महज दो दिनों के भीतर फेसबुक-इंस्टाग्राम की पेरेंट कंपनी मेटा ने दो अलग-अलग मोर्चों पर माफी मांगी है. पहली माफी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ऑफिशियल वीडियो ब्लॉक करने के लिए मांगी गई, और दूसरी तरफ अपने प्लेटफॉर्म पर 'चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज' (बच्चों का यौन शोषण) और डीपफेक कंटेंट को प्रमोट करने के लिए. लेकिन दोनों ही मामलों में मेटा ने अपनी चालाकी दिखाते हुए पूरी गलती का ठीकरा अपने प्लेटफॉर्म के 'एल्गोरिदम' (ऑटोमेटेड सिस्टम) के सिर फोड़ दिया है.
अब जब खुद फेसबुक के फाउंडर मार्क जकरबर्ग ने यह मान ही लिया है कि उनका एल्गोरिदम ही असली 'शरारती' है, तो भारत सरकार के लिए यही सही वक्त है कि इस एल्गोरिदम के बहाने मेटा पर स्थायी रूप से लगाम कसी जाए और उसे 'परमानेंट टाइट' कर दिया जाए.
मेटा के फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रधानमंत्री का वह बेहद जरूरी संदेश ब्लॉक कर दिया जाता है, जो उन्होंने देश के करोड़ों छात्रों और युवाओं के लिए जारी किया था. दूसरी ओर, जब छात्र आंदोलन या प्रोटेस्ट का दौर चल रहा था, तब इन्हीं प्लेटफॉर्म्स पर गाली-गलौज वाले वीडियो जमकर वायरल किए गए. ये वे वीडियो थे जिन्हें रिकॉर्ड करने वालों ने खुद माना कि उनसे गलती हुई थी, और उनके माता-पिता ने भी इस पर सार्वजनिक रूप से पछतावा जताया था. इतना ही नहीं, जो लोग प्रोटेस्ट कर रहे छात्रों के खिलाफ बेहद अभद्र कंटेंट बना रहे थे, उन्हें भी एल्गोरिदम के जरिए दबाकर वायरल किया गया.
कुल मिलाकर, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर जो देखा गया, वही खूब बेचा गया. यही है मेटा के सिफारिशी एल्गोरिदम (Recommendation Algorithm) का असली खेल. मेटा का सिस्टम यह मान लेता है कि यूजर अगर किसी भड़काऊ या अभद्र पोस्ट पर रुका है, तो उसे यही पसंद है और फिर पूरे वैसा ही जहर उसे बार-बार दिखाया जाएगा. 'कम्युनिटी स्टैंडर्ड' गए भाड़ में.
मेटा ने उठाया है 'Safe Harbour' का बेजा फायदा, नियम बदलने की जरूरत
अब तक फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसी टेक कंपनियों को भारत के आईटी कानून की धारा 79 के तहत 'सेफ हार्बर' (Safe Harbour) यानी कानूनी सुरक्षा कवच का फायदा मिलता रहा है. इस नियम का मतलब यह है कि अगर कोई यूजर फेसबुक पर गलत या गैर-कानूनी पोस्ट डालता है, तो उसके लिए कंपनी को सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. कंपनियों को एक "सड़क" या निष्पक्ष बिचौलिया (Intermediary) माना जाता था. लेकिन अब इस छूट को तुरंत रोक दिया जाना चाहिए. इसके पीछे साफ कारण हैं:
निष्पक्षता का ढोंग: मेटा अब केवल एक खाली प्लेटफॉर्म नहीं है. जब उसका एल्गोरिदम खुद तय करता है कि किस वीडियो को दबाना है और किसे करोड़ों लोगों की स्क्रीन पर धकेलना है, तो वह निष्पक्ष बिचौलिया नहीं रहता.
कमाई का खेल: जब मेटा पैसे लेकर विज्ञापनों और चुनिंदा कंटेंट को 'बूस्ट' करता है, तो वह एडिटर या पब्लिशर की तरह काम करता है.
कोई जिम्मेदारी नहीं: जब भी कोई बड़ा दंगा या फर्जी वीडियो फैलता है, तो मेटा यह कहकर बच निकलता है कि यह तो 'मशीनी गलती' थी.
अगर कोई कंपनी अपने सिस्टम से यह तय कर रही है कि देश की जनता को क्या देखना चाहिए, तो उसे मिलने वाली कानूनी छूट तुरंत 'सशर्त' कर देना चाहिए.
फेसबुक के अतीत में हैं विवादों के कई चैप्टर
यह पहली बार नहीं है जब फेसबुक कटघरे में खड़ा हुआ है. दुनिया के अलग-अलग देशों में गड़बड़ी फैलाने के मामले में इसका इतिहास काफी पुराना है और इसे कई बार भारी सजा भी भुगतनी पड़ी है:
म्यांमार में हिंसा (2017): म्यांमार में फेसबुक के सिस्टम ने रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ नफरत और झूठी खबरों को इतना तेजी से फैलाया कि वहां बड़े पैमाने पर दंगे और हिंसा हुई. संयुक्त राष्ट्र की जांच में फेसबुक को इस तबाही का बड़ा जिम्मेदार माना गया, जिसके बाद इस पर 150 अरब डॉलर का भारी-भरकम मुकदमा हुआ.
इथियोपिया का गृहयुद्ध (2020): इथियोपिया में आपसी लड़ाई के दौरान नफरती पोस्ट्स और हत्या की धमकियों को फेसबुक का सिस्टम लगातार बढ़ाता रहा. इसके खिलाफ केन्या की अदालत में 2 अरब डॉलर का केस दर्ज कराया गया.
अमेरिकी संसद (कैपिटल हिल) पर हमला (2021): फेसबुक की ही पूर्व कर्मचारी फ्रांसिस हौगेन ने दस्तावेज लीक करके खुलासा किया था कि अमरिकी चुनाव के बाद फेसबुक ने हिंसा रोकने वाले सुरक्षा नियमों को ढीला कर दिया था. इसी वजह से झूठी खबरें और अफवाहें फैलीं, जिसके चलते 6 जनवरी 2021 को अमरिकी संसद भवन पर हिंसक उपद्रव हुआ.
375 मिलियन डॉलर का जुर्माना: बच्चों को अश्लील विज्ञापनों और खतरों में धकेलने के आरोप में अमेरिका की अदालत ने हाल ही में मेटा पर 375 मिलियन डॉलर का बड़ा जुर्माना लगाया है.
जकरबर्ग एक आदतन शरारती हैं, बख्शा गया तो फिर गलती दोहराएंगे
मार्क जकरबर्ग और उनकी कंपनी का कामकाज यह साफ बताता है कि हर बार कोई बड़ा कांड होने पर अमरिकी संसद से लेकर दुनिया भर की सरकारों के सामने माफी मांग ली जाती है, और कुछ ही दिनों बाद नए नाम या नए एल्गोरिदम के साथ वही खेल दोबारा शुरू हो जाता है. अगर इस बार भी सिर्फ एक माफीनामे पर मेटा को बख्श दिया गया, तो भविष्य में फिर यही कांड दोहराया जाएगा.
भारत जैसे 150 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए डिजिटल सिक्योरिटी का मुद्दा सीधा देश की सुरक्षा से जुड़ा है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, और लोकतंत्र में सभी को अपनी बात रखने की आजादी है. लेकिन लोकतंत्र के नाम पर 'अराजकता' को बिल्कुल जगह नहीं दी जा सकती.
भारत में अलग-अलग धर्मों, जातियों और भाषाओं के करोड़ों लोग रहते हैं. यहां कोई भी भड़काऊ वीडियो या फर्जी डीपफेक कंटेंट कुछ ही मिनटों में शांति व्यवस्था को तबाह कर सकता है. जब कोई गंभीर संकट खड़ा होता है, तो टेक कंपनियां यह कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि "यह तो मशीन या एल्गोरिदम की गलती थी."
150 करोड़ नागरिकों के सुरक्षा अधिकार और देश की शांति को किसी विदेशी कंपनी के मुनाफा कमाने वाले 'मशीनी एल्गोरिदम' के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.
धीरेंद्र राय