नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में 26 अगस्त 2026 को लैंगटांग लिरुंग ग्लेशियर का विशाल हिस्सा ढह गया. इससे पैदा हुए भूस्खलन और मलबा नीचे की ओर तबाही लेकर आया. अब तक 1400 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है जबकि करीब 5700 लोग अभी भी लापता हैं. Photo: Reuters
त्रिशुली नदी के किनारे बने करीब एक दर्जन हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स बह गए या मीटरों गहरे कीचड़, चट्टानों, लकड़ी और मलबे के नीचे दब गईं. बचाव दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन प्रोजेक्ट्स के नीचे छिपी सुरंगों का जाल बना. अधिकारी मानते हैं कि कई मजदूर इन्हीं अंडरग्राउंड सुरंगों में फंस गए थे. Photo: AFP
बचाव कार्यों में कई दिनों तक ड्रिलिंग, नियंत्रित विस्फोट और भारी मशीनों का इस्तेमाल करना पड़ा. अब तक केवल कुछ मजदूर ही बचाए जा सके हैं. दो दर्जन से अधिक शव बरामद हुए हैं. सुरंगों के प्रवेश द्वार और उन तक जाने वाले रास्ते पूरी तरह मलबे में दब गए थे. इससे यह तय करना भी मुश्किल हो गया कि कहां से खुदाई शुरू की जाए. हिमालय की गहराई में फैला यह अंडरग्राउंड ढांचा सामान्य बचाव अभियान को बेहद जटिल बना दिया. Photo: AFP
नेपाल की अधिकांश हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स रन-ऑफ-द-रिवर यानी नदी के बहाव पर आधारित होती हैं. इनमें जमीन के ऊपर और नीचे दोनों तरह का विशाल ढांचा होता है. रसुवागढ़ी परियोजना का उदाहरण लें जो आपदा में सबसे पहले प्रभावित हुई. अधिकारियों के अनुसार यहां दर्जनों मजदूर फंसे हो सकते हैं. Photo: Reuters
जमीन के ऊपर मुख्य रूप से जलाशय और डायवर्जन वीयर होता है. यहां से पानी को अंडरग्राउंड सुरंगों में मोड़ा जाता है. पानी करीब 4.5 किलोमीटर नीचे जाकर फिर बाहर निकलता है. पहाड़ के अंदर पानी पहले डेसेंडर से गुजरता है जहां तलछट अलग की जाती है. इसके बाद वह लगभग चार किलोमीटर लंबी हेड्रेस सुरंग से होकर विशाल बहुमंजिला अंडरग्राउंड पावरहाउस कॉम्प्लेक्स में पहुंचता है. वहां टर्बाइन घूमकर बिजली पैदा होती है जिसे ट्रांसमिशन लाइन के जरिए ग्रिड में भेजा जाता है. Photo: AFP
इस पूरे अंडरग्राउंड सिस्टम को जमीन से जोड़ने के लिए सुरंगों का जाल बना होता है. कुछ सुरंगें निर्माण के दौरान अस्थाई रूप से बनाई जाती हैं. कुछ पावरहाउस और अन्य हिस्सों तक पहुंचने के लिए स्थाई होती हैं. कुछ वेंटिलेशन और डेसेंडिंग के काम आती हैं. आपदा के समय ये सभी प्रवेश द्वार मलबे से ढक गए. पानी और कीचड़ का प्रवाह नदी के किनारे फैल गया और सुरंगों के मुहाने बंद हो गए. मजदूर इन्हीं सुरंगों और पावरहाउस में फंस गए. Photo: Reuters
रसुवागढ़ी के पावरहाउस के आसपास सुरंगों का जटिल और आपस में जुड़ा नेटवर्क है. ये सुरंगें पहाड़ के अंदर सैकड़ों मीटर तक जाती हैं. अलग-अलग प्रवेश बिंदु और अलग उपयोग वाली सुरंगें हैं. मुख्य एक्सेस सुरंग और ट्रांसफॉर्मर रूम तक पहुंचने वाली सुरंगों के क्रॉस-सेक्शन से साफ होता है कि अंदर वेंटिलेशन डक्ट और वाहनों के लिए जगह होती है. Photo: Reuters
अपर त्रिशुली 3ए परियोजना में दो मजदूरों को 4 सितंबर को बचाया गया. आपदा के नौ दिन बाद यह राहत मिली. यहां सभी सुरंगें 15 से 30 मीटर गहरे मलबे के नीचे दब गई थीं. बचाव दल को तीन दिन बाद ऊपर से बोरहोल ड्रिल करके सुरंग की सही दिशा का पता चला. उसके बाद खुदाई शुरू हुई. सुरंग के प्रवेश द्वार तक पहुंचने में करीब छह दिन लग गए. मजदूरों को केबल ले जाने वाली सुरंग से निकाला गया. Photo: Reuters
सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला कि सुरंग का मुहाना नदी तल से करीब 29 मीटर ऊपर था और मलबा उस पर करीब 20 मीटर और चढ़ गया था. इंजीनियरिंग नक्शों के अनुसार पावरहाउस तक एक एक्सेस सुरंग 180 मीटर से अधिक लंबी थी. बचाव दल को लगा कि वह बाढ़ के पानी से भर गई होगी इसलिए वहां उम्मीद कम थी. उन्होंने छोटी और ऊपर की ओर ढलान वाली केबल डक्ट सुरंग पर ध्यान केंद्रित किया. वहां दो मजदूर हवा भरे चैंबर में सुरक्षित थे. वे निकास से महज 160 मीटर अंदर थे. Photo: Reuters
बचे हुए मैकेनिकल फोरमैन संजय साह ने बताया कि वे पावरहाउस के कंट्रोल रूम में काम करते थे. बाढ़ आने से पहले उन्होंने मंजिल-दर-मंजिल साथियों को चेतावनी दी. आपदा से पहले वे सुरंग के हर हिस्से को जानते थे लेकिन बाढ़ के बाद पूरा ढांचा बदल गया. उपकरण बह गए, बक्से बिखर गए, दीवारें गिर गईं और मलबे ने टीले व गड्ढे बना दिए. पुरानी जानकारी काम नहीं आई. Photo: Reuters
नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के इंजीनियर सुरज दहाल ने बताया कि एक एस्केप लैडर की पहचान बाद में हुई जिससे दो-तिहाई लोग बच सकते थे अगर वे उसके बारे में जानते. उनके पास भागने का समय था लेकिन वे नहीं जानते थे कि कहां जाएं. अपर त्रिशुली 1 के सिविल इंजीनियर जन जीवन ठाकुर ने कहा कि सायरन बजते ही वे और करीब 100 सहयोगी पुरानी ड्रिल की आदत से ऊपर की ओर भागे. वे सामान्य आपात स्थितियों के लिए प्रशिक्षित थे न कि अचानक आने वाली बाढ़ के लिए. आदर्श रूप से उन्हें सुरंग के अंदर सुरक्षित जगह पर जाना चाहिए था लेकिन वे इसके बारे में नहीं जानते थे. Photo: Reuters
एक ठेका ड्राइवर धन बहादुर तामांग ने बताया कि उन्हें कभी कोई ट्रेनिंग नहीं मिली. ठेकेदार ने सिर्फ सेफ्टी हेलमेट और जूते दिए. वे रास्ता जानते थे इसलिए बच निकले. कई अन्य जान गंवा बैठे. नेपाली सेना के प्रवक्ता राजा राम बस्नेत ने कहा कि बाढ़ ने सुरंगों के आसपास का भूभाग बदल दिया और अंदर की संरचना भी प्रभावित हुई. कीचड़, चट्टानें, मिट्टी और मलबा अंदर जमा हो गया. यह सामान्य बंद होना नहीं था. Photo: Reuters
बचाव दल ने सुरंगों के मुहाने से बड़े पत्थर हटाने के लिए एक्स्केवेटर का इस्तेमाल किया. ड्रिलिंग और नियंत्रित विस्फोट भी किए गए. मलबे की परत मोटी होने और दिशा पता न होने से काम धीमा रहा. कई जगहों पर पानी भर जाने की आशंका ने जोखिम बढ़ाया. Photo: Reuters
यह आपदा हिमालयी हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है. अंडरग्राउंड ढांचे की जटिलता, एस्केप रूट की जानकारी की कमी और फ्लैश फ्लड जैसे खतरों के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण न होना प्रमुख कमियां सामने आईं. ग्लेशियर के ढहने जैसी घटनाएं जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ सकती हैं. भविष्य की प्रोजेक्ट्स में बेहतर चेतावनी प्रणाली, स्पष्ट निकासी मार्ग और नियमित ड्रिल की जरूरत है. Photo: Reuters
नेपाल की यह त्रासदी सिर्फ जान-माल के नुकसान तक सीमित नहीं. यह दिखाती है कि आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रकृति की शक्ति के सामने कितना कमजोर साबित हो सकता है. बचाव अभियान अब भी जारी है. लापता लोगों की तलाश और मलबा हटाने का काम जारी रहेगा. इस घटना से मिले सबक पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं जहां कई हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स चल रही हैं या प्रस्तावित हैं. सुरक्षा को प्राथमिकता देकर ही भविष्य में ऐसी आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सकता है. Photo: Reuters