दिल्ली में इस साल मॉनसून के दौरान खूब बारिश हुई, लेकिन इससे हवा लंबे समय तक साफ नहीं रह सकी. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट यानी सीएसई की नई स्टडी के मुताबिक, 1 जून से 31 अगस्त 2026 तक 92 दिनों में सिर्फ एक दिन दिल्ली की एयर क्वालिटी ‘गुड’ रही. इस दौरान सफदरजंग और पालम में दर्ज बारिश के आधार पर कुल 576.9 एमएम बारिश हुई. इसके बावजूद 53 दिन यानी 57.6 फीसदी दिनों में एयर क्वालिटी ‘मॉडरेट’ रही.
स्टडी के मुताबिक, बारिश के दौरान पीएम2.5 कम हुआ, लेकिन बारिश रुकते ही यह फिर बढ़ने लगा. बारिश के दौरान पीएम 2.5 का औसत स्तर 32.7 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर था. बारिश रुकने के 24 घंटे बाद यह 36.2 और 48 घंटे बाद 45.1 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पहुंच गया. यानी 48 घंटे में पीएम 2.5 का स्तर 37.9 फीसदी बढ़ गया.
यह भी पढ़ें: भेड़ नहीं, ऊंट के परिवार का है ये ऊन वाला जानवर, जानिए अल्पाका की खासियत
बारिश से कम हुआ प्रदूषण, लेकिन जल्दी लौट आया
सीएसई ने अप्रैल-मई और जून-अगस्त 2026 की एयर क्वालिटी की तुलना की. अप्रैल-मई में दिल्ली का औसत पीएम 2.5 स्तर 60.2 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर था. मॉनसून के दौरान यह घटकर 40.2 माइक्रोग्राम रह गया. यानी इसमें करीब 33.2 फीसदी की कमी आई.
सीएसई ने मॉनसून के दौरान बारिश की छह अलग-अलग घटनाओं को भी देखा. बारिश शुरू होने से पहले पीएम 2.5 का औसत स्तर 40.6 माइक्रोग्राम था. बारिश के दौरान यह घटकर 32.7 माइक्रोग्राम हो गया. यानी करीब 19.5 फीसदी की कमी आई. लेकिन बारिश बंद होने के बाद पीएम2.5 फिर बढ़ने लगा. 24 घंटे बाद यह 36.2 माइक्रोग्राम और 48 घंटे बाद 45.1 माइक्रोग्राम हो गया. यह बारिश शुरू होने से पहले के स्तर 40.6 माइक्रोग्राम से भी 11.1 फीसदी ज्यादा था.
92 दिनों में सिर्फ एक दिन ‘गुड’ एयर
मॉनसून के 92 दिनों में सिर्फ 9 जुलाई को दिल्ली की हवा ‘गुड’ रही. उस दिन सफदरजंग और पालम में औसत बारिश 67.75 एमएम थी. वहीं 8 अगस्त को मॉनसून की सबसे ज्यादा एक दिन की बारिश 101.05 एमएम हुई. इसके बावजूद उस दिन एयर क्वालिटी सिर्फ ‘सैटिस्फैक्टरी’ रही.
यह भी पढ़ें: प्लेन के 'क्रैश Axe' का पहली बार हुआ गलत इस्तेमाल! स्मित मछार पर चाकू से नहीं हुआ था हमला
मॉनसून के दौरान 53 दिन ‘मॉडरेट’, 35 दिन ‘सैटिस्फैक्टरी’ और तीन दिन ‘पुअर’ एयर क्वालिटी रही. सिर्फ एक दिन ‘गुड’ एयर रही. अप्रैल-मई के 61 दिनों में 38 दिन ‘मॉडरेट’, 17 दिन ‘पुअर’ और छह दिन ‘सैटिस्फैक्टरी’ रहे. इस दौरान एक भी दिन हवा ‘गुड’ नहीं रही.
सीएसई के मुताबिक, ‘मॉडरेट’ एयर क्वालिटी का मतलब पूरी तरह साफ हवा नहीं है. इस कैटेगरी में 24 घंटे का औसत पीएम 2.5 61 से 90 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक हो सकता है. यह 60 माइक्रोग्राम के राष्ट्रीय मानक से ऊपर है.
बारिश के बाद गैस वाले प्रदूषक ज्यादा दिखे
बारिश हवा में मौजूद पीएम2.5 और पीएम10 जैसे छोटे कणों को नीचे बैठाने में मदद करती है. लेकिन कुछ गैस वाले प्रदूषक बारिश से खत्म नहीं होते. इसलिए बारिश के दौरान कई दिनों में ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड हवा को खराब करने वाले बड़े प्रदूषक रहे.
ग्राउंड लेवल ओजोन गर्मी के 49 फीसदी दिनों में प्रमुख प्रदूषक रहा. मॉनसून में भी यह 20 दिनों में सबसे बड़ा प्रदूषक रहा. नाइट्रोजन डाइऑक्साइड मॉनसून के 10 दिनों में प्रमुख प्रदूषक रहा. गर्मी में यह सिर्फ 3 फीसदी दिनों में प्रमुख था. वहीं कार्बन मोनोऑक्साइड मॉनसून के 7 फीसदी दिनों में प्रमुख प्रदूषक रहा.
यह भी पढ़ें: सूखे रेगिस्तान में फूलों की बहार! अल-नीनो की बारिश से अटाकामा में खिले लाखों फूल
सीएसई के मुताबिक, गाड़ियों, डीजल जनरेटर और इंडस्ट्री से निकलने वाली कुछ गैसें बारिश के दौरान भी हवा में रहती हैं. जब बादलों के बीच से धूप निकलती है तो इन गैसों के बीच केमिकल रिएक्शन हो सकता है. इससे ग्राउंड लेवल ओजोन बनता है.
सर्दियों से पहले बढ़ सकती है परेशानी
मौसम विभाग से मिलने वाली प्राकृतिक राहत कम होगी. इसके बाद सर्दियों में हवा की रफ्तार कम होने और हवा की ऊपरी परत नीचे आने जैसी वजहों से प्रदूषण बढ़ सकता है. सीएसई का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर में सिर्फ सर्दियों के समय इमरजेंसी कदम उठाने से काम नहीं चलेगा. पूरे साल प्रदूषण कम करने पर काम करना होगा. इसके लिए गाड़ियों, इंडस्ट्री, कंस्ट्रक्शन, कचरा जलाने और डीजल जनरेटर से होने वाले प्रदूषण को कम करना जरूरी है. साथ ही पूरे एनसीआर में एक साथ कदम उठाने की जरूरत है.
आजतक साइंस डेस्क