल अल्पकालिक साबित हुई क्योंकि अगस्त की शुरुआत में भी कुल कमी 11.8 प्रतिशत बनी रही. इसका मतलब साफ है कि पिछले दो महीनों की औसत से कम बारिश का असर अभी भी बाकी है.

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मॉनसूनी बारिश का पूरा सेशन आमतौर पर जून से सितंबर तक चलता है. सामान्य परिस्थितियों में पूरे सीजन में 868.6 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए. अब तक 424.9 मिलीमीटर बारिश हो चुकी है, इसलिए शेष 57 दिनों में लगभग 443.7 मिलीमीटर बारिश की जरूरत है ताकि सत्र 100 प्रतिशत सामान्य स्तर पर पहुंच सके. यह लक्ष्य आसान नहीं है क्योंकि अगस्त और सितंबर दोनों महीनों को मिलकर यह काम करना होगा.

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अगस्त को क्यों करना होगा ओवरटाइम?

अगस्त सामान्यतः मॉनसून का सबसे महत्वपूर्ण महीना माना जाता है. इस महीने का सामान्य औसत लगभग 254.9 मिलीमीटर होता है. लेकिन इस साल की स्थिति अलग है. चूंकि हम 11.8 प्रतिशत की कमी के साथ अगस्त में प्रवेश कर चुके हैं, इसलिए सिर्फ सामान्य बारिश पर्याप्त नहीं होगी. अगर सितंबर में भी कमी रहती है तो अगस्त को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ेगी.

अगर सितंबर में 20 प्रतिशत कमी रहती है तो अगस्त को सामान्य का 121.4% यानी करीब 309.4 मिलीमीटर बारिश देनी होगी. अगर सितंबर की कमी 30% तक पहुंच जाती है तो अगस्त को 128% यानी 326.2 मिलीमीटर बारिश की जरूरत होगी. 

सबसे खराब स्थिति में अगर सितंबर 50 प्रतिशत कमी दर्ज करता है तो अगस्त को 141.1% यानी लगभग 359.7 मिलीमीटर बारिश करनी पड़ेगी. ये आंकड़े बताते हैं कि अगस्त को रिकॉर्ड तोड़ने वाला महीना बनना होगा.

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मेड इन इंडिया मौसमी सिस्टम कैसे काम कर रही हैं

अल-नीनो के बावजूद मॉनसून के टिके रहने का सबसे बड़ा कारण घरेलू मौसमी सिस्टम हैं. अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाले निम्न दबाव के क्षेत्र, पश्चिमी विक्षोभ और स्थानीय कन्वर्जेंस जोन जैसे कारण सक्रिय बने हुए हैं. ये सिस्टम वैश्विक प्रभावों को कुछ हद तक संतुलित कर रही हैं. 

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वैज्ञानिकों का मानना है कि भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक स्थिति और समुद्री तापमान के स्थानीय पैटर्न इस साल मॉनसून को सहारा दे रहे हैं. यही वजह है कि बड़े पैमाने पर अल-नीनो के निगेटिव इफेक्ट के बावजूद बारिश पूरी तरह से ठप नहीं हुई.

यह मेड इन इंडिया पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन और वैश्विक मौसमी उतार-चढ़ाव के बीच भी स्थानीय कारक निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. अगर ये सिस्टम अगस्त में भी सक्रिय रहीं तो स्थिति सुधरने की उम्मीद बनी रह सकती है. लेकिन अगर ये कमजोर पड़ गईं तो सितंबर में सुधार की गुंजाइश और कम हो जाएगी.

जुलाई की बारिश ने कुछ राहत दी लेकिन अगस्त की बारिश निर्णायक साबित होगी. जलाशयों का जलस्तर, भूजल रिचार्ज और पेयजल आपूर्ति भी इस पर निर्भर है. अगर अगस्त में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. बिजली उत्पादन, खासकर जलविद्युत परियोजनाओं पर भी दबाव बढ़ेगा.

अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी यह महत्वपूर्ण है. ग्रामीण मांग, खाद्य महंगाई और सरकारी राहत योजनाएं मॉनसूनी प्रदर्शन से जुड़ी होती हैं. इसलिए अगस्त का प्रदर्शन न सिर्फ मौसमी बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अहम है.

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आगे की राह और सतर्कता

मॉडल संकेत दे रहे हैं कि सितंबर में बारिश सामान्य से कम रह सकती है. ऐसे में अगस्त पर ही सारी जिम्मेदारी आ गई है. मौसम विभाग लगातार निगरानी कर रहा है और किसानों को सलाह जारी कर रहा है. लंबे समय में जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून के पैटर्न और अनिश्चित होते जा रहे हैं. 

इसलिए केवल एक महीने पर निर्भर रहना जोखिम भरा है. जल संरक्षण, सूखा प्रतिरोधी फसलें और बेहतर सिंचाई व्यवस्था जैसी लंबी तैयारियां आवश्यक हैं. कुल मिलाकर 2026 का मॉनसून अभी अधूरा है. अल-नीनो के बावजूद घरेलू प्रणालियों ने इसे बचाए रखा है, लेकिन अगस्त को रिकॉर्ड स्तर की बारिश देकर सत्र को सामान्य बनाना होगा.

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