भारत अपनी वायु सेना की ताकत बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है. देश के सबसे अहम लड़ाकू विमान Su-30MKI में रूसी RVV-BD हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल को इंटीग्रेट करने का प्रस्ताव रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) के सामने है. यह मिसाइल R-37M का एक्सपोर्ट वर्जन है जो लगभग 7408 km/hr की रफ्तार से लक्ष्य तक पहुंच सकती है.
इसकी रेंज 300 किलोमीटर तक बताई जाती है हालांकि एक्सपोर्ट वर्जन में यह आमतौर पर 200 KM के आसपास सीमित रहती है. इसकी मुख्य भूमिका उच्च मूल्य वाले लक्ष्यों जैसे AWACS यानी एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम विमानों को दूर से ही नष्ट करना है इससे पहले कि वे खतरे को भांप सकें.
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इस प्रस्ताव का समय रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत यात्रा से मेल खाता है जिससे दोनों देशों के रक्षा सहयोग को और मजबूती मिलने की उम्मीद है.
Su-30MKI भारतीय वायु सेना का मुख्य मल्टीरोल लड़ाकू विमान है जो लंबे समय से देश की हवाई सुरक्षा का आधार बना हुआ है. इसमें पहले से कई तरह की मिसाइलें लगी हुई हैं लेकिन लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली क्षमता को और बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है.
RVV-BD जैसी मिसाइल जोड़ने से विमान की मारक क्षमता काफी बढ़ जाएगी. यह मिसाइल दुश्मन के रडार विमान या अन्य महत्वपूर्ण हवाई प्लेटफॉर्म को बहुत दूर से निशाना बना सकती है जिससे भारतीय विमानों को दुश्मन के करीब जाने की जरूरत कम हो जाएगी. इससे पायलटों की सुरक्षा भी बढ़ेगी. हवाई श्रेष्ठता हासिल करने में मदद मिलेगी.
RVV-BD मिसाइल की खासियतें और महत्व
RVV-BD को रूसी आर-37एम मिसाइल का एक्सपोर्ट वर्जन माना जाता है. यह बहुत तेज गति से लक्ष्य की ओर बढ़ती है. 7408 km/hr की रफ्तार हासिल कर सकती है. इसकी लंबी रेंज इसे आधुनिक हवाई युद्ध में खास बनाती है. सामान्य हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें छोटी या मध्यम दूरी तक काम करती हैं लेकिन यह मिसाइल बहुत दूर से ही उच्च मूल्य वाले लक्ष्यों को भेदने में सक्षम है.
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AWACS जैसे विमान दुश्मन की हवाई गतिविधियों पर नजर रखते हैं और अपने लड़ाकू विमानों को निर्देश देते हैं. अगर इन विमानों को दूर से नष्ट कर दिया जाए तो दुश्मन की पूरी हवाई कमान और नियंत्रण प्रणाली प्रभावित हो सकती है. यही कारण है कि ऐसी मिसाइलों को अक्सर अवॉक्स किलर कहा जाता है.
एक्सपोर्ट वर्जन में रेंज को कुछ हद तक सीमित रखा जाता है लेकिन फिर भी 200 किलोमीटर के आसपास की दूरी आधुनिक युद्ध के लिहाज से काफी प्रभावी है. Su-30MKI में इस मिसाइल को इंटीग्रेट करने के लिए सॉफ्टवेयर अपडेट, रडार सिस्टम में बदलाव और अन्य तकनीकी समायोजन की जरूरत होगी.
भारतीय वायु सेना पहले भी रूसी मिसाइलों का इस्तेमाल करती रही है इसलिए इंटीग्रेशन आसान हो सकती है. फिर भी इसे पूरी तरह अनुकूल बनाने में समय और परीक्षण की जरूरत पड़ेगी.
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नए ALH हेलिकॉप्टरों की भी चर्चा
रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डीएसी देश की रक्षा खरीद संबंधी महत्वपूर्ण निर्णयों की समीक्षा करती है. इस बार की बैठक में सिर्फ RVV-BD मिसाइल का प्रस्ताव ही नहीं बल्कि कई अन्य अहम मुद्दे भी शामिल हैं. Su-30MKI विमानों और उनके एएल-31 इंजनों के ओवरहॉल का काम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल में कराने का प्रस्ताव भी विचाराधीन है.
लंबे समय से उड़ान भर रहे इन विमानों की मरम्मत और रखरखाव देश के अंदर ही करने से लागत कम होगी और निर्भरता घटेगी. साथ ही नए एएलएच मार्क 3 हेलीकॉप्टरों के ऑर्डर पर भी चर्चा हो रही है. एएलएच यानी एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर भारतीय सेना और वायु सेना दोनों के लिए उपयोगी है. मार्क 3 संस्करण में सुधार किए गए हैं जिससे इसकी क्षमता और विश्वसनीयता बढ़ी है.
इन सभी प्रस्तावों को एक साथ देखें तो साफ होता है कि भारत अपनी मौजूदा क्षमताओं को मजबूत करने के साथ-साथ नई तकनीक जोड़ने पर जोर दे रहा है. Su-30MKI बेड़े को अपग्रेड करना इसलिए जरूरी है क्योंकि ये विमान अभी भी वायु सेना की रीढ़ हैं.
नए लड़ाकू विमानों के आने में समय लगता है इसलिए मौजूदा बेड़े को आधुनिक रखना व्यावहारिक रणनीति है. इंजन ओवरहॉल से विमानों की उड़ान योग्यता बनी रहेगी और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड जैसे घरेलू उद्योग को काम मिलेगा.
रूस-भारत रक्षा सहयोग और पुतिन की यात्रा
इस प्रस्ताव का समय रूसी राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा से जुड़ा हुआ है. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग पर चर्चा होने की संभावना है. भारत और रूस लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में साझेदार रहे हैं. Su-30MKI खुद रूसी डिजाइन पर आधारित है और भारत में लाइसेंस के तहत बनाए गए हैं. RVV-BD जैसी मिसाइल का एकीकरण इस साझेदारी को और मजबूत करेगा.
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साथ ही यह भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में भी कदम है क्योंकि रखरखाव और ओवरहॉल का काम देश में ही होगा. वैश्विक स्तर पर हवाई युद्ध की प्रकृति बदल रही है. लंबी दूरी की मिसाइलें और उन्नत सेंसर अब फैसले लेने वाले कारक बन गए हैं. दुश्मन के एडब्ल्यूएसीएस या टैंकर विमानों को दूर से नष्ट करने की क्षमता किसी भी वायु सेना को बड़ा फायदा देती है.
भारत के पड़ोसी देशों में भी आधुनिक हवाई प्लेटफॉर्म बढ़ रहे हैं इसलिए ऐसी क्षमताओं का विकास जरूरी हो गया है. Su-30MKI को RVV-BD न सिर्फ रक्षात्मक बल्कि आक्रामक भूमिका में भी मजबूत बनाएगी.
मिसाइल एकीकरण की प्रक्रिया में तकनीकी चुनौतियां आ सकती हैं. रडार सिस्टम को मिसाइल के साथ पूरी तरह सिंक करना, सॉफ्टवेयर अपडेट और उड़ान परीक्षण जरूरी होंगे. लागत और समय सीमा भी महत्वपूर्ण कारक हैं. रक्षा अधिग्रहण परिषद अगर मंजूरी दे देती है तो परियोजना आगे बढ़ेगी.
एचएएल में ओवरहॉल की व्यवस्था से न सिर्फ मौजूदा बेड़े की उम्र बढ़ेगी बल्कि घरेलू विशेषज्ञता भी विकसित होगी. एएलएच मार्क 3 के नए ऑर्डर से हेलीकॉप्टर बेड़े को भी मजबूती मिलेगी जो पहाड़ी क्षेत्रों और तटीय सुरक्षा के लिए उपयोगी है.
कुल मिलाकर यह कदम भारतीय वायु सेना की मारक क्षमता बढ़ाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है. Su-30MKI जैसे विश्वसनीय प्लेटफॉर्म को नई लंबी दूरी की मिसाइल से लैस करना मौजूदा संसाधनों का बेहतर उपयोग है. रूसी सहयोग और घरेलू उद्योग की भूमिका दोनों ही इसमें महत्वपूर्ण हैं.
अगर ये प्रस्ताव मंजूर हो जाते हैं तो भारतीय वायु सेना आने वाले वर्षों में और अधिक सक्षम और तैयार नजर आएगी. क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के बीच ऐसी तैयारी देश की रक्षा तैयारियों को नई ऊंचाई पर ले जा सकती है.
ऋचीक मिश्रा