'जेट्स को नीचे उड़ाकर दुश्मन को चौंका दिया', ऑपरेशन सिंदूर पर पूर्व CDS का बड़ा खुलासा

पूर्व सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने ऑपरेशन सिंदूर की रणनीति बताई. सेनाओं ने लोअर एयरस्पेस का इस्तेमाल किया ताकि संघर्ष का स्तर कम रहे, सफलता सुनिश्चित हो और दुश्मन को सरप्राइज मिले.

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ऑपरेशन सिंदूर पर तीनों सेनाओं की बड़ी रणनीति के बारे में बताया पूर्व सीडीएस अनिल चौहान. (Photo: ITG) ऑपरेशन सिंदूर पर तीनों सेनाओं की बड़ी रणनीति के बारे में बताया पूर्व सीडीएस अनिल चौहान. (Photo: ITG)

मंजीत नेगी

  • नई दिल्ली,
  • 25 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 8:15 PM IST

पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने ऑपरेशन सिंदूर के पीछे की रणनीति को विस्तार से बताया है. उन्होंने कहा कि सशस्त्र बलों ने जानबूझकर निचले हवाई क्षेत्र यानी लोअर एयरस्पेस का इस्तेमाल करने का फैसला किया. यह तीसरा विकल्प था. इससे पहले उरी हमले के बाद जमीनी रास्ता अपनाया गया था. पुलवामा के बाद बड़े हवाई पैकेज का इस्तेमाल हुआ था. 

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इस बार निचले आसमान को चुनकर संघर्ष की सीमा को कम रखा गया. साथ ही सफलता की संभावना बढ़ाई गई और दुश्मन को सरप्राइज दिया गया. जनरल चौहान के अनुसार लोअर एयरस्पेस आमतौर पर ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन, अटैक हेलीकॉप्टर और कम ऊंचाई पर काम करने वाले सटीक प्लेटफॉर्म का क्षेत्र होता है.

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इस विकल्प से तीन मुख्य फायदे मिले...

  • पहला, संघर्ष का थ्रेशहोल्ड यानी स्तर नीचे रहा. 
  • दूसरा, ऑपरेशन की सफलता सुनिश्चित हुई. 
  • तीसरा, दुश्मन को पूरी तरह सरप्राइज दिया जा सका. 

इस रणनीति से बड़े पैमाने पर संघर्ष छिड़ने का खतरा कम रहा. लक्ष्य हासिल करने में आसानी हुई. यह फैसला सैन्य योजनाकारों की सूझबूझ को दर्शाता है.

तीनों सेनाओं की एकजुटता और बदलाव

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जनरल चौहान ने जोर देकर कहा कि ऑपरेशन सिंदूर में तीनों सेनाओं ने पूरी तालमेल के साथ काम किया. उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व के सामने कोई कमी या कमी का जिक्र नहीं किया. यह पिछले व्यवहार से अलग था. पहले कभी-कभी सेवाएं अपनी कमियों को शीर्ष स्तर पर रखती थीं जिससे देरी या विकल्पों में कमी आ जाती थी. 

इस बार शुरू से ही तीनों सेनाएं और सीडीएस खुद एकजुट रहे. किसी तरह की कमी को आंतरिक स्तर पर ही निपटाया गया. सरकार के सामने एक तैयार और एकीकृत योजना पेश की गई. यह संयुक्तता यानी जॉइंटनेस का मजबूत उदाहरण है जो जनरल चौहान के कार्यकाल की महत्वपूर्ण सुधारों में शामिल रही.

उरी और पुलवामा के बाद अपनाए गए तरीकों से यह रणनीति अलग थी. जमीनी कार्रवाई या बड़े हवाई हमले की बजाय निचले आसमान का इस्तेमाल करके जोखिम को नियंत्रित रखा गया. इससे न सिर्फ लक्ष्य हासिल हुए बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बढ़ने की संभावना भी कम रही. 

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जनरल चौहान के बयान से साफ है कि सैन्य नेतृत्व ने राजनीतिक नेतृत्व को पूरी जानकारी देते हुए भी आंतरिक सामंजस्य बनाए रखा. यह आधुनिक युद्ध में सेवाओं के बीच तालमेल की जरूरत को रेखांकित करता है. यह खुलासा सैन्य सुधारों की दिशा को मजबूत करता है. तीनों सेनाओं का एक साथ काम करना भविष्य के ऑपरेशनों के लिए मिसाल बन सकता है.

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लोअर एयरस्पेस का इस्तेमाल नई तकनीकों जैसे ड्रोन और सटीक हथियारों पर निर्भरता बढ़ाता है. इससे भारतीय सशस्त्र बल अधिक लचीले और प्रभावी बन सकते हैं. जनरल चौहान के बयान से यह भी स्पष्ट होता है कि आंतरिक कमियों को छिपाने की बजाय उन्हें सेवाओं के अंदर ही हल करना बेहतर तरीका है. इससे राजनीतिक स्तर पर फैसले तेजी से लिए जा सकते हैं और ऑपरेशन की सफलता की संभावना बढ़ जाती है.

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