यूपी का मऊ जिला पूर्वांचल का एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और हलचल भरा क्षेत्र माना जाता है. 1988 में आजमगढ़ जिले से अलग होकर स्वतंत्र जिला बने मऊ की पहचान पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. कल्पनाथ राय के विकास कार्यों और बाहुबली राजनीति (खासकर मुख्तार अंसारी कुनबे) के केंद्र के रूप में रही है.
जिले का इतिहास: तमसा (टोंस) नदी के तट पर बसा मऊ पौराणिक काल से ऋषि मुनियों और व्यापारिक आवाजाही का केंद्र रहा है. मुगल काल में सम्राट शाहजहां की बेटी जहांआरा बेगम ने यहां सराए (विश्राम गृह) और कटरा का निर्माण कराया, जिससे इसे व्यापारिक पहचान मिली.
कल्पनाथ राय का योगदान: मऊ की राजनीति पूर्व केंद्रीय मंत्री कल्पनाथ राय के बिना अधूरी है. उन्होंने जनता की जरूरतों को समझते हुए वर्ष 1988 में मऊ को आजमगढ़ से अलग करवाकर एक स्वतंत्र जिला बनवाया. कल्पनाथ राय के राजनीतिक प्रभाव को 1996 के लोकसभा चुनाव में बाहुबली मुख्तार अंसारी ने चुनौती दी, लेकिन जनता ने कल्पनाथ राय को शानदार जीत दिलाई और मुख्तार के रसूख को करारा झटका दिया. मऊ के आधुनिक स्वरूप और विकास का श्रेय पूर्व केंद्रीय मंत्री कल्पनाथ राय को ही जाता है.
आर्थिक स्थिति
यमुना-तमसा के उपजाऊ मैदानी क्षेत्र में स्थित होने के कारण मऊ की अर्थव्यवस्था कृषि पर काफी निर्भर है. प्रमुख फसलों में गेहूं, धान, मक्का, सरसों, बाजरा और आलू शामिल हैं. मऊ को 'बुनकरों का शहर' भी कहा जाता है. यहां का बनारसी और सूती साड़ी उद्योग पूरे देश में फेमस है. यह पूर्वांचल का एक बड़ा मेडिकल और रीटेल हब भी है.
जिले का सियासी ताना-बाना
मऊ जिले में कुल 4 विधानसभा सीटें आती हैं: मधुबन, घोसी, मुहम्मदाबाद गोहना, और मऊ सदर. यहां दलित (जाटव), मुस्लिम, चौहान (नोनिया), राजभर, यादव, और अगड़ी जातियों (ठाकुर, भूमिहार, ब्राह्मण) का तगड़ा जातीय समीकरण बनता है.
विधानसभा-वार डिटेल
1- मधुबन सीट 2008 के परिसीमन के बाद 2012 में अस्तित्व में आई. 2017 में बीजेपी से दारा सिंह चौहान ने इस सीट पर जीत हासिल की थी. दारा सिंह चौहान के सपा में जाने के बाद 2022 में बीजेपी के राम विलास चौहान ने यहां से जीत दर्ज की थी.
जातीय समीकरण: अनुसूचित जाति (दलित) वोट सबसे ज्यादा हैं. इसके अलावा यादव (15%), चौहान/नोनिया (6%), राजभर (6%), मुस्लिम (6%), वैश्य, कुर्मी और ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
2- घोसी सीट मऊ जिले की सबसे हाई-प्रोफाइल और राजनीतिक उथल-पुथल वाली सीट है. 2022 में सपा से दारा सिंह चौहान ने इस पर जीत हासिल की थी. वहीं, 2017 में बीजेपी के फागू चौहान विजयी हुए थे.
घोसी में 2023 का उपचुनाव: दरअसल, दारा सिंह चौहान ने सपा से इस्तीफा देकर वापस बीजेपी जॉइन कर ली थी. लेकिन 2023 के उपचुनाव में सपा के सुधाकर सिंह ने दारा सिंह को 42 से अधिक वोटों के अंतर से हरा दिया. इस उपचुनाव में 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा निर्णायक रहा.
जातीय समीकरण: घोसी में मुस्लिम (लगभग 90 हजार) और दलित (लगभग 90 हजार) वोट बैंक सबसे बड़ा है. इसके साथ ही राजभर (करीब 50 हजार), चौहान (करीब 45 हजार), यादव (करीब 40 हजार), भूमिहार व क्षत्रिय मतदाता बेहद अहम हैं.
3- मुहम्मदाबाद गोहना सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है. 2022 में यहां से सपा के राजेंद्र कुमार ने जीत हासिल की. वहीं, 2017 में बीजेपी के श्रीराम सोनकर जीत दर्ज की थी. सोनकर ने बसपा प्रत्याशी को महज 538 वोटों के बेहद बारीक अंतर से हराया था.
जातीय समीकरण: दलित (जाटव व पासी) मतदाता सबसे बड़ा निर्णायक फैक्टर हैं. इनके अलावा मुस्लिम, यादव और चौहान वोट चुनाव का रुख तय करते हैं.
4- मऊ सदर विधानसभा सीट पूर्वांचल की सबसे चर्चित सीट मानी जाती है. 2022 में मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी ने यहां से बड़ी जीत दर्ज की थी. अब्बास सपा-सुभासपा गठबंधन से मैदान में थे. वहीं, 2017 में मुख्तार अंसारी ने बसपा के टिकट पर इस सीट पर जीत हासिल की थी. गौरतलब है कि इस सीट पर लगभग तीन दशकों से मुख्तार एंड फैमिली का दबदबा रहा है.
जातीय समीकरण: मऊ सदर में लगभग 1.70 लाख मुस्लिम मतदाता और 91 हजार के करीब दलित मतदाता हैं. इसके बाद यादव (लगभग 45 हजार), राजभर (लगभग 45 हजार) और चौहान (लगभग 42 हजार) वोट मुख्य ताकत हैं.
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