उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में अब कुछ ही महीने बाकी हैं, ऐसे में तमाम सियासी दल राज्य के गांव-गांव का दौरा करने में जुट गए हैं. राज्य के 12 जिलों में कुल 70 विधानसभा सीटें हैं. आज हम बात कर रहे हैं कुमाऊं मंडल के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण जिले अल्मोड़ा की, जिसके अंतर्गत कुल 6 विधानसभा सीटें (अल्मोड़ा, जागेश्वर, सोमेश्वर, द्वाराहाट, रानीखेत और सल्ट) आती हैं.
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ पहाड़ की सियासत में हलचल तेज होने लगी है. राजनीतिक दल गांवों, कस्बों और दूरस्थ पर्वतीय इलाकों तक अपनी पहुंच बनाने में जुटे हैं. प्रदेश की राजनीति को समझने के लिए कुमाऊं मंडल के ऐतिहासिक जिले अल्मोड़ा पर नजर डालना जरूरी है. यह जिला केवल अपनी छह विधानसभा सीटों (अल्मोड़ा, जागेश्वर, सोमेश्वर, द्वाराहाट, रानीखेत और सल्ट) के कारण महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यहां की सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक आस्था, सैन्य परंपरा, खेती-किसानी, पर्यटन और पलायन जैसे सवाल भी चुनावी चर्चा को आकार देते हैं.
अल्मोड़ा को कुमाऊं की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है. यहां की पहचान मंदिरों, पारंपरिक लोककलाओं, कुमाऊंनी खानपान और पहाड़ी जीवनशैली से जुड़ी है. दूसरी तरफ, रोजगार की कमी, गांवों से लगातार होता पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, सड़क संपर्क, शिक्षा और स्थानीय अर्थव्यवस्था जैसे सवाल इस क्षेत्र की विकास संबंधी चुनौतियों को सामने रखते हैं. ऐसे में 2027 के चुनाव में अल्मोड़ा की छह सीटों पर राजनीतिक दलों के सामने स्थानीय जरूरतों को लेकर अपनी बात रखने की चुनौती होगी.
चंद राजाओं की विरासत से सांस्कृतिक राजधानी तक
अल्मोड़ा का इतिहास कुमाऊं की राजनीतिक और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा है. प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक, चंद वंश के राजा कल्याण चंद ने 1568 में इस नगर की स्थापना राजापुर के नाम से की थी. समय के साथ यह क्षेत्र कुमाऊं की सांस्कृतिक और प्रशासनिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया.
अल्मोड़ा की पहचान यहां के ऐतिहासिक मंदिरों, पारंपरिक घरों और लोकजीवन से बनती है. इसकी सांस्कृतिक विरासत आज भी त्योहारों, लोकगीतों, खानपान और पारिवारिक परंपराओं में दिखाई देती है. यही वजह है कि इस जिले की चर्चा केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह उत्तराखंड की क्षेत्रीय पहचान और पहाड़ी समाज की आकांक्षाओं को भी सामने लाती है.
जागेश्वर से चितई तक, आस्था और पर्यटन की अलग पहचान
अल्मोड़ा जिले की धार्मिक पहचान में जागेश्वर धाम का विशेष स्थान है. देवदार के घने जंगलों के बीच स्थित यह प्राचीन मंदिर समूह भगवान शिव की उपासना और ऐतिहासिक स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है. चितई गोलू देवता मंदिर न्याय के देवता के रूप में गोलू देवता में लोगों की आस्था के कारण विशिष्ट पहचान रखता है.
द्वाराहाट का दूनागिरी मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण है. वहीं कसार देवी अपनी आध्यात्मिक पहचान, शांत वातावरण और प्राकृतिक दृश्यों के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता है. कटारमल का प्राचीन सूर्य मंदिर इस क्षेत्र की स्थापत्य विरासत का एक अन्य महत्वपूर्ण उदाहरण है.
धार्मिक पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए अवसर पैदा करता है. होटल, होमस्टे, टैक्सी, स्थानीय दुकानें, भोजनालय और हस्तशिल्प से जुड़े लोगों को इससे रोजगार मिल सकता है. चुनावी दृष्टि से सवाल यह है कि पर्यटन को स्थानीय लोगों की नियमित आय से किस तरह जोड़ा जाए, धार्मिक स्थलों पर बुनियादी सुविधाएं कैसे बेहतर हों और पर्यावरण की सुरक्षा के साथ पर्यटकों की आवाजाही कैसे बढ़ाई जाए.
भौगोलिक और प्रशासनिक महत्व
अल्मोड़ा मध्य हिमालयी क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण पर्वतीय जिला है. इसकी भौगोलिक बनावट में पहाड़, घाटियां, वन क्षेत्र, ग्रामीण बस्तियां और कृषि भूमि शामिल हैं. जिले की भौगोलिक स्थिति इसे कुमाऊं के दूसरे हिस्सों से जोड़ती है. ऐतिहासिक प्रशासनिक बदलावों के दौरान अल्मोड़ा के क्षेत्र से अलग होकर पिथौरागढ़ और बागेश्वर जैसे जिले बने.
यहां की भौगोलिक परिस्थितियां विकास की प्राथमिकताओं को भी प्रभावित करती हैं. कई गांवों में सड़क तक पहुंच, अस्पतालों की दूरी, शिक्षण संस्थानों की उपलब्धता और बाजार तक कृषि उत्पाद पहुंचाने की लागत महत्वपूर्ण मुद्दे हैं. बरसात में भूस्खलन और सड़क बाधित होने जैसी समस्याएं भी पहाड़ी जीवन को प्रभावित करती हैं.
यह भी पढ़ें: उत्तराखंड: जुबिन नौटियाल के पिता रामशरण ने थामा कांग्रेस का हाथ, कुछ दिन पहले ही दिया था बीजेपी से इस्तीफा
रानीखेत जिले की सैन्य पहचान का प्रमुख केंद्र है. यहां कुमाऊं रेजिमेंट और नागा रेजिमेंट से जुड़ी सैन्य संस्थागत उपस्थिति के कारण इस क्षेत्र का सामरिक और ऐतिहासिक महत्व भी है. रानीखेत का चौबटिया क्षेत्र अपने बागानों और प्राकृतिक परिवेश के लिए जाना जाता है. पर्यटन, बागवानी और स्थानीय रोजगार को जोड़ना यहां की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है.
बाल मिठाई, तांबे के बर्तन और ऐपण: लोकसंस्कृति की पहचान
अल्मोड़ा की पहचान उसके खानपान और पारंपरिक शिल्प से भी बनती है. यहां की बाल मिठाई ने जिले को देशभर में पहचान दिलाई है. इसके अलावा तांबे के पारंपरिक बर्तन, लकड़ी और पत्थर से बने पहाड़ी मकान तथा कुमाऊंनी वास्तुकला क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के अहम हिस्से हैं. ऐपण कला कुमाऊं की विशिष्ट लोककलाओं में शामिल है. पारंपरिक रूप से महिलाएं गेरू से तैयार लाल पृष्ठभूमि पर चावल के घोल यानी बिस्वार से घर की देहरी, आंगन और पूजा स्थलों पर शुभ आकृतियां बनाती हैं. विवाह, त्योहारों और धार्मिक आयोजनों में इसका विशेष महत्व है.
समय के साथ ऐपण घरों की देहरी से आगे बढ़कर चित्रों, कपड़ों, सजावटी वस्तुओं और अन्य उत्पादों तक पहुंची है. इस कला को प्रशिक्षण, बाजार, ऑनलाइन बिक्री और पर्यटन से जोड़कर स्थानीय महिलाओं तथा कारीगरों के लिए आय के नए अवसर पैदा किए हैं. चुनाव के दौरान स्थानीय उत्पादों, स्वरोजगार और छोटे कारोबारों को बढ़ावा देने की योजनाएं भी चर्चा का हिस्सा बन सकती हैं.
6 विधानसभा सीटें, चार पर भाजपा और दो पर कांग्रेस
अल्मोड़ा जिले में छह विधानसभा क्षेत्र हैं- द्वाराहाट, सल्ट, रानीखेत, सोमेश्वर, अल्मोड़ा और जागेश्वर. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने चार सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस को दो सीटें मिली थीं. भाजपा ने सल्ट, रानीखेत, सोमेश्वर और जागेश्वर में जीत हासिल की थी. कांग्रेस ने अल्मोड़ा और द्वाराहाट सीटें जीती थीं.
2027 के चुनाव के लिहाज से 2022 का परिणाम राजनीतिक दलों के पिछले प्रदर्शन का आधार जरूर है, लेकिन इससे अगले चुनाव का नतीजा तय नहीं होता. उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय कामकाज को लेकर मतदाताओं की प्रतिक्रिया, संगठन की सक्रियता, रोजगार और पलायन जैसे सवाल तथा क्षेत्रवार विकास की स्थिति चुनावी बहस को प्रभावित कर सकते हैं.
1 - अल्मोड़ा विधानसभा सीट: शहर और गांवों की उम्मीदों के बीच मुकाबला
अल्मोड़ा विधानसभा क्षेत्र जिले के मुख्यालय और आसपास के ग्रामीण इलाकों को समेटता है. यहां शहरी मतदाताओं के साथ गांवों में रहने वाले लोगों की जरूरतें भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा हैं. बाजार, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, यातायात, पेयजल और ग्रामीण संपर्क जैसे मुद्दे इस क्षेत्र की प्राथमिकताओं में शामिल हो सकते हैं. 2022 के चुनाव में कांग्रेस के मनोज तिवारी ने भाजपा के कैलाश शर्मा को 127 मतों के अंतर से हराया था. इससे पहले 2017 में भाजपा के रघुनाथ सिंह चौहान ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी. पिछले दो चुनावों के नतीजे बताते हैं कि इस सीट पर मुकाबला दोनों प्रमुख दलों के बीच रहा है.
2027 के चुनाव में टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. कांग्रेस के सामने अपनी पिछली जीत को दोहराने की चुनौती होगी, जबकि भाजपा के लिए सीट वापस हासिल करने का सवाल रहेगा. जिला मुख्यालय स्थित यह सीट हमेशा से कांग्रेस और बीजेपी के बीच प्रतिष्ठा का केंद्र रही है. वर्तमान में कांग्रेस के मनोज तिवारी यहां से विधायक हैं.
यह भी पढ़ें: 'पति के दूसरी महिलाओं से संबंध...', उत्तराखंड की मंत्री रेखा आर्या ने दर्ज कराई FIR, रोते हुए शेयर किया Video
2- जागेश्वर विधानसभा सीट: धार्मिक विरासत के साथ बुनियादी सुविधाओं की चुनौती
जागेश्वर विधानसभा क्षेत्र की पहचान ग्रामीण पर्वतीय भूगोल और विश्वप्रसिद्ध जागेश्वर मंदिर समूह से जुड़ी है. धौलादेवी और लमगड़ा जैसे क्षेत्रों के कारण यहां सड़क संपर्क, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, कृषि, पर्यटन और स्थानीय रोजगार जैसे सवाल अहम हैं.
राज्य गठन के बाद परिसीमन के जरिए जागेश्वर एक अलग विधानसभा क्षेत्र के रूप में सामने आया. इस सीट पर लंबे समय तक कांग्रेस का प्रभाव रहा, लेकिन 2022 में भाजपा के मोहन सिंह मेहरा ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गोविंद सिंह कुंजवाल को हराकर जीत दर्ज की. इससे पहले कुंजवाल लगातार चार चुनाव जीत चुके थे.
3- रानीखेत विधानसभा: पर्यटन, सैन्य विरासत और स्थानीय रोजगार
रानीखेत अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सैन्य परंपरा और पर्यटन के लिए जाना जाता है. यहां की अर्थव्यवस्था में पर्यटन से जुड़े कारोबार, स्थानीय व्यापार, बागवानी और आसपास के ग्रामीण इलाकों की गतिविधियों की भूमिका है. यह सीट भाजपा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय भट्ट और कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा जैसे नेताओं की राजनीतिक पृष्ठभूमि से भी जुड़ी रही है. 2022 के चुनाव में भाजपा के प्रमोद नैनवाल ने कांग्रेस के करण माहरा को हराया था.
रानीखेत में पर्यटन सुविधाओं का विकास, स्थानीय बाजारों को बढ़ावा, सड़क और पार्किंग व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएं तथा युवाओं के लिए रोजगार चुनावी चर्चा के महत्वपूर्ण विषय बन सकते हैं. पर्यटन से होने वाली कमाई का लाभ आसपास के गांवों और छोटे कारोबारियों तक पहुंचे, यह भी स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से अहम सवाल है.
4- सल्ट विधानसभा: दूरस्थ गांवों और पलायन का सवाल
सल्ट अल्मोड़ा जिले का ग्रामीण पर्वतीय विधानसभा क्षेत्र है. यह शत-प्रतिशत ग्रामीण वोटर्स वाली सीट रानीखेत और द्वाराहाट से सटी हुई है. यहां गांवों की भौगोलिक दूरी, सीमित रोजगार के अवसर, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और सड़क संपर्क जैसे सवालों का सीधा संबंध लोगों के रोजमर्रा के जीवन से है. 2022 के चुनाव में भाजपा के महेश सिंह जीना ने कांग्रेस के रणजीत सिंह रावत को हराया था. सल्ट की राजनीति में स्थानीय संपर्क, ग्रामीण जरूरतें और क्षेत्र में उपलब्ध सुविधाओं का महत्व रहता है.
पलायन के कारण खाली होते गांव, खेती की घटती उपयोगिता, युवाओं के लिए स्थानीय रोजगार और बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं इस क्षेत्र की प्रमुख विकास संबंधी चिंताओं में शामिल हो सकती हैं. 2027 के चुनाव में इन सवालों पर राजनीतिक दलों की योजनाओं और उनके क्रियान्वयन को लेकर बहस महत्वपूर्ण होगी.
5- द्वाराहाट विधानसभा: ऐतिहासिक मंदिरों और शिक्षा की पहचान
द्वाराहाट को प्राचीन मंदिरों के कारण विशेष पहचान मिली है. यहां कत्यूरी काल से जुड़े मंदिर समूह क्षेत्र के ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व को दर्शाते हैं. यह क्षेत्र उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा संस्थानों से भी जुड़ा है. द्वाराहाट स्थित कुमाऊं इंजीनियरिंग कॉलेज, जिसे अब विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता है, क्षेत्र में तकनीकी शिक्षा की महत्वपूर्ण पहचान है.
यह भी पढ़ें: उत्तराखंड में सियासी भूचाल, कांग्रेस विधायक सुमित हृदयेश ने दी आत्मदाह की धमकी
इस सीट का राजनीतिक इतिहास भी उल्लेखनीय रहा है. उत्तराखंड क्रांति दल के नेता विपिन त्रिपाठी और उनके बेटे पुष्पेश त्रिपाठी का इस क्षेत्र की राजनीति में प्रभाव रहा. बाद के चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला प्रमुख रहा है. 2022 में कांग्रेस के मदन सिंह बिष्ट ने भाजपा के अनिल सिंह शाही को हराया था. चुनावी दृष्टि से शिक्षा संस्थानों की भूमिका, युवाओं के रोजगार, पर्यटन, सड़क संपर्क और ग्रामीण अर्थव्यवस्था यहां के महत्वपूर्ण विषय हो सकते हैं.
6- सोमेश्वर विधानसभा: आरक्षित सीट, कृषि और क्षेत्रीय नेतृत्व
सोमेश्वर अल्मोड़ा जिले की अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा सीट है. इसकी भौगोलिक स्थिति और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था इसे जिले के अन्य क्षेत्रों से अलग पहचान देती है. बोरारो घाटी के नाम से प्रसिद्ध इस इलाके में धान और गेहूं की खेती होती है. सोमेश्वर और पिनाकेश्वर मंदिर भी क्षेत्र की धार्मिक पहचान का हिस्सा हैं.
बागेश्वर सीमा से लगी यह वीआईपी सीट राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की जननी रही है. इस सीट से केंद्रीय मंत्री अजय टम्टा पहले विधायक रह चुके हैं. पूर्व सांसद और राज्यसभा सदस्य प्रदीप टम्टा का नाम भी इस क्षेत्र की राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है. 2022 में भाजपा की रेखा आर्य ने यहां जीत दर्ज की थी. वह राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रही हैं.
सोमेश्वर में खेती की लागत, सिंचाई, फसलों के विपणन, ग्रामीण सड़कों, युवाओं के रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे चुनावी बहस को प्रभावित कर सकते हैं. अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट होने के कारण सामाजिक प्रतिनिधित्व और वंचित समुदायों तक सरकारी योजनाओं की पहुंच भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हो सकती है.
पलायन, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाएं: चुनावी बहस के बड़े सवाल
अल्मोड़ा की छह सीटों को अलग-अलग देखने के बावजूद कुछ मुद्दे पूरे जिले में समान रूप से महत्वपूर्ण हैं. इनमें युवाओं के लिए रोजगार, गांवों में बुनियादी सुविधाएं, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, स्कूलों और कॉलेजों की स्थिति, कृषि तथा बागवानी को लाभकारी बनाना और पलायन को रोकने के प्रयास शामिल हैं.
पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार की कमी के कारण कई परिवारों के सदस्य शिक्षा, नौकरी और कारोबार के लिए मैदानी शहरों की ओर जाते हैं. इसका असर गांवों की आबादी, खेती और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था पर भी पड़ता है. स्थानीय पर्यटन, फल उत्पादन, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण और छोटे कारोबारों को बढ़ावा देना रोजगार के वैकल्पिक अवसर तैयार करने का एक रास्ता हो सकता है.
2027 में अल्मोड़ा पर क्यों रहेगी नजर?
अल्मोड़ा की राजनीतिक अहमियत केवल छह सीटों के चुनावी गणित से नहीं समझी जा सकती. यह जिला कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक पर्यटन, सैन्य परंपरा, कृषि और पहाड़ की सामाजिक चुनौतियों का प्रतिनिधित्व करता है. यहां के मतदाताओं की अपेक्षाएं शहर और गांव, पर्यटन केंद्र और दूरस्थ बस्तियों, खेती और सेवा क्षेत्र की जरूरतों के बीच फैली हुई हैं.
किशोर जोशी