दुनिया के अपेक्षाकृत अन्य शांत देशों की तुलना में यूरोप हमेशा से अलहदा रहा है. पर 2026 में यूरोप की कई राजधानियों और शहरों में सड़कें सुलग रही हैं. फ्रांस सबसे ज्यादा प्रभावित है, जहां हाईस्कूल और विश्वविद्यालय के छात्रों से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन हिंसक दंगों में बदल गए. लिमोज़ में ऐतिहासिक टाउन हॉल आग की लपटों में घिर गया, मार्सिले और ल्यों में सरकारी इमारतों पर हमले हुए, पेरिस में लूटपाट और आगजनी की घटनाएं हुईं.
आंतरिक मंत्रालय के अनुसार शनिवार को करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर थे, जबकि ट्रेड यूनियनों ने आंकड़ा 8 लाख तक बताया. 2,000 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं, सैकड़ों पुलिसकर्मी घायल हुए और कुछ मौतें भी हुईं. प्रधानमंत्री सेबस्तियन लेकोर्नु ने आंशिक कर्फ्यू की बात कही और राष्ट्रपति मैक्रों ने हिंसा की निंदा की.
यह आग फ्रांस तक सीमित नहीं रही. मिलान में जीवनयापन खर्च की लागत के खिलाफ मार्च हिंसक हो गया, बैरिकेड जलाए गए और पुलिस से झड़पें हुईं. लिस्बन में आवास संकट को लेकर टेंट कैम्प लगाया गया और हजारों लोग मार्च पर निकले. बेल्जियम के ब्रसेल्स और लीज में छात्रों ने शिक्षा लागत के खिलाफ प्रदर्शन किया और कुछ जगहों पर हिंसा हुई. स्पेन में आवास की कीमतों और बेदखली के खिलाफ प्रदर्शन चले, अल्बानिया में प्रधानमंत्री एदी रामा के खिलाफ छात्रों और युवाओं के विरोध जारी रहे. कई जगहों पर युवाओं खासकर जेनरेशन जेड की मौजूदगी प्रमुख रही.
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सवाल उठता है कि इस ‘आग’ के पीछे कौन है? क्या ये ‘वोक’ जेनजी हैं, जो वैचारिक एजेंडे के तहत सड़कों पर हैं, या इसके पीछे अमेरिका का डीप स्टेट काम कर रहा है? तथ्यों पर नजर डालें तो सबसे सीधा और स्पष्ट कारण आर्थिक है. यूरोप में जीवनयापन की लागत तेजी से बढ़ी है. पुर्तगाल में 2015 से 2024 के बीच आवास की कीमतें 124 प्रतिशत बढ़ीं, जो यूरोपीय औसत से दोगुनी है. फ्रांस में स्कूलों में शिक्षकों की कमी, जर्जर इमारतें और विश्वविद्यालय प्रवेश प्रणाली की जटिलता युवाओं को नाराज कर रही है.
रूस-यूक्रेन युद्ध और अन्य वैश्विक तनावों के चलते ईंधन और बिजली महंगी हो गई है. स्थिर वेतन, घटती सार्वजनिक सेवाएं और बढ़ती असमानता ने युवाओं में निराशा पैदा की है. कई रिपोर्टों में कहा गया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को ‘अल्ट्रा-लेफ्ट’ ने हाइजैक कर हिंसा फैलाई. फ्रांसीसी अधिकारियों ने भी ‘कैसर’ (opportunistic delinquents) और कट्टरपंथी समूहों पर आरोप लगाया.
जेनजी की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. ये युवा सोशल मीडिया पर संगठित होते हैं, और फ्रांस जैसी हिंसा की वकालत करते हैं. नारे लगते हैं और शिक्षा, आवास व भविष्य की अनिश्चितता को लेकर सड़कों पर आते हैं. कुछ जगहों पर एंटी-फासिस्ट स्लोगन, पर्यावरणीय और फिलिस्तीन समर्थक समूह भी शामिल हो जाते हैं. यह ‘वोक’ संस्कृति से जुड़ा हो सकता है. जहां पहचान राजनीति, असमानता विरोधी और संस्थाओं के खिलाफ रुख प्रमुख होता है. लेकिन इसे पूरी तरह वैचारिक साजिश कहना अतिरंजना होगी. ज्यादातर मांगें ठोस रूप में सामने हैं. सस्ता आवास, बेहतर स्कूल, नौकरियां और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार. यूरोप अपने कल्याणकारी राज्य मॉडल के लिए मशहूर रहा है.पर धीरे-धीरे बढ़े कर, कमजोर विकास गति, प्रवासन के दबाव और ऊर्जा संकट ने उसे कमजोर कर दिया है. पुरानी पीढ़ी संपत्तियों और पेंशन पर बैठी है, जबकि युवा किराए और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं.
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अब अमेरिकी डीप स्टेट की बात पर आते हैं. कुछ हलकों में यह दावा किया जाता है कि ये विरोध अमेरिकी खुफिया एजेंसियों, एनजीओ या वैश्विक अभिजात्य वर्ग द्वारा प्रायोजित हैं, ताकि यूरोप को कमजोर किया जा सके या नीतियां बदली जा सकें. यह भी कहा जा रहा है कि जिन देशों ने अमेरिकी अस्तित्व को चैलेंज करने की कोशिश की है विशेषकर उन देशों में असंतोष की लपटें कुछ ज्यादे ही हैं. हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई साक्ष्य सामने नहीं आए हैं. प्रदर्शन का आधार मुख्य रूप से स्थानीय शिकायतों से उपजे सवाल ही हैं.
फ्रांस में शिक्षा और लागत, पुर्तगाल-स्पेन में आवास, अल्बानिया में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी प्रमुख हैं. इससिए अमेरिकी डीप स्टेट की भूमिका अभी अटकलों पर ही आधारित है.अमेरिका खुद आंतरिक विभाजनों से जूझ रहा है और यूरोप की अस्थिरता उसके हितों के खिलाफ भी हो सकती है.
संयम श्रीवास्तव