कटरा उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले की तिलहर तहसील में स्थित एक नगर पंचायत है. यह रोहिलखंड के इतिहास में 1774 के प्रथम रोहिला युद्ध की निर्णायक लड़ाई के स्थल के रूप में प्रमुख स्थान रखता है. दूसरी ओर, यह क्षेत्र जिले के कम साक्षर इलाकों में शामिल है, जो इसके मुख्य रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से साधारण चरित्र को दर्शाता है. आज यह कस्बा आसपास
के गांवों के लिए मुख्य रूप से स्थानीय प्रशासनिक और बाजार केंद्र के रूप में काम करता है.
2008 के परिसीमन आदेश के माध्यम से स्थापित कटरा एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है और शाहजहांपुर लोकसभा सीट के छह विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. इसमें कटरा और खुदागंज नगर पंचायतों के साथ तिलहर तहसील के कटरा, खेड़ा बाजेड़ा और जलालपुर कानूनगो सर्किलों के कई गांव तथा जलालाबाद तहसील का परौर कानूनगो सर्किल शामिल है, जिससे इसका चरित्र स्पष्ट रूप से ग्रामीण बनता है.
कटरा ने 2012 में पहली बार मतदान होने के बाद से तीन विधानसभा चुनावों में भाग लिया है और यह प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए तेजी से एक प्रतिस्पर्धी सीट के रूप में उभरा है. जहां समाजवादी पार्टी ने पहला चुनाव जीता था, वहीं भाजपा ने पिछले दो चुनावों में इस सीट पर कब्जा बनाए रखा है. 2012 में समाजवादी पार्टी के राजेश यादव ने बहुजन समाज पार्टी के राजीव कश्यप को सिर्फ 875 वोटों के मामूली अंतर से हराकर सीट जीती थी.
भाजपा, जो उस चुनाव में काफी पीछे चौथे स्थान पर रही थी और अपनी जमानत भी जब्त करा बैठी थी, ने 2017 में जोरदार वापसी की. उसके उम्मीदवार वीर विक्रम सिंह ने मौजूदा विधायक राजेश यादव को 16,730 वोटों से हराया. भाजपा ने 2022 में भी सीट बरकरार रखी, लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश के सबसे करीबी मुकाबलों में से एक देखने को मिला. वीर विक्रम सिंह को 77,800 वोट मिले, जबकि राजेश यादव को 77,443 वोट प्राप्त हुए. इस तरह भाजपा की जीत का अंतर सिर्फ 357 वोट रहा. यह अंतर कुल पड़े वोटों का केवल 0.18 प्रतिशत था.
लोकसभा चुनावों के दौरान भी कटरा विधानसभा क्षेत्र में करीबी मुकाबलों का पैटर्न पहले ही दिखाई देने लगा था. 2009 में, वर्तमान विधानसभा क्षेत्र के अस्तित्व में आने के बाद हुए पहले संसदीय चुनाव में समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस पार्टी पर 3,258 वोटों की बढ़त बनाई थी, जबकि भाजपा काफी पीछे चौथे स्थान पर रही थी. 2014 में राजनीतिक समीकरण नाटकीय रूप से बदल गया, जब भाजपा शीर्ष पर पहुंच गई और उसने बसपा पर 31,058 वोटों की बढ़त बनाई. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, जो 2009 में क्रमशः पहले और दूसरे स्थान पर थीं, तीसरे और चौथे स्थान पर पहुंच गईं. 2019 के चुनाव में भी मोटे तौर पर इसी तरह का परिणाम रहा, जिसमें भाजपा ने बसपा पर 37,876 वोटों की बढ़त बनाई. 2024 में भाजपा आगे रही, लेकिन उसकी बढ़त काफी कम हो गई. उसके उम्मीदवार अरुण कुमार सागर को 86,225 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार ज्योत्सना गोंड को 79,841 वोट प्राप्त हुए. इस तरह भाजपा की बढ़त सिर्फ 6,384 वोट या कुल पड़े वोटों का 3.40 प्रतिशत रह गई.
कटरा के मतदाताओं की संख्या में वर्षों के दौरान लगातार वृद्धि हुई है. पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 292,322 से बढ़कर 2017 में 313,965, 2019 में 325,739, 2022 में 339,027 और 2024 में 355,337 हो गई. हालांकि, मतदाता भागीदारी का रुख इसके विपरीत रहा है. 2012 में मतदान प्रतिशत 63.47 था, जो 2017 में घटकर 61.47 प्रतिशत और 2019 के लोकसभा चुनाव में और कम होकर 55.17 प्रतिशत हो गया. 2022 के विधानसभा चुनाव में इसमें मामूली सुधार हुआ और यह 57.56 प्रतिशत पहुंच गया, लेकिन 2024 के संसदीय चुनाव में फिर से तेजी से घटकर 52.10 प्रतिशत रह गया.
कटरा हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत कम है. अनुमान के अनुसार मुस्लिम मतदाता कुल मतदाताओं का 13.20 प्रतिशत हैं, जबकि अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी 17.83 प्रतिशत है. यादव, ठाकुर और ब्राह्मण मतदाता समूहों के साथ कई ओबीसी समुदाय भी मतदाताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. यह विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है, जहां 90.14 प्रतिशत आबादी गांवों में और केवल 9.86 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है.
कटरा का ऐतिहासिक महत्व मुख्य रूप से 23 अप्रैल 1774 को प्रथम रोहिला युद्ध के दौरान लड़ी गई मीरानपुर कटरा की लड़ाई से जुड़ा है. अवध के नवाब और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की संयुक्त सेना ने कर्नल अलेक्जेंडर चैंपियन के नेतृत्व में हाफिज रहमत खान के नेतृत्व वाली रोहिला सेना को हराया था. इस लड़ाई में रहमत खान मारे गए थे, जिसके साथ ही क्षेत्र में स्वतंत्र रोहिला सत्ता का प्रभावी रूप से अंत हो गया. इस हार के बाद रोहिलखंड अवध के नवाब के नियंत्रण में आ गया, जबकि क्षेत्र पर ब्रिटिश प्रभाव लगातार बढ़ता गया.
इस लड़ाई ने रोहिलखंड के राजनीतिक इतिहास में भी एक महत्वपूर्ण मोड़ दिया. हालांकि, कटरा स्वयं किसी बड़े शहरी केंद्र के रूप में विकसित नहीं हो सका. यह आसपास के कृषि प्रधान गांवों की जरूरतों को पूरा करने वाली एक छोटी बस्ती बना रहा और बाद में ब्रिटिश प्रशासन के दौरान तिलहर तहसील का हिस्सा बन गया. कस्बे की ऐतिहासिक पहचान आज भी 1774 की इस लड़ाई से जुड़ी हुई है, जबकि इसकी वर्तमान अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि, स्थानीय व्यापार और छोटे व्यवसायों पर निर्भर है.
पूरे विधानसभा क्षेत्र में कृषि मुख्य आर्थिक गतिविधि बनी हुई है. दक्षिणी शाहजहांपुर के उपजाऊ मैदानी इलाके में गेहूं, धान, गन्ना, दालों और तिलहनों की खेती की जाती है. कटरा और खुदागंज कृषि उपज के स्थानीय व्यापारिक केंद्र के रूप में काम करते हैं, जबकि परिवहन, छोटी दुकानें, मरम्मत व्यवसाय और अन्य सेवाएं रोजगार के अतिरिक्त साधन प्रदान करती हैं. विधानसभा क्षेत्र का अत्यधिक ग्रामीण चरित्र बताता है कि कृषि की स्थिति, फसलों के दाम, सिंचाई और ग्रामीण बुनियादी ढांचा महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दे बने रहने की संभावना है.
कटरा सड़क मार्ग से शाहजहांपुर, तिलहर, जलालाबाद और शाहजहांपुर तथा आसपास के जिलों के अन्य कस्बों से जुड़ा हुआ है. जिला मुख्यालय शाहजहांपुर यहां से लगभग 35 किलोमीटर दूर है, जबकि तिलहर की दूरी करीब 20 किलोमीटर है. जलालाबाद लगभग 45 किलोमीटर और पुवायां करीब 55 किलोमीटर दूर है. बरेली की दूरी लगभग 50 किलोमीटर है, जबकि पीलीभीत करीब 105 किलोमीटर दूर है. सड़क मार्ग से लखनऊ लगभग 200 किलोमीटर और नई दिल्ली करीब 300 किलोमीटर दूर है. यह विधानसभा क्षेत्र तराई और रोहिलखंड क्षेत्र के प्रमुख कस्बों तक भी उचित दूरी में स्थित है.
आंकड़ों के अनुसार, 2009 के बाद कटरा में हुए सात प्रमुख चुनावों में भाजपा ने पांच में जीत या बढ़त हासिल की है और 2014 से लगातार शीर्ष पर बनी हुई है. लेकिन यह तस्वीर का केवल एक हिस्सा है. 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत सिर्फ 357 वोटों के बेहद मामूली अंतर से हुई, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसकी बढ़त केवल 6,384 वोट रही. इससे पहले दो संसदीय चुनावों में यह बढ़त 30,000 और 37,000 वोटों से अधिक थी. इसलिए समाजवादी पार्टी के पास यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि भाजपा की पकड़ पूरी तरह सुरक्षित नहीं है.
कम मतदान प्रतिशत भी अनिश्चितता का एक और पहलू जोड़ता है. 2024 के लोकसभा चुनाव में केवल 52 प्रतिशत से कुछ अधिक मतदाताओं ने मतदान किया, जिसका मतलब है कि मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचा. 2027 में मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि चुनावी गणित को काफी बदल सकती है, खासकर यदि कोई एक दल हाल के चुनावों में मतदान से दूर रहे वर्गों को अपने पक्ष में मतदान के लिए प्रेरित करने में सफल होता है.
भाजपा के लिए तत्काल चुनौती 2022 की बेहद मामूली जीत को एक स्थायी पैटर्न बनने से रोकना होगी. समाजवादी पार्टी के लिए काम अधिक सीधा लेकिन उतना ही कठिन है. उसे 2024 के संसदीय चुनाव में मिली वापसी को विधानसभा स्तर पर ऐसे राजनीतिक समीकरण में बदलना होगा, जो भाजपा को सत्ता से बाहर कर सके. उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय जातीय समीकरण, मतदाता लामबंदी और मतदान प्रतिशत सभी निर्णायक साबित हो सकते हैं.
कटरा 2027 के विधानसभा चुनाव में उन कुछ सीटों में शामिल है, जहां कोई भी प्रमुख दावेदार लापरवाही नहीं कर सकता, क्योंकि एक और करीबी मुकाबला लगभग तय माना जा रहा है. मौजूदा स्थिति में कटरा की चुनावी लड़ाई बेहद नाजुक संतुलन पर है और नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि मतदान के दिन कौन सा पक्ष अपने समर्थकों को अधिक प्रभावी ढंग से मतदान केंद्र तक पहुंचाने में सफल रहता है.
(अजय झा)