हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. वे केवल बर्फ ही नहीं खो रहे बल्कि अपने पीछे बड़ी-बड़ी झीलें छोड़ रहे हैं. इन झीलों का बढ़ता आकार पहाड़ी क्षेत्रों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है. अलकनंदा बेसिन पर की गई एक नई स्टडी ने इस बदलते जल परिदृश्य की डरावनी तस्वीर पेश की है.
स्टडी के अनुसार 1994 से 2023 के बीच 24 ग्लेशियल झीलों का कुल क्षेत्रफल 0.97 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 1.62 वर्ग किलोमीटर हो गया. यानी तीन दशकों में करीब 67% की वृद्धि हुई. इतना ही नहीं, इस दौरान 57 नई ग्लेशियल झीलें भी बनीं. इनमें 18 झीलें ऐसी हैं जिनका क्षेत्रफल 0.01 वर्ग KM से अधिक है.
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कुछ झीलों का विस्तार बेहद तेज रहा. वसुंधरा झील का क्षेत्रफल 261 प्रतिशत और बलबाला झील का 119 प्रतिशत बढ़ा. शोधकर्ताओं ने 27 ऐसी झीलों की पहचान की है जिनके आकार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. इनमें बद्रीनाथ मंदिर जैसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल के ऊपर स्थित एक झील भी शामिल है.
यह स्टडी 'अलार्मिंग ट्रेंड्स: रैपिडली ग्रोइंग एंड रिसेंटली फॉर्म्ड ग्लेशियल लेक्स इन द अलकनंदा बेसिन, नॉर्दर्न इंडियन हिमालयाज' शीर्षक से ओपन जियोसाइंसेज जर्नल में प्रकाशित हुआ है. प्राग स्थित चार्ल्स यूनिवर्सिटी से जुड़ी शोधकर्ता डॉक्टर आयुषी पांडेय के नेतृत्व में यह शोध किया गया.
इसमें लैंडसेट और सेंटिनल-2 सैटेलाइटों के आंकड़ों की मदद से 74 ग्लेशियल झीलों में हुए बदलावों का एनालिसिस किया गया. नतीजे बताते हैं कि अलकनंदा बेसिन में झीलों की कुल संख्या बढ़कर 131 हो गई है.
ग्लेशियल झीलें क्यों खतरनाक हैं?
ग्लेशियल झीलें पिघलते ग्लेशियरों से आने वाले पानी से बनती और बढ़ती हैं. इन्हें बर्फ, चट्टान या मलबे से बनी प्राकृतिक संरचनाएं रोककर रखती हैं. जब ये कमजोर पड़ते हैं या अचानक टूट जाते हैं तो झील में जमा भारी मात्रा में पानी तेज गति से नीचे की ओर बह निकलता है.
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इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है. यह बहाव अपने साथ चट्टानें, मिट्टी और मलबा लेकर आता है. इससे सड़कें, पुल, घर, हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स और अन्य बुनियादी सुविधाएं कुछ ही समय में तबाह हो सकती हैं.
नेपाल में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ ने दिखाया कि हिमालयी क्षेत्रों में अचानक आने वाली बाढ़ कितनी बड़ी तबाही ला सकती है. हालांकि वह घटना पारंपरिक GLOF नहीं थी लेकिन उसने जोखिम की गंभीरता साफ कर दी.
स्टडी में जिन झीलों का तेजी से विस्तार हुआ है वे इसलिए चिंता का विषय हैं क्योंकि उनके किनारे या रोकने वाली संरचनाएं अस्थिर हो सकती हैं. बद्रीनाथ के ऊपर स्थित झील का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नीचे तीर्थस्थल और आबादी वाले क्षेत्र हैं. किसी भी अचानक बहाव का असर दूर तक पड़ सकता है.
सैटेलाइट निगरानी की भूमिका और सीमाएं
शोधकर्ताओं का कहना है कि सैटेलाइट निगरानी से खतरे वाली झीलों की पहचान में मदद मिलती है. लैंडसेट और सेंटिनल-2 जैसे सैटेलाइटों से नई झीलों का पता लगाना. उनके आकार में बदलाव ट्रैक करना. तेजी से बढ़ रही झीलों को चिन्हित करना संभव है. इससे उन झीलों की सूची बनाई जा सकती है जिनकी जमीन पर विस्तृत जांच जरूरी है. लेकिन केवल सैटेलाइट डेटा पर्याप्त नहीं है.
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झील की गहराई, उसमें मौजूद पानी की मात्रा, आसपास की ढलानों की स्थिरता, संभावित बहाव का रास्ता और ग्लेशियर-झील संबंधों का स्टडी करने के लिए मैदानी जांच बेहद जरूरी है. दुर्गम हिमालयी इलाकों में यह काम चुनौतीपूर्ण है लेकिन जोखिम आकलन के लिए अपरिहार्य है.
डॉक्टर आयुषी पांडेय के अनुसार हाल की बाढ़ ने याद दिलाया कि ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में लगातार निगरानी कितनी आवश्यक है. भारी बारिश, ग्लेशियल झीलों का विस्तार, पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता और भूकंपीय गतिविधियां एक-दूसरे के प्रभाव को बढ़ा सकती हैं. निचले इलाकों में खतरा और गंभीर हो सकता है.
यह समस्या केवल अलकनंदा बेसिन तक सीमित नहीं है. पर्यावरण मंत्रालय ने भी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में जानकारी दी है कि हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियल झीलें बढ़ रही हैं. GBPNIHE के एक स्टडी में पश्चिमी हिमालय की 25 ग्लेशियरों और आसपास की झीलों का 1990-2015 विश्लेषण किया गया था.
उसमें भी संख्या और क्षेत्रफल में भारी वृद्धि दिखी. पॉट्सडैम यूनिवर्सिटी के स्टडी में हिमालय की करीब पांच हजार झीलों पर बाढ़ का खतरा बताया गया क्योंकि उनके किनारे कमजोर हैं. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने अप्रैल 2024 की रिपोर्ट में कहा था कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और झीलों का आकार बढ़ रहा है.
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इसरो के अनुसार 2016-17 में 10 हेक्टेयर से बड़ी करीब 2431 ग्लेशियर झीलें दर्ज हुईं. इनमें से 676 झीलों के क्षेत्रफल में पिछले तीन दशकों में दोगुना इजाफा हुआ. ये आंकड़े साफ करते हैं कि समस्या क्षेत्रीय स्तर की है. तापमान वृद्धि ग्लेशियरों के पिघलने की मुख्य वजह है. इससे झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलें फैल रही हैं.
क्षेत्रीय सहयोग और भविष्य की रणनीति
हिमालय कई देशों में फैला है. ग्लेशियरों का पिघलना, झीलों का बढ़ना और बाढ़ का पानी राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानता. इसलिए बदलती ग्लेशियल झीलों की निगरानी, वैज्ञानिक आंकड़ों को साझा करना और समय रहते चेतावनी व्यवस्था पूरे हिमालयी क्षेत्र की साझा जरूरत है. पर्याप्त आर्थिक और तकनीकी संसाधनों के साथ-साथ देशों के बीच मजबूत वैज्ञानिक सहयोग जरूरी है.
स्टडी सुझाव देता है कि केवल कुल बारिश या ग्लेशियर पिघलने पर ध्यान देना काफी नहीं. झीलों की तीव्रता, वितरण, गहराई और स्थिरता पर भी नजर रखनी होगी. स्थानीय समुदायों को जागरूक करना, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली लगाना और जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्माण पर नियंत्रण रखना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं. जलविद्युत परियोजनाओं और सड़कों की योजना बनाते समय इन खतरों को ध्यान में रखना होगा.
अलकनंदा बेसिन का यह स्टडी भविष्य के लिए चेतावनी है. तेजी से बदलता हिमालयी जल परिदृश्य तैयारियों की मांग करता है. सैटेलाइट और मैदानी दोनों स्तरों पर निगरानी बढ़ाकर, आंकड़े साझा करके और सहयोग मजबूत करके जोखिम को कम किया जा सकता है. पहाड़ों में जमा पानी अचानक तबाही मचा सकता है. इसलिए समय रहते कदम उठाना पूरे क्षेत्र की जिम्मेदारी है. वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और स्थानीय लोगों के संयुक्त प्रयास से ही इस चुनौती का सामना संभव है.
ऋचीक मिश्रा